भूत बुलाना पड गया भारी

ये घटना तब की है जब वो कॉलेज में एमएससी की पढाई कर रही थी |

वो उस समय वहा के गर्ल्स हॉस्टल में ही रहा करती थी | परीक्षा से पहले वो और उनकी कुछ सहेलिया लाइब्रेरी में पढाई कर रही थी | पढाई करते हुए रात के 12:30 बज चुके थे |

उस लाइब्रेरी में वो केवल 6 लडकिया ही थी | लाइब्रेरी में सन्नाटा छाया हुआ था | सारा हॉस्टल एकदम शांत था | तभी उनमे से एक लडकी ने कहा कि “बस यार पढ़ पढ़ के बोर हो गए है क्यों ना कोई खेल खेले जिससे दिमाग भी फ्रेश हो जाएगा और नींद भी आ जायेगी “|

सब उसकी बात से सहमत हो गए | उनमे से एक लडकी जिसका नाम पूजा था बोली कि “चलो हम सब किसी आत्मा से बात करते है |

ये सब कहकर वो अपने कमरे में गयी और Ouija board लेकर आयी जिसपर A ** Z तक alphabet , 0 से 9 तक नंबर और किनारों पर Yes और No लिखा था |

पूजा ने बोर्ड के चारो किनारों पर चार मोमबत्तिया जलाई और फिर लाइब्रेरी की सारी लाइट बंद कर दी | फिर उसने सिक्का बोर्ड के बीच में रख दिया |

उनमे से दो लडकिया तो डर के मारे अपने कमरे में चली गयी और बाकी चारो ने उस सिक्के पर एक एक अंगुली रख दी | फिर पूजा ने कहा कि कोई डरना मत और यहा से उठना मत वरना आत्मा नाराज हो जायेगी | अब पूजा बोलने लगी “अगर यहा पर कोई आत्मा है तो प्लीज हमसे बात करो “|

लाइब्रेरी में आजीब सा सन्नाटा और अँधेरा छाया हुआ था अचानक लाइब्रेरी में कही से कुछ आवाज़ आयी |उन्होंने सोचा शायद कोई किताब गिरी होगी | उसी समय सिक्का हिला और जसमीत दीदी ने पूछा “क्या यहा पर कोई आत्मा है ?” तभी छत पर लगा बंद पंखा जोर से हिलने लगा | सभी लडकिया डर गयी लेकिन पूजा ने कहा कि कोई भी लडकी अकेली मत भागना | ऐसा करने से आत्मा उसे नुकसान पंहुचा सकती है |

उसके बाद पूजा ने ऊपर देखते हुए कहा कि “अगर कोई आत्मा यहा है तो हमसे बात करे “| कुछ देर तक सन्नाटा रहा और अचानक सारी मोमबत्तिया बुझ गयी और लाइब्रेरी से कदमो की ठक ठक की आवाज़ आने लगी | सभी लडकिया डर के मारे भाग गयी लेकिन जसमीत दीदी पीछे रह गयी और उनसे दरवाज़ा नहीं खुल रहा था |

अचानक उन्हें लगा कि कोई उन्हें पीछे की तरफ खीच रहा है | वो जोर जोर से रोने और चिल्लाने लगी | उनकी आवाज़ सुनकर हॉस्टल की सारी लडकिया जाग गयी और उठ कर लाइब्रेरी की तरफ दौड़ी |हॉस्टल वार्डन और सभी लडकियों ने मिलकर दरवाज़ा खोला और दीदी को बाहर निकाला |

इस घटना के बाद उन्हें आज तक लाइब्रेरी के डरावने सपने आते है और वो आज तक उस घटना को नहीं भूली | तो दोस्तों मेरी दीदी के अनुभव को देखकर मुझे ये लगा कि कभी भी किसी आत्मा या प्रेत को परेशान नहीं करना चाहिए |

भूतहा अस्पताल

आज जो मै आपको किस्सा बताने जा रहा हु वो हमारे कस्बे के भूतहा अस्पताल का है |

सारे कस्बे के लोग इस अस्पताल को भूतहा अस्पताल कहते है | इस अस्पताल का असली नाम विक्टोरिया अस्पताल है | इस अस्पताल को आज से करीबन 100 साल पहले अंग्रेजो ने बनवाया था | उस अस्पताल के सामने एक कब्रिस्तान है |

मेरे दादाजी ने मुझे बताया था कि आज से 60 साल पहले इस अस्पताल में ऑपरेशन के दौरान एक लडकी की मौत हो गयी थी | तब से उस लडकी की आत्मा उस अस्पताल में भटकती है |

रात ढलते ही कोई भी इन्सान उस रास्ते से नहीं गुजरता है क्यूंकि उस लडकी की आत्मा राहगीरों को परेशान करती है | हालंकि मै दादाजी की बताई पुरानी भूतहा कहानियों में ज्यादा विश्वास नहीं करता था | एक रात मै अपने दो दोस्तों अंकित और राजू के साथ रात को बाइक पर घूम रहा था तभी मेरे एक दोस्त ने मुझसे विक्टोरिया अस्पताल वाले रास्ते से चलने को कहा |

हम में से कोई भी ज्यादा भूत प्रेतों पर विश्वास नहीं करते थे और हमने उस रास्ते से जाने का पक्का किया | उस समय रात के 10 बज चुके थे | हम तीनो ने ये बात अपने परिवार वालो को नहीं बताने का वादा किया और उस रास्ते पर निकल पड़े | जैसे ही हम उस रास्ते से निकले रास्ते पर रेत होने की वजह से हमारी बाइक फिसल गयी और हम तीनो धडाम से बाइक से दूर गिर गए |

गनीमत थी कि हम लोगो को कोई चोट नहीं आयी थी |बाइक चला रहे मेरे दोस्त अंकित ने बोला कि उसका बैलेंस तो बराबर था फिर ये बाइक कैसे फिसल गयी |

हालंकि वो थोडा डर गया था तो मेरे दुसरे मित्र राजू ने बाइक चलाने को कहा | अब राजू बाइक चला रहा था | हम 1 किमी ही चले थे कि अचानक हमारी गाडी का टायर पंचर हो गया और गाडी की स्पीड तेज़ होने से गाडी इस बार फिर पिछली बार से भी दूर तक फिसलती गयी | इस बार हमे कोहनियों और घुटनों पर थोड़ी चोट आयी थी | अंकित फिर से बोला कि इस जगह में जरुर कोई गडबड है हम लोग वापस उल्टे चलते है |

लेकिन मैंने और राजू ने उसकी बात नहीं मानी और बाइक उठाकर पैदल चलना शुरू कर दिया| हम थोड़ी दूर ही चले थे कि अचानक किसी लडकी के चीखने की आवाज़े सुनाई दी | ये सुनकर हम रुक गए और अंकित बोला “यार तुम लोगो को चीखने की आवाज़ सुनाई दी क्या ??” हमने उसकी बातो को अनसुना कर कहा कि कोई जानवर की आवाज़ होगी |

पांच मिनट चलने के बाद फिर वोही चीख फिर से सुनाई दी | इस बार तो हम दोनों को भी थोडा डर लगने लगा | हम तीनो ने वापस चलने के बारे में सोचा लेकिन हम रास्ते के बीच में आ गये थे | पीछे चलने में 3 किमी और आगे चलने में 2 किमि ओर बाकी थे |

हम लोगो ने आगे जाने का सोचा | थोडा आगे चलने पर हमे बरगद के पेड़ के नीचे एक औरत दिखाई दी | इतनी रात को अकेली औरत को देखकर हमारे तो रौंगटे खड़े हो गये थे | हम लोगो ने पीछे मुड़ने का सोचा | तभी वो बुढी औरत चिल्लाई “बेटा रुको मुझे हाईवे तक का रास्ता बता दो ” |

हमने पूछा कि “इतनी रात को आप इस रास्ते से कैसे निकल रही हो “| तो उस बुढिया ने कहा कि “मै पड़ोस के गाँव की रहने वाली और मेरे पास पैसे नहीं है इसलिए मै पैदल ही निकल पडी , हाईवे के उस पार मेरा गाँव है ” | हमने उस बुढिया की बात का विश्वास कर लिया और आगे निकल पड़े | रास्ते में वो बुढिया हमसे सारी बाते पूछने लगी | बुढिया हम तीनो के पीछे चल रही थी हम तीनो दोस्त अब अपनी बात कर रहे थे |

तभी राजू बोला कि ” लो मांजी आपका रास्ता आ गया ” और वो जैसे ही पीछे मुड़ा तो वहा कोई नहीं था | हम तीनो की तो सिट्टी पिट्टी गुल हो गयी | हम बाइक को धक्का मारते हुए जोर से भागने लगे |

भागते भागते अंकित ठोकर खाकर गिर गया और हमे जोर से चीखे सुनाई दी |हमने भी बाइक को वही पटककर अंकित को साथ लेकर दौड़ने लगे और अस्पताल के पास कब्रिस्तान तक पहुच गए |

ये सब घटित होते 12 बज चुकी थी | हम पसीने से तर बतर हो गए थे और कब्रिस्तान पार कर एक मंदिर में रुक गए क्यूंकि अगर बिना बाइक के घर जाते तो जूते पड़ते | इसलिए उस रात मंदिर में ही रुक गए और सुबह होते ही बाइक लेकर अपने अपने घर आ गये और घर वालो दोस्त के यहा रुकने का बहाना बना दिया |

उस रात के बाद से हम उस रास्ते से कभी नहीं गए | मुझे आज भी सपनों में वो भूतिया बुढिया और चीखने की आवाज़े आती है |

समाप्त।

चुडेल की दुख भारी कहानी

रमेस बाबू अपने कार्यालय में अपनी सीट पर बैठकर फाइलों को उलट-पलट रहे थे।

उनका कार्यालय ग्रामीण क्षेत्र में था जहाँ जाने के लिए कच्ची सड़कों से होकर जाना पड़ता था। अरे इतना ही नहीं, कार्यालय के आस-पास में जंगली पौधों की अधिकता थी, कहीं कहीं तो ये जंगली पौधे इतने सघन थे कि एक घने जंगल के रूप में दिखते थे।

कार्यालय के मुख्य दरवाजे को छोड़ दें तो बाकी हिस्से पूरी तरह से घाँस-फूँस आदि से ढंके लगते थे। कार्यालय के कमरों की खिड़कियों आदि पर लंबे-लंबे घास-फूँसों का साम्राज्य था।

दिन में भी कार्यालय में एक हल्का अंधकार पसरा रहता था, जिससे ऐसा लगता था कि यह कार्यालय हरी-भरी वादियों में शांत मन से बैठा हुआ किसी गहरे चिंतन में डूबा हुआ हो। क्योंकि इस कार्यालय में कुल कर्मचारियों की संख्या मात्र 5 ही थी जिसमें से एक रामखेलावन थे, जो चपरासी के रूप में यहाँ अपनी सेवा दे रहे थे। रामखेलावन ही वह व्यक्ति थे जिनके कार्य-व्यवहार से यह शांत कार्यालय कभी-कभी मुखर हो उठता था और कर्मचारियों की हँसी-ठिठोली से जाग उठता था।

रामखेलावन जी, पास के ही एक गाँव के रहने वाले थे और प्रतिदिन कोई न कोई असहज घटना कार्यालय के बाकी 4 कर्मचारियों को सुनाया करते थे। वे विशेषकर जब भी कार्यालय में प्रवेश करते तो सबसे पहले रमेस बाबू के कमरे में जाते और राम-राम कहने के साथ ही शुरू हो जाते कि बाबू कल तो गाँव में गजब हो गया था। रमदेइया को जंगल में चुडैल ने पकड़ लिया था तो मनोहर का सामना एक भयानक भूत से हो गया था।

जबतक रामखेलावन जी सभी कर्मचारियों से मिलकर कुछ भूत-प्रेत, गाँव-गड़ा की बातें नहीं बता लेते, उन्हें कल (चैन) नहीं पड़ता था। कोई कर्मचारी रामखेलावन की बातों को सहजता से सुनता तो कोई केवल हाँ-हूँ करके उस ओर कान नहीं देता और उन्हें स्टोप जला कर चाय बनाने के लिए कह देता या पानी की ही माँग करके उनसे बचने की कोशिश करता।

पर रामखेलावन की बातों को रमेसर बाबू बहुत ही सजगता से सुनते और पूरा ध्यान देते हुए बीच-बीच में हाँ-हूँ करने के साथ कुछ सवाल भी पूछते। एक दिन की बात है, रामखेलावन जी कार्यालय थोड़ा जल्दी ही पहुँच गए और सीधे रमेस बाबू के कमरे में घुस गए। पर उस समय रमेसर बाबू अपनी कुर्सी पर नहीं थे, शायद वे अभी कार्यालय पहुँचे ही नहीं थे।

रामखेलावन थोड़ा डरे-सहमे लग रहे थे और बार-बार अपने माथे पर आ रहे पसीने को गमछे से पोछ रहे थे। वे ज्यों ही कमरे से बाहर निकले त्यों ही कार्यालय के प्रांगण में उन्होंने रमेस बाबू को अपनी साइकिल को खड़े करते हुए देखा।

वे दौड़कर रमेसर बाबू के पास पहुँच गए और बिना जयरम्मी किए ही हकलाकर, घबराकर बोले, “बाबू, बाबू! कल रात को तो गजब हो गया। मेरा पूरा परिवार आफत में आ गया है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूँ?” रमेसर बाबू ने उन्हें अपने कमरे की ओर चलने का इशारा करते हुए आगे-आगे तेज कदमों से अपने कार्यालय-कक्ष में प्रवेश किए।

फिर एक कुर्सी पर रामखेलावन जी को बैठने का इशारा करते हुए अपने झोले को वहीं मेज पर रखकर एक गिलास में पानी लेकर कक्ष के बाहर आकर हाथ-ओथ धोए। उसके बाद कमरे में लगे हनुमानजी की फोटो को अगरबत्ती दिखाने के बाद अपनी कुर्सी पर बैठते हुए रामखेलावनजी से बोले,

“रामखेलावनजी, अब अपनी बात पूरी विस्तार से बताइए।”

उनकी अनुमति मिलते ही रामखेलावनजी कहना शुरू किए, “बाबू, कल मैं जब शाम को घर पर पहुँचा तो पता चला की मेरी बहू कुछ लकड़ी आदि की व्यवस्था करने जंगल की ओर गई थी और वहीं उसे किसे चुड़ैल ने धर लिया था। वह इधर-उधर जंगल में भटक रही थी तभी कुछ गाँव के ही गाय-बकरी के चरवाहों की नजर उस पर पड़ी। वे लोग स्थिति को भाँप गए और मेरी बहू को पकड़कर घर पर छोड़ गए। फिर गाँव के ही सोखा बाबा ने झाँड़-फूँक की उसके बाद उस चुड़ैंल से छुटकारा मिला।

पर आज सुबह फिर से उस पर चुड़ैल हावी हो गई है, सुबह से ही सोखा बाबा उसे उतारने में लगे हैं, पर वह छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं?” रामखेलावन की बातों को सुनकर रमेस बाबू थोड़े गंभीर हुए और अचानक पता नहीं क्या सूझा कि हँसने लगे।

रमेस बाबू की यह हालत देखकर रामखेलावनजी तो और भी हक्के-बक्के हो गए। उन्हें समझ में नहीं आया कि आखिर इनको क्या हो गया, कहीं इनपर भी तो किसी भूत-प्रेत का साया नहीं पड़ गया? अभी रामखेलावनजी यही सब सोच रहे थे तभी रमेस बाबू अपनी कुर्सी पर से उठे और बिना कुछ बोले रामखेलावन को अपने पीछे आने का इशारा करते हुए कमरे से बाहर निकल गए।

कमरे से बाहर निकल कर रमेसर बाबू पास की ही एक झाँड़ी से कुछ पत्तों को तोड़ा और मन ही मन कुछ मंत्र बुदबुदाए फिर रामखेलावन को उन पत्तों को देते हुए बोले कि आप इसे पीसकर अपनी बहू को पिला दें, और अपने घर पर ही रूकें। मैं कार्यालय में कुछ जरूरी काम-काज निपटाकर अभी 1-2 घंटे में आपके घर पर पहुँचता हूँ। रामखेलावनजी बिना कुछ बोले, केवल सिर हिलाए और उन पत्तों को लेकर घर की ओर बढ़ें। रास्ते में उन्हें केवल एक ही बात खाए जा रही थी कि रमेसर बाबू को यहाँ आए 3 साल हो गए पर कभी उन्होंने इस बात का जिक्र नहीं किया कि वे भूत-प्रेतों को उतारना भी जानते हैं।

कहीं वे मजाक में तो इन पत्तों को तोड़कर, झूठ-मूठ में कुछ बुदबुदाकर मुझे नहीं दे दिए? पर रमेस बाबू ऐसा नहीं कर सकते, वे तो बहुत गंभीर आदमी हैं, और हमारी सारी बातों को भी तो बहुत गंभीरता से लेते हैं और समय-समय पर हर प्रकार से हमारी मदद भी तो करते रहते हैं। ना-ना, वे मेरे साथ मजाक नहीं कर सकते।

यही सब सोचते-सोचते रामखेलावनजी घर पर पहुँच गए। घर के बाहर 10-15 गाँव-घर के ही लोग बैठे नजर आए। एक खटिया पर सोखा बाबा भी बैठकर लोगों से कुछ बात-चीत कर रहे थे। रामखेलावनजी को देखते ही सोखा बाबा बोल पड़े, “रामखेलावन, यह चुड़ैल तो बहुत ढीठ है, रात को छोड़ तो दी थी पर सुबह फिर से आ गई। 2-3 घंटे मैंने कोशिश किया पर छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है,

अभी भी आंगन में नाच-कूद रही है। मेरे मंत्रों का अब तो उस पर कुछ असर भी नहीं हो रहा है, यहाँ तक कि मेरा भी मजाक उड़ा दी। इतना सब होने के बाद मैं उसे छोड़कर बाहर आकर बैठ गया हूँ। मैं अब कुछ नहीं कर सकता। मेरा जितना पावर था, वह सब अजमा लिया।” रामखेलावनजी सोखा बाबा के ही बगल में बैठते हुए अपनी लड़की को आवाज लगाए, उनकी लड़की घर में से दौड़ते हुए बाहर निकली।

फिर रामखेलावनजी ने उन पत्तों को उसे देते हुए कहा कि अभी इसे पीसकर बहू को पिला दो। अगर ना-नूकर करती है तो जबरदस्ती पिलाओ। इसके बाद रामखेलावन की लड़की उन पत्तों को लेकर घर में गई तथा उन पत्तों को पीसकर अपनी भाभी को पिलाई। अरे यह क्या, एक घूँट अंदर जाते ही रामखेलावन जी की बहू तो काफी शांत हो गई और वहीं आंगन में ही एक तरई पर बैठ गई।

अब उसके व्यवहार में काफी अंतर आ गया था। उसका कूदना-नाचना बंद हो गया। रामखेलावनजी की लड़की दौड़ते हुए घर में बाहर निकली और रामखेलावनजी की ओर देखकर बोली, “बाबू, बाबू! भउजी को अब आराम हो गया है, वे आंगन में ही अब शांति से बैठ गई हैं।” बाहर जितने लोग बैठे थे, वे सब हतप्रभ हो गए।

आखिर जो चुड़ैल इतने बड़े सोखा से बस में नहीं आई, वह दो-चार पत्तों को पिलाने से कैसे बस में आ सकती है? आखिर वे कैसे पत्ते थे? क्या किसी धर्म-स्थान से लाए गए थे या किसी बहुत बड़े पंडित, ओझा, सोखा आदि ने दिए थे? वहाँ बैठे लोगों में से एक ने रामखेलावनजी की ओर देखा पर कुछ बोले इससे पहले ही रामखेलावनजी ने उन पत्तों के बारे में बता दिया।

सभी लोग बिन देखे उस रमेस बाबू के प्रति नतमस्तक हो गए। सोखा बाबा ने कहा कि वास्तव में आपके रमेस बाबू तो बहुत पहुँचे निकले। जिस चुड़ैल को बस में करने के लिए मैंने सारे के सारे हथकंडे अपना लिए, उसे उनके मंत्रित दो-चार पत्तों ने बस में कर लिया। फिर तो रामखेलावनजी थोड़ा तन कर बैठ गए और लगे रमेसर बाबू का गुणगान करने।

अभी वे लोग आपस में बात कर ही रहे थे तभी रमेस बाबू की साइकिल वहाँ रूकी। रमेस बाबू को देखते ही रामखेलावनजी दौड़कर रमेसर बाबू के हाथ से साइकिल लेकर खुद ही खड़ी करते हुए बोले, रमेस बाबू, आपके पत्तों ने तो कमाल कर दिया। अब बहू काफी अच्छी है और शांति से आंगन में बैठी है।

रमेस बाबू के इतना कहते ही वहाँ बैठे सभी लोग खड़े हो गए और रमेस बाबू की जयरम्मी करने लगे। रमेस बाबू सबका अभिवादन स्वीकार करते हुए उन लोगों के बीच ही एक खाट पर बैठ गए।

फिर रमेस बाबू ने रामखेलावनजी की बहू को घर में बाहर बुलवाया। वह काफी शांत थी पर रमेस बाबू को लगा कि अभी भी वह चुड़ैल यहीं है और पत्ते का असर खत्म होते ही फिर से इसे जकड़ लेगी। रमेस बाबू ने रामखेलावनजी की बहू को अपने पास बैठने का इशारा करते हुए कुछ मंत्र बुदबुदाने लगे।

अरे यह क्या, रामखेलावनजी की बहू घबराकर बोल उठी, मुझे छोड़ दीजिए, मैं जा रही हूँ, मैं अब कभी भी इसे नहीं पकड़ूँगी। मुझे जाने दीजिए, मुझे जाने दीजिए, मैं जल रही हूँ, मुझे छोड़ दीजिए। उस चुड़ैल को इस तरह गिड़गिड़ाते हुए देखकर रामखेलावनजी की काफी हिम्मत बढ़ गई।

वे बोल पड़े, रमेस बाबू, इसे छोड़िएगा मत। इसे जला कर भस्म कर दीजिए। पर वह चुड़ैल रामखेलावनजी की ओर ध्यान न देते हुए, रमेस बाबू की ओर दयनीय स्थिति में देखते हुए अपने प्राणों की भीख माँगती रही। रमेसर बाबू काफी गंभीर लग रहे थे। वे रामखेलावनजी की बहू की ओर गुस्से से देखते हुए बोले कि तुम कौन हो और इसे क्यों पकड़ीं?

इस पर वह चुड़ैल गिड़गिड़ाते हुए बोली की मैं पास के ही जंगल में रहती हूँ। मैं बंजारा परिवार से हूँ, एकबार हमारे परिवार ने इसी जंगल के बाहर अपना टेंट लगाया था। शाम के समय मैं लकड़ी लेने जंगल में प्रवेश की। मुझे पता नहीं चला कि कब मैं घने जंगल में पहुँच गई और रास्ता भी भटक गई। तब तक रात भी होने लगी थी। जंगल में पूरा अंधेरा पसरना शुरू हो गया था। मैं थोड़ी डर गई थी पर हिम्मत नहीं खोई थी। अचानक मेरे दिमाग में एक विचार आया।

मैंने सोचा कि रात के इस अंधेरे में अब रास्ता खोजना ठीक नहीं। कहीं किसी जंगली जानवर की शिकार न हो जाऊँ। इसलिए मैंने हिम्मत करके वहीं एक मोटे जंगली पेड़ पर चढ़कर बैठ गई। मैंने सोचा कि सुबह होते ही मेरे परिवार के लोग जरूर मुझे खोजने आएंगे और अगर नहीं भी आए तो मैं दिन में अपना रास्ता खोज लूँगी।

पर वह रात शायद मेरे जीवन की समाप्ति के लिए ही आई थी। मैं जिस पेड़ पर चढ़कर बैठी थी, उसी पर एक प्रेत का डेरा था। आधी रात तक तो सब कुछ एकदम ठीक-ठाक था पर उसके बाद अचानक वह प्रेत कहीं से उस पेड़ पर आ बैठा।

उसके आते ही जैसे पूरे जंगल में भयंकर तूफान आ गया हो। अनेकों पेड़ों की डालियाँ तेज हवा से डरावने रूप से हिलने लगी थीं। मुझे देखते ही वह जोरदार ढंग से अट्टहास किया और मुझे कोई प्रेतनी ही समझ कर बोला कि तुम्हें पता नहीं कि यह मेरा निवास है।

मैं कुछ जरूरी काम से जंगल से बाहर क्या गया, तूने मेरे बसेरे पर कब्जा कर लिया। मैं तूझे छोड़ूँगा नहीं, इतना कहकर वह मेरे तरफ झपटा, अत्यधिक डर से तो मेरी चींख निकल गई।

मैं बहुत तेज चिल्लाई की मैं कोई प्रेतनी नहीं हूँ। मैं इंसान हूँ इंसान। मेरी बातों को सुनकर तो वह और जोर से अट्टहास करने लगा और बोला कि मुझे एक संगिनी चाहिए। तुझे अगर सही-सलामत रहना है तो मुझसे विवाह करना होगा। मरता क्या न करता।

मैंने सोचा कि अब इस समय बस एक ही रास्ता है कि इसकी बातों को मान लिया जाए और दिन उगने के बाद यहाँ से खिसक लिया जाएगा। मैंने उसके हाँ में हाँ मिलाते हुए अपनी सहमति दे दी। मुझे क्या पता था कि यह सहमति मुझपर बहुत भारी पड़ेगी। इतना कहने के बाद रामखेलावन की बहू पर सवार वह चुड़ैल फूट-फूटकर रोने लगी।

रमेस बाबू थोड़े भावुक हो गए और उसके प्रति थोड़ी नरमी दिखाते हुए पानी भरा लोटा उसको पीने के लिए दे दिए। दो-चार घूँट पानी पीने के बाद उसने फिर से कहना शुरू किया। मेरी सहमति देने के बाद वह प्रेत पता नहीं कहाँ गायब हो गया, उसके गायब होते ही मैंने थोड़ीं चैन की साँस ली पर यह क्या अभी 10-15 मिनट भी नहीं बीते होंगे कि उस जंगल में जैसे भूचाल आ गया हो।

एक बहुत बड़ा तूफान आ गया हो। कितने पेड़ों की पता नहीं कितनी डालियाँ टूटकर धरती पर पड़ गईं। कम से कम सैकड़ों भूत-प्रेत वहाँ उपस्थिति हो गए थे। चारों तरफ चीख-पुकार मचा हुआ था। कुछ डरावनी अट्टहास कर रहे थे तो कुछ इस डाली से उस डाली पर कूद-फाँद रहे थे, तो कुछ ताली बजाकर नाच रहे थे। मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है।

तब तक वही प्रेत फिर से मेरे पास प्रकट हुआ और बोला की विवाह की व्यवस्था करने चला गया था। अपने परिवार वालों को बुलाने चला गया था। शादी में इन सबको भी तो शरीक करना होगा। अरे यह क्या अब तो मेरी शामत आ गई। पूरा शरीर पीला पड़ गया।

कुछ बोलने की हिम्मत नहीं रही, तभी अचानक एक प्रेतनी वहां प्रकट हुई और उस प्रेत से लड़ने लगी। वह प्रेतनी बोल रही थी कि मेरे रहते तूँ दूसरी शादी करेगा, कदापि नहीं, कदापि नहीं। मैं ऐसा नहीं होने दूँगी और इतना कहने के साथ ही उस प्रेतनी ने उस डाल से मुझे धक्का दे दिया और जमीन पर गिरने के कुछ ही समय बाद मेरी इहलीला समाप्त हो गई थी।

इतने कहने के साथ ही वह चुड़ैल फिर से रोने लगी थी। इसके बाद रमेस बाबू ने उस चुड़ैल को चुप रहने का इशारा करते हुए कहा कि आज के बाद तूँ इन गाँव वालों को कभी परेशान नहीं करोगी। चुड़ैल ने हामी भरते हुए कहा कि ठीक है। पर मैं तो एक बहुत ही छोटी आत्मा हूँ। इन पास के जंगलों में पता नहीं कितनी भयानक-भयानक आत्माएँ विचरण करती हैं। आप उन सबसे इस गाँव वालों को कैसे बचा पाएँगे।

उस चुड़ैल की इस बात को सुनते हुए रमेस बाबू हल्की मुस्कान में बोले। तूँ तो बकस इन लोगों को, बाकी भूत-प्रेतों से कैसे निपटना है, वह तूँ मुझपर छोड़। इसके बाद रमेस बाबू ने लोगों को अब कभी न पकड़ने की बात उस चुड़ैल से तीन बार कबूल करवाई तथा साथ ही उसे थूककर चाटने के बाद ही जाने दिया।

तो पाठकगण, रमेस बाबू ने उस चुड़ैल से तो गाँव वालों को छुटकारा दिला दिया पर क्या वे दूसरे भूत-प्रेतों से उन गाँव वालों की रक्षा कर पाए??? राज को राज ही रहने दिया जाए। खैर आप लोग बताएँ कि यह भूतही काल्पनिक कहानी आप लोगों को कैसी लगी???

जय बजरंग बली।

समाप्त!

डर से भी बड़ा डर

खड़ खड़--खड़ खड़..ट्रेन द्रुत गति से भागी चली जा रही थी।

संध्या काल का समय था,

तेज बारिश और बीच बीच मे बिजली की चमक वातानुकूलित कोच की खिड़कियों से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी। केबिन का एकांत और यह भयावह मौसम मुझ जैसे डरपोक आदमी को और डरा रहा था। थोड़ी देर बाद गाड़ी के पहियों की रफ़्तार कम हुई और एक मध्यम से स्टेशन पर गाड़ी रुकी।

बारिश इतनी ज्यादा थी कि मैं स्टेशन का नाम नहीं पढ़ पा रहा था।मैं अपने केबिन मे अकेला था और इस उधेड़बुन मे था की कोई सह यात्री आये, जिससे वार्तालाप करते करते आगे का रास्ता आसानी से काटा जा सके और एक अंदरुनी भय जो मेरे अंदर जागृत हो चुका है उससे मुझे निजात मिल सके।

तभी किसी ने केबिन का दरवाजा खटखटाया और एक शांत सा दिखने वाला व्यक्ति केबिन मे दाखिल हुआ।अपना सामान आदि व्यवस्थित करने के बाद वो मेरी तरफ देख कर मुस्कराया और मेरी तरफ हाथ आगे बढ़कर उसने अपना परिचय दिया.. मैं मिस्टर घोष...।

वो बोला -मैं कोलकाता जा रहा हूँ..पुनर्जन्म से सम्बंधित एक कार्यशाला मे भाग लेने के लिए।मैंने उसे बताया कि मैं कानपुर मे व्याख्याता के पद पर हूँ और पटना जा रहा हूँ। उसने कुछ खाने का सामान निकाला और मुझसे भी खाने हेतु आग्रह किया।किन्तु मैं बहुत ही सशंकित व्यक्तित्व का प्राणी.. ट्रेन मे किसी अजनबी के द्वारा दिए गए खाने को लेना असंभव था

मेरे लिए।मैंने बहुत विनम्रता से उसके आग्रह को ठुकराया। वो भी कम उस्ताद नहीं था ...कस कर हँसा और बोला- संशय कर रहे हैं मेरे ऊपर,अभी तो कुछ नहीं देखिये आगे क्या क्या होता है। उसके यह शब्द सुन कर मुझे सांप सूंघ गया किन्तु मैंने किसी तरह अपनी घबराहट को छिपाया।

कोई स्टेशन आने पर वो उतरता और ट्रेन चलने के बाद किसी दूसरे कम्पार्टमेंट से चढ़ कर फिर आ जाता। पूछने पर बोलता की बीच बीच मे रेलवे की नौकरी भी कर लेता हूँ।थोड़ी देर बाद मैं और वह विभिन्न विषयों पर चर्चा करने लगे।

उसने पुनर्जन्म से सम्बंधित बातें प्रारम्भ कीं और पुनर्जन्म को अन्धविश्वास बताया।थोड़ी देर बाद उसने मुझसे पूछा की क्या आप भूत-प्रेत पर विश्वास करते हैं?

मैंने कहा-बिल्कुल।वो जोर से हँसा और बोला यह सब बकवास है।मुझे भूतों पर विश्वास था किन्तु वो भूतों के अस्तित्व को नकारता रहा। रात अपने यौवन पर पहुँच चुकी थी,चर्चा उपरांत मैं वातानुकूलित प्रथम श्रेणी के कक्ष मे सोने का प्रयास कर रहा था।

अचानक मुझे ऐसा अनुभव हुआ की कोई मेरे गले पर गर्म अंगार रख रहा है।.मैं हड़बड़ा कर उठा ...कहीं कोई नहीं...मेरे अलावा उस कक्ष मे मेरा वही सह यात्री था जो सामने की बर्थ पर लेटा घोड़े बेंचकर सो रहा था। मैं फिर सोने का प्रयास करने लगा।

अभी आँख लगी ही थी की मुझे अपने पेट पर बहुत तेज दबाव और हंसने की तेज आवाज सुनाई दी। मैं घबराकर उठा तो देखा की सहयात्री बर्थ पर नहीं था।लगभग एक दो मिनट बाद वो आया और बोला जनाब सोये नहीं... मैंने अपनी घबराहट रोकते हुए उससे कहा अभी नींद नहीं आ रही और मैंने अपने बैग से एक मैग्जीन निकाली और पढ़ने का नाटक करने लगा।

सहयात्री भी बर्थ पर लेट गया और कुछ देर मे उसके खर्राटे केबिन मे गूंजने लगे।मैं भी थोडा निश्चिन्त हुआ और बर्थ पर आँख बंद कर लेट गया। ट्रेन कभी धीमी होती कभी रफ़्तार पकड़ लेती लेकिन मेरे दिल ने अब तेज रफ़्तार ही पकड़ रखी थी...,

भय और घबराहट के कारण लघुशंका की इच्छा अपने आप जीवित हो जाती है..और मैं टॉयलेट की तरफ मुड़ जैसे ही मैंने टॉयलेट का दरवाजा खोला वो सहयात्री मुझे अंदर दिखा और मैं चिल्लाते हुए अपनी बर्थ की तरफ भागा... ,

देखा तो वो सहयात्री इत्मिनान से अपनी बर्थ पर सो रहा है...मैंने घबराहट मे उसे जगाया...वो बोला..अरे क्या हुआ ? इतना मासूम लग रहा था , वो जैसे कुछ जानता ही ना हो....

मैंने कहा- आप यहाँ भी और वहां टॉयलेट मे भी....

वो कुटिलता से हँसा और बोला -मैं कितने रूप मे कहीं पर भी रह सकता हूँ। घबराहट के मारे मैं पसीने से तर बतर..बिल्कुल निर्जीव सा खड़ा उसके सामने।वो बोला -तुम्हें भूतों पर विश्वास था ना..

तुम्हे तुम्हारे विश्वास का प्रमाण देना था।तुम्हारे जैसे लोगों के कारण ही हम भूत-पिशाच लोगों का अस्तित्व है...इतना कहकर वो मेरी आँखों के सामने से अचानक गायब हो गया।

मैं डर के मारे अवाक् और निर्जीव सा अपनी बर्थ पर बैठा था।तभी केबिन के अंदर टिकट निरीक्षक आया उसका चेहरा देखकर मुझे बेहोशी छाने लगी क्योंकि यह वही सहयात्री था मेरा..और वो टिकट चेक कर मुस्कराता हुआ चला गया...

समाप्त!

अधजला खंडहर

बात उन दिनों की है जब मैं कॉलेज का स्टूडेंट था| अपने कॉलेज की ओर से हम सभी कैम्प के लिए एक जंगल में गए थे| , हलकी ठंढ थी ; अत: रात में हम सबने पूरी रात कैम्प – फायर के साथ डांस करने ,गाने आदि का प्रोग्राम तय किया| मुझे और सभी साथियों को कैम्प फायर के लिए लकडियाँ इकट्ठी करने का भार सौंपा गया| मैं निकला तो सबके साथ ही लेकिन जंगल के प्राकृतिक सौन्दर्य में भटकता हुआ अकेले बहुत दूर कहीं निकल गया|

अचानक आसमान बादलों से भर गया और गरज के साथ बारिश होने लगी| बादलों के लगातार गरजने से मैं पेड़ के नीचे खड़ा रहना मुनासिब न समझ आसपास किसी घर की तलाश में एक दिशा में भागने लगा|मुझे कुछ ही दूरी पर एक लाल ईंटों से बनी शानदार बिल्डिंग नजर आई| , बिल्डिंग रोशनी से पूरी नहाई हुई थी और उसमें ढेर सारे लोग हैं – ऐसा दूर से ही लग रहा था| मैं तेजी से भागते हुए उस बिल्डिंग में जा घुसा और सामने से आती हुई एक खुबसूरत नर्स से टकराते – टकराते बचा| नर्स ने मुझे घूर कर देखते हुए कहा – “ बहुत अधिक भीग गए हो ,सर्दी लग जायेगी| उधर बाईं ओर एक स्टोर रूम है ; वहां जाकर जो भी मिले उससे कहना सिस्टर जूलिया ने दुसरे सूखे और साफ़ कपडे मुझे देने को कहा है – वह तुम्हे कपडे दे देगा|

“ मैं हक्का – बक्का मुंह फाड़े सिस्टर जूलिया को देखता रहा| मुझे एकदम से यह समझ नहीं आया कि मैं क्या करूँ| मेरी स्थिति देखकर सिस्टर जूलिया खिलखिलाकर हंस पड़ी और बोली – “पहले तो तुम अपना मुंह बंद करो वरना मुंह में मच्छड घुस जायेंगे और अब जाकर वीसा ही करो जैसा मैं ने कहा है|

” मैं हलके से ‘हाँ ‘ में सर हिला सिस्टर की बताई दिशा में जाने को मुद गया|अभी कुछेक दस कदम ही चला होउंगा कि मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रखा| मैं चौंककर पीछे मुदा और अपने सामने आर्मी की वर्दी में एक युवक को खडा मुस्कुराता पाया| मेरे चेहरे पर आश्चर्य का बादल अपना घर बना चुका था ;

जिसे देखते ही उस युवक को हंसी आ गई| उसने धीमे ,किन्तु दृढ स्वर में कहा – “ मैं कैप्टन विनोद हूँ और यह हमारे देश की आर्मी का हॉस्पिटल है|’ कैप्टन विनोद की बातों ने मुझे आश्वस्त किया| मैं अब धीरे – धीरे सामान्य हो गया और मैं ने कैप्टन विनोद को सिस्टर जूलिया की कही बातें बताई| सुनकर ,कैप्टन विनोद के चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान फ़ैल गई और वे बोले –

“ तो सिसितर जूलिया से भी मिल चुके|”

“ जी , क्या मतलब है आपका ?”

“ कुछ नहीं ,चलो मैं तुम्हे सूखे कपडे देता हूँ चेंज कर लो नहीं तो सच में सर्दी लग जायेगी|

” और मैं कैप्टन विनोद के पीछे – पीछे एक बड़े से कमरे में पहुँच गया| कमरे के चारो ओर हरे रंग के परदे लगे हुए थे| ,

एक ओर एक बड़ा सा बेड पडा हुआ था और उसके सामने एक सोफा था| बीच में एक टेबल था जिस पर दो ग्लास ,एक बड़ी बोतल ब्रांडी की और एक या दो पत्रिकाएं पड़ी हुई थीं|कमरे के एक कोने में एक बड़ी सी अलमारी थी ;जिसमें से कैप्टन विनोद ने एक आसमानी रंग का कुरता – पायजामा निकालकर मुझे दिया और कमरे से लगे बाथरूम की ओर इशारा किया|

मैं बाथरूम से कपडे चेंज कर जैसे ही निकलने लगा मेरी नजर बाथरूम की एक दीवाल पर पड़ी| वह खून के छींटों से भारी हुई थी| यह देखकर मैं घबडा गया और जल्दी से बाहर निकलने को मुदा कि बाथरूम में लगे आईने में खुद को ही देखकर चौंक गया|

आईने में मेरा पूरा शरीर तो नजर आ रहा था लेकिन मेरे शरीर पर से मेरा सर गायब था|

अब मुझे डर लगने लगा और मैं हडबडा कर बाथरूम से निकल गया| ,

मुझे इस तरह बाहर निकलते देख कैप्टन विनोद ने हंसकर पूछा – “ क्या हुआ ?

अरे हाँ ,तुम ने तो अब तक मुझे अपना नाम ही नहीं बताया|”

“ कहाँ जाओगे ,

बाहर बहुत तेज बारिश हो रही है| लेकिन ,तुम जाना क्यों चाहने लगे अचानक यह मैं समझ नहीं पा रहा हूँ|”

“ कैप्टन विनोद आपकी बाथरूम की एक दीवाल पूरी खून के छींटों से भरी हुई है| और और आपके बाथरूम में लगा आईना भी कुछ अजीब सा है| उसमें मुझे मेरा पूरा शरीर तो दिखाई दिया लेकिन मेरा सर ही गायब था| मैं अब बिलकुल भी नहीं रुकुंगा यहाँ| बारिश में ही भीगता हुआ अपने कैम्प तक जाऊँगा|

” कहते हुए मैं कमरे से बाहर जाने वाले दरवाजे की ओर बढ़ा| “ रुको “ तभी कैप्टन विनोद की कडकती आवाज गूंजी “ तो तुमने सबकुछ देख ही लिया|”

“जी क्या मतलब है आपका ?

” मेरी आवाज में डर भर गया था|

“ मतलब चाहे जो हो|तुम तब तक यहाँ से नहीं जा सकते जबतक मैं तुम्हे कुछ बता न दूं|”

“ क्क्कक्या बताना चाहते हैं आप ?”

“ जो आजतक कोई न जान सका|”

“ जो आज तक कोई न जान सका वह मैं जानकार क्या करूंगा| प्लीज ,अब मुझे जाने दें|”

– मैं डर से रुआंसा हो गया| “नहीं , बिलकुल भी नहीं| और , तुम्हे मुझसे डरने की भी कोई जरुरत नहीं| सैनिक सबकी रक्षा के लिए होते हैं| मैं भी तुम्हारी सुरक्षा ही कर रहा हूँ|”

- कैप्टन विनोद के स्वर में कोमलता थी – “ आओ मेरे साथ इस सोफे पर बैठ जाओ| मैं तुम्हे एक कहानी सुनाता हूँ| कहानी खत्म होते ही मैं तुम्हे तुम्हारे कैम्प तक जीप से छोड़ आऊंगा| वैसे भी तुम अपने साथियों से काफी आगे निकल आये हो|वहां तक तुम अब चलते हुए शायद पहुँच न पाओ|

” कैप्टन विनोद के स्वर में जाने कैसी आश्वस्ति थी मैं जाकर उनके बगल में बैठ गया| कैप्टन विनोद ने कहना शुरू किया –

“दुश्मनों ने धोखे से हमारे अस्पताल को अपना निशाना बनाया| दुश्मन देश के दो सैनिक हमारे सैनिक के वेश में एक हमारे ही घायल सैनिक को लेकर आये| वह घायल था और और हमारे देश की सेना ने उसे बहुत ढूंढा लेकिन नहीं मिला था| शायद , साजिश के तहत उसे घायल होते ही घुसपैठियों ने कहीं छुपा दिया था|

अचानक अपने खोये सैनिक को अपने हॉस्पिटल में पा सभी खुश हो गए और बिना अधिक पड़ताल किये हॉस्पिटल के गेस्ट रूम में घायल को लेकर आने वाले छद्म वेष धारियों को ठहरने की इजाजत दे दी गई|

अभी उस सैनिक का इलाज चल ही रहा था कि जोरों का ब्लास्ट हुआ और पूरा हॉस्पिटल एक पल में खंडहर में तब्दील हो गया|” “ लेकिन हॉस्पिटल तो अपनी शानदार स्थिति में खडा है|

“ मेरी बातों को अनसुना कर कैप्टन विनोद ने अपनी बात जारी रखी – “ कोई नहीं बचा उस ब्लास्ट में| दीवाल पर पड़े खून के छींटे भी उसी ब्लास्ट में मारे गए हॉस्पिटल के कर्मचारियों के हैं|” “ हाँ , पर यह हॉस्पिटल तो मुझे खंडहर नहीं दिखता|

” जवाब में कैप्टन विनोद के चेहरे पर रहस्य भरी मुस्कान फ़ैल गई और उनका चेरा अजीब से भावों से भर गया| मैं उनके चेहरे को देखकर अन्दर से दहल गया|

फिर भी , मैं ने हिम्मत कर पूछा –

“ आप उस ब्लास्ट में बच कैसे गए ?” सुनते ही कैप्टन विनोद ठहाका लगा कर हंस पड़े और मुझ पर एक भरपूर नजर डालते हुए कहा –

“ यह कहानी आज से मात्र दस वर्ष पहले की है और मैं तो आज से पचास वर्ष पहले मर चुका हूँ|

” इसके आगे उनहोंने क्या कहा – मुझे कुछ नहीं मालुम|, चेहरे पर गीलेपन का अहसास जब काफी हुआ तो मैं जैसे नींद से जागा| मुझे घेरे हुए मेरे सभी सहपाठी और टीचर खड़े थे| मेरे आँख खोलते ही मेरे सर ने कहा –

“ थैंक गॉड ! तुम्हे होश आ गया|”

“ तो क्या मैं बेहोश था ?”

“ हाँ , तुन जंगल में जाने कहाँ भटक गए थे| जब सभी लौट आये और तुम नहीं आये तो हम सभी मिलकर तुम्हें ढूँढने निकले| काफी दूर जाने के बाद हमने एक जीप आती दिखाई दी जिसमें एक आर्मी मैन तुम्हे पीछे की सीट पर सुलाए हुए हमारे कैम्प को ढूंढते हुए आ रहे थे| उनहोंने हम सबको भी अपनी जीप पर बिठाया और कैम्प तक्ल छोड़ा|

हमने उन्हें काफी रोकने की कोशिश की लेकिन वे यह कहते हुए चले गए अभी नहीं रुक सकता एक जरुरी काम है|” जब हमने तुम्हारे बेहोश जाने और उन तक तुम्हारे पहुँचने के बारे में पूछा तो बोले – “ सोमेश ही बताएगा और जो भी बताएगा वह सब अक्षरश: सच होगा|

सबकी उत्सुक निगाहें अपनी ओर लगी देख मैं ने धीमे स्वर में पूछा -- + क्या उनका नाम कैप्टन विनोद था ?” सर ने “ हाँ “ में सर हिलाया| मैं ने सबको उधर चलने को कहा जिधर से सबने जीप आती देखी थी| पहले तो सर तैयार नहीं हुए लेकिन मेरे बहुत कहने पर वे राजी हो गए|

सुबह होते ही हम उधर की ओर गए| मैं उस जगह पर पहुँच कर गहरे आश्चर्य में डूब गया| वहां एक अधजला खंडहर था : जिसके एक टूटे पत्थर पर लिखा था “ आर्मी हॉस्पिटल “|,

समाप्त!

उलझे बालों वाली लड़की

लिया और कहने लगी प्लीज अल्बर्ट डोंट गो डोंट लीव मी , पर उस आदमी पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, सारा का चेहरा लाल हो गया था,

अचानक वो आदमी खड़ा हुआ, और मेरी ओर बढने लगा मैं जड़ थी जैसे मेरे आँखों के सामने कोई पिक्चर चल रही थी, तभी सारा के हाथ मे, ना जाने कहा से बन्दुक आ गई थी सारा फिर बोली अल्बर्ट स्टॉप. पर वो आदमी आगे बढ़ता ही जा रहा था. और फिर एक धमाका और ढेर सा धुँआ, और तब पहली बार मेरे गले से चीख निकली विक्रम और शिब्बू भागते हुए मेरे पास आये,

मैं उस कमरे मैं जड़ खड़ी हुई थी और लगातार चीखे जा रही थी वहां कुछ भी नहीं था, विक्रम मुझे उठा कर अपने कमरे मे लाया, मुझे पानी पिलाया, मैं पसीने मैं भीगी हुई थी, वो बार बार मुझसे पूछ रहा था क्या हुआ? क्या हुआ? पर मैं कुछ बता नहीं पा रही थी, फिर कब मैं बेहोश हो गई पता नहीं लगा !

जब मेरी आँख खुली सवेरा हो गया था विक्रम परेशान सा मेरे सिरहाने बैठा हुआ था रूम के दूसरे कोने मैं शिब्बू दिवार से सर लगा कर ऊंघ रहा था, मैंने उठने की कोशिश की तो विक्रम ने मेरी मदद की ऐसा लग रहा था जैसे मैं सदियो से बीमार हु बहुत कमज़ोरी लग रही थी. शिब्बू को विक्रम ने काफ़ी बना कर लाने को कहा, फिर मुझे बाहों मे भरते हुए कहा क्या हुआ था ? रुबिन तुम रात को वहां क्यों चली गई थी ?

मैंने सारी बात बता दी विक्रम सुन कर सन्न रह गया, उसने जैसे तैसे पैकिंग की मुझे सहारा दे कर तैयार करवाया और हम निकल पड़े कॉटेज से जैसे जैसे दूर जा रहे थे मेरे शरीर मे जैसे जान आती जा रही थी हम बाजार मे पहुच गए, विक्रम ने उस छोटे से ढाबे पर गाड़ी रोक दी वो बुड्डा चाय बना लाया विक्रम और मेरी सफ़ेद शक्ल देख कर वो बोला साहब हम तो पहले ही दिन आपको बताने वाले थे पर शहर के लोग ऐसे बातो को कहा मानते हो,

फिर जो उसने कहानी सुनाई

वो इस प्रकार थी-

यह बात उस ज़माने की है, जब अंग्रेज भारत छोड़ कर जाने वाले थे यह कॉटेज अंग्रेज अफसर अल्बर्ट केथ की थी उसकी फॅमिली इंग्लैंड में थी वो लगभग ४० साल का हट्टा कट्टा आदमी था, कुछ साल पहले वो बंगाल से एक एंग्लोइण्डियन लड़की सारा को अपने साथ ले आया था,

वो बेचारी उससे बहुत प्यार करती थी पर जब अंग्रेज भारत छोड़ कर जाने लगे तो अल्बर्ट सारा को छोड कर जाने लगा उसे वो साथ कैसे ले जाता इंग्लैंड मैं उसकी बीवी और ४ बच्चे थे ! सारा सारी जिन्दगी जिसे प्यार समझ रही थी वो तो बस मन बहलाव था,

उसने बहुत कोशिश की अल्बर्ट ना जाये पर वो ना माना और फिर सारा ने उसे गोली मार दी और खुद वॉटरफॉल से छलाँग मार कर आत्महत्या कर ली। तब से ही उनकी आत्मा भटक रही है ! मैं सारे रास्ते यही सोचती हुई आई की, क्यों सारा ने मुझे चुना क्या वो कुछ बताना चाहती थी, मुझे इशारा करना चाहती थी ?

जब गुडगाँव करीब आने लगा तो मैंने विक्रम को कहा क्या तुम भी मुझे छोड़ तो नहीं जाओगे हमारे रिश्ते का भी तो कोई नाम नहीं विक्रम मेरी और हैरानी से देखने लगा वो कुछ नहीं बोला जिंदगी वापिस आ कर फिर बिजी हो गई एक शाम मेरा फ़ोन बजा - हेल्लो जानेमन रेडी हो जाओ मम्मी पापा आ रहे है उलझे बालो वाली लड़की ने मेरी जिंदगी सुलझा दी थी

समाप्त!

भटकती रूह की सच्ची कहानी

भटकती रूह की सच्ची कहानी
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भूत-प्रेत के किस्से सुनने में बेहद रोमांचक और दिलचस्प लगते हैं लेकिन क्या हो जब यह किस्से सिर्फ किस्से ना रहकर एक हकीकत की तरह आपके सामने आएं?


आज की युवा पीढ़ी भूत और आत्माओं के होने पर विश्वास नहीं करती लेकिन जिस पर आप विश्वास नहीं करते वह असल में है ही नहीं यह तो संभव नहीं है ना. आज हम ऐसे ही भूतहा स्थान से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं एक आत्मा ने किया था.

जोधपुर (राजस्थान) स्थित बावड़ियों के किस्से स्थानीय लोगों में बहुत मशहूर हैं. यहां पानी की कई बावड़ियां हैं जिनमें से एक के बारे में कहा जाता है कि उसे भूत ने बनवाया था.जोधपुर से लगभग 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित ‘रठासी’ नाम का एक ऐतिहासिक गांव है.

जोधपुर (राजस्थान) स्थित बावड़ियों के किस्से स्थानीय लोगों में बहुत मशहूर हैं. यहां पानी की कई बावड़ियां हैं जिनमें से एक के बारे में कहा जाता है कि उसे भूत ने बनवाया था.जोधपुर से लगभग 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित ‘रठासी’ नाम का एक ऐतिहासिक गांव है.

मारवाड़ के इतिहास पर नजर डालें तो यह ज्ञात होता है कि जब जोधपुर में रहने वाले राजपूतों की चम्पावत शाखा का विभाजन हुआ तो उनमें से अलग हुए एक दल ने कापरडा गांव में रहना शुरू किया. लेकिन इस स्थान पर रहने वाले युवा राजपूत राजकुमारों ने गांव में साधना करने वाले साधु-महात्माओं को परेशान करना शुरू कर दिया.

उन राजकुमारों से क्रोधित होकर साधुओं ने उन्हें श्राप दे दिया कि उनके आने वाली पीढ़ी इस गांव में नहीं रह पाएगी.साधुओं के श्राप की बात जब राजकुमारों ने अपने घर में बताई तो सभी भयभीत हो गए और उस गांव को छोड़कर चले गए. इस गांव को छोड़कर वह जिस गांव में रहने के लिए गए उस गांव का का नाम है रठासी गांव. यह जोधपुर से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक ऐतिहासिक गांव है.इस गांव में एक बावड़ी है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह भूतों के सहयोग से बनी है

अर्थात उस बावड़ी को बनाने में भूत-प्रेतों ने गांव वालों की सहायता की थी. ठाकुर जयसिंह के महल में स्थित इस बावड़ी को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं. इस बावड़ी के विषय में यह कहानी प्रचलित है कि एक बार जब ठाकुर जयसिंह घोड़े पर सवार होकर जोधपुर से रठासी गांव की ओर जा रहे थे तब रास्ते में ठाकुर साहब का घोड़ा उनके साथ-साथ चलने वाले सेवकों से पीछे छूट गया और इतने में रात हो गई.

राजा का घोड़ा काफी थक चुका था और उसे बहुत प्यास लगी थी. रास्ते में एक तालाब को देखकर ठाकुर जयसिंह अपने घोड़े को पानी पिलाने के लिए ले गए.

आधी रात का समय था घोड़ा जैसे ही आगे बढ़ा राजा को एक आकृति दिखाई दी जिसने धीरे-धीरे इंसानी शरीर धारण कर लिया. राजा उसे देखकर डर गया, उस प्रेत ने राजा को कहा कि मुझे प्यास लगी है लेकिन श्राप के कारण मैं इस कुएं का पानी नहीं पी सकता.

राजा ने उस प्रेत को पानी पिलाया और राजा की दयालुता देखकर प्रेत ने उसे कहा कि वह जो भी मांगेगा वह उसे पूरी कर देगा.राजा ने प्रेत को कहा कि वह उसके महल में एक बावड़ी का निर्माण करे और उसके राज्य को सुंदर बना दे.

भूत ने राजा के आदेश को स्वीकारते हुए कहा कि वो ये कार्य प्रत्यक्ष रूप से नहीं करेगा, लेकिन दिनभर में जितना भी काम होगा वह रात के समय 100 गुना और बढ़ जाएगा. उस प्रेत ने राजा को यह राज किसी को ना बताने के लिए कहा.

इस घटना के दो दिन बाद ही महल और बावड़ी की इमारतें बनने लगीं. रात में पत्थर ठोंकने की रहस्यमय आवाजें आने लगीं, दिन-प्रतिदिन निर्माण काम तेज गति से बढ़ने लगा. लेकिन रानी के जिद करने पर राजा ने यह राज रानी को बता दिया कि आखिर निर्माण इतनी जल्दी कैसे पूरा होता जा रहा है.

राजा ने जैसे ही यह राज रानी को बताया सारा काम वहीं रुक गया. बावड़ी भी ज्यों की त्यों ही रह गई. इस घटना के बाद किसी ने भी उस बावड़ी को बनाने की कोशिश नहीं की.

समाप्त!


धूनधर का जंगल कि पुरी कहानी

 भारत में कई भूतिया जंगल हैं, जो अकेलापन और अनपढ़ी ज़िन्दगी का प्रतीक हो सकते हैं। कुछ प्रमुख भुतिया जंगल हैं जैसे कि धूनधर का जंगल (मध्य प्...