भूत बुलाना पड गया भारी

ये घटना तब की है जब वो कॉलेज में एमएससी की पढाई कर रही थी |

वो उस समय वहा के गर्ल्स हॉस्टल में ही रहा करती थी | परीक्षा से पहले वो और उनकी कुछ सहेलिया लाइब्रेरी में पढाई कर रही थी | पढाई करते हुए रात के 12:30 बज चुके थे |

उस लाइब्रेरी में वो केवल 6 लडकिया ही थी | लाइब्रेरी में सन्नाटा छाया हुआ था | सारा हॉस्टल एकदम शांत था | तभी उनमे से एक लडकी ने कहा कि “बस यार पढ़ पढ़ के बोर हो गए है क्यों ना कोई खेल खेले जिससे दिमाग भी फ्रेश हो जाएगा और नींद भी आ जायेगी “|

सब उसकी बात से सहमत हो गए | उनमे से एक लडकी जिसका नाम पूजा था बोली कि “चलो हम सब किसी आत्मा से बात करते है |

ये सब कहकर वो अपने कमरे में गयी और Ouija board लेकर आयी जिसपर A ** Z तक alphabet , 0 से 9 तक नंबर और किनारों पर Yes और No लिखा था |

पूजा ने बोर्ड के चारो किनारों पर चार मोमबत्तिया जलाई और फिर लाइब्रेरी की सारी लाइट बंद कर दी | फिर उसने सिक्का बोर्ड के बीच में रख दिया |

उनमे से दो लडकिया तो डर के मारे अपने कमरे में चली गयी और बाकी चारो ने उस सिक्के पर एक एक अंगुली रख दी | फिर पूजा ने कहा कि कोई डरना मत और यहा से उठना मत वरना आत्मा नाराज हो जायेगी | अब पूजा बोलने लगी “अगर यहा पर कोई आत्मा है तो प्लीज हमसे बात करो “|

लाइब्रेरी में आजीब सा सन्नाटा और अँधेरा छाया हुआ था अचानक लाइब्रेरी में कही से कुछ आवाज़ आयी |उन्होंने सोचा शायद कोई किताब गिरी होगी | उसी समय सिक्का हिला और जसमीत दीदी ने पूछा “क्या यहा पर कोई आत्मा है ?” तभी छत पर लगा बंद पंखा जोर से हिलने लगा | सभी लडकिया डर गयी लेकिन पूजा ने कहा कि कोई भी लडकी अकेली मत भागना | ऐसा करने से आत्मा उसे नुकसान पंहुचा सकती है |

उसके बाद पूजा ने ऊपर देखते हुए कहा कि “अगर कोई आत्मा यहा है तो हमसे बात करे “| कुछ देर तक सन्नाटा रहा और अचानक सारी मोमबत्तिया बुझ गयी और लाइब्रेरी से कदमो की ठक ठक की आवाज़ आने लगी | सभी लडकिया डर के मारे भाग गयी लेकिन जसमीत दीदी पीछे रह गयी और उनसे दरवाज़ा नहीं खुल रहा था |

अचानक उन्हें लगा कि कोई उन्हें पीछे की तरफ खीच रहा है | वो जोर जोर से रोने और चिल्लाने लगी | उनकी आवाज़ सुनकर हॉस्टल की सारी लडकिया जाग गयी और उठ कर लाइब्रेरी की तरफ दौड़ी |हॉस्टल वार्डन और सभी लडकियों ने मिलकर दरवाज़ा खोला और दीदी को बाहर निकाला |

इस घटना के बाद उन्हें आज तक लाइब्रेरी के डरावने सपने आते है और वो आज तक उस घटना को नहीं भूली | तो दोस्तों मेरी दीदी के अनुभव को देखकर मुझे ये लगा कि कभी भी किसी आत्मा या प्रेत को परेशान नहीं करना चाहिए |

भूतहा अस्पताल

आज जो मै आपको किस्सा बताने जा रहा हु वो हमारे कस्बे के भूतहा अस्पताल का है |

सारे कस्बे के लोग इस अस्पताल को भूतहा अस्पताल कहते है | इस अस्पताल का असली नाम विक्टोरिया अस्पताल है | इस अस्पताल को आज से करीबन 100 साल पहले अंग्रेजो ने बनवाया था | उस अस्पताल के सामने एक कब्रिस्तान है |

मेरे दादाजी ने मुझे बताया था कि आज से 60 साल पहले इस अस्पताल में ऑपरेशन के दौरान एक लडकी की मौत हो गयी थी | तब से उस लडकी की आत्मा उस अस्पताल में भटकती है |

रात ढलते ही कोई भी इन्सान उस रास्ते से नहीं गुजरता है क्यूंकि उस लडकी की आत्मा राहगीरों को परेशान करती है | हालंकि मै दादाजी की बताई पुरानी भूतहा कहानियों में ज्यादा विश्वास नहीं करता था | एक रात मै अपने दो दोस्तों अंकित और राजू के साथ रात को बाइक पर घूम रहा था तभी मेरे एक दोस्त ने मुझसे विक्टोरिया अस्पताल वाले रास्ते से चलने को कहा |

हम में से कोई भी ज्यादा भूत प्रेतों पर विश्वास नहीं करते थे और हमने उस रास्ते से जाने का पक्का किया | उस समय रात के 10 बज चुके थे | हम तीनो ने ये बात अपने परिवार वालो को नहीं बताने का वादा किया और उस रास्ते पर निकल पड़े | जैसे ही हम उस रास्ते से निकले रास्ते पर रेत होने की वजह से हमारी बाइक फिसल गयी और हम तीनो धडाम से बाइक से दूर गिर गए |

गनीमत थी कि हम लोगो को कोई चोट नहीं आयी थी |बाइक चला रहे मेरे दोस्त अंकित ने बोला कि उसका बैलेंस तो बराबर था फिर ये बाइक कैसे फिसल गयी |

हालंकि वो थोडा डर गया था तो मेरे दुसरे मित्र राजू ने बाइक चलाने को कहा | अब राजू बाइक चला रहा था | हम 1 किमी ही चले थे कि अचानक हमारी गाडी का टायर पंचर हो गया और गाडी की स्पीड तेज़ होने से गाडी इस बार फिर पिछली बार से भी दूर तक फिसलती गयी | इस बार हमे कोहनियों और घुटनों पर थोड़ी चोट आयी थी | अंकित फिर से बोला कि इस जगह में जरुर कोई गडबड है हम लोग वापस उल्टे चलते है |

लेकिन मैंने और राजू ने उसकी बात नहीं मानी और बाइक उठाकर पैदल चलना शुरू कर दिया| हम थोड़ी दूर ही चले थे कि अचानक किसी लडकी के चीखने की आवाज़े सुनाई दी | ये सुनकर हम रुक गए और अंकित बोला “यार तुम लोगो को चीखने की आवाज़ सुनाई दी क्या ??” हमने उसकी बातो को अनसुना कर कहा कि कोई जानवर की आवाज़ होगी |

पांच मिनट चलने के बाद फिर वोही चीख फिर से सुनाई दी | इस बार तो हम दोनों को भी थोडा डर लगने लगा | हम तीनो ने वापस चलने के बारे में सोचा लेकिन हम रास्ते के बीच में आ गये थे | पीछे चलने में 3 किमी और आगे चलने में 2 किमि ओर बाकी थे |

हम लोगो ने आगे जाने का सोचा | थोडा आगे चलने पर हमे बरगद के पेड़ के नीचे एक औरत दिखाई दी | इतनी रात को अकेली औरत को देखकर हमारे तो रौंगटे खड़े हो गये थे | हम लोगो ने पीछे मुड़ने का सोचा | तभी वो बुढी औरत चिल्लाई “बेटा रुको मुझे हाईवे तक का रास्ता बता दो ” |

हमने पूछा कि “इतनी रात को आप इस रास्ते से कैसे निकल रही हो “| तो उस बुढिया ने कहा कि “मै पड़ोस के गाँव की रहने वाली और मेरे पास पैसे नहीं है इसलिए मै पैदल ही निकल पडी , हाईवे के उस पार मेरा गाँव है ” | हमने उस बुढिया की बात का विश्वास कर लिया और आगे निकल पड़े | रास्ते में वो बुढिया हमसे सारी बाते पूछने लगी | बुढिया हम तीनो के पीछे चल रही थी हम तीनो दोस्त अब अपनी बात कर रहे थे |

तभी राजू बोला कि ” लो मांजी आपका रास्ता आ गया ” और वो जैसे ही पीछे मुड़ा तो वहा कोई नहीं था | हम तीनो की तो सिट्टी पिट्टी गुल हो गयी | हम बाइक को धक्का मारते हुए जोर से भागने लगे |

भागते भागते अंकित ठोकर खाकर गिर गया और हमे जोर से चीखे सुनाई दी |हमने भी बाइक को वही पटककर अंकित को साथ लेकर दौड़ने लगे और अस्पताल के पास कब्रिस्तान तक पहुच गए |

ये सब घटित होते 12 बज चुकी थी | हम पसीने से तर बतर हो गए थे और कब्रिस्तान पार कर एक मंदिर में रुक गए क्यूंकि अगर बिना बाइक के घर जाते तो जूते पड़ते | इसलिए उस रात मंदिर में ही रुक गए और सुबह होते ही बाइक लेकर अपने अपने घर आ गये और घर वालो दोस्त के यहा रुकने का बहाना बना दिया |

उस रात के बाद से हम उस रास्ते से कभी नहीं गए | मुझे आज भी सपनों में वो भूतिया बुढिया और चीखने की आवाज़े आती है |

समाप्त।

चुडेल की दुख भारी कहानी

रमेस बाबू अपने कार्यालय में अपनी सीट पर बैठकर फाइलों को उलट-पलट रहे थे।

उनका कार्यालय ग्रामीण क्षेत्र में था जहाँ जाने के लिए कच्ची सड़कों से होकर जाना पड़ता था। अरे इतना ही नहीं, कार्यालय के आस-पास में जंगली पौधों की अधिकता थी, कहीं कहीं तो ये जंगली पौधे इतने सघन थे कि एक घने जंगल के रूप में दिखते थे।

कार्यालय के मुख्य दरवाजे को छोड़ दें तो बाकी हिस्से पूरी तरह से घाँस-फूँस आदि से ढंके लगते थे। कार्यालय के कमरों की खिड़कियों आदि पर लंबे-लंबे घास-फूँसों का साम्राज्य था।

दिन में भी कार्यालय में एक हल्का अंधकार पसरा रहता था, जिससे ऐसा लगता था कि यह कार्यालय हरी-भरी वादियों में शांत मन से बैठा हुआ किसी गहरे चिंतन में डूबा हुआ हो। क्योंकि इस कार्यालय में कुल कर्मचारियों की संख्या मात्र 5 ही थी जिसमें से एक रामखेलावन थे, जो चपरासी के रूप में यहाँ अपनी सेवा दे रहे थे। रामखेलावन ही वह व्यक्ति थे जिनके कार्य-व्यवहार से यह शांत कार्यालय कभी-कभी मुखर हो उठता था और कर्मचारियों की हँसी-ठिठोली से जाग उठता था।

रामखेलावन जी, पास के ही एक गाँव के रहने वाले थे और प्रतिदिन कोई न कोई असहज घटना कार्यालय के बाकी 4 कर्मचारियों को सुनाया करते थे। वे विशेषकर जब भी कार्यालय में प्रवेश करते तो सबसे पहले रमेस बाबू के कमरे में जाते और राम-राम कहने के साथ ही शुरू हो जाते कि बाबू कल तो गाँव में गजब हो गया था। रमदेइया को जंगल में चुडैल ने पकड़ लिया था तो मनोहर का सामना एक भयानक भूत से हो गया था।

जबतक रामखेलावन जी सभी कर्मचारियों से मिलकर कुछ भूत-प्रेत, गाँव-गड़ा की बातें नहीं बता लेते, उन्हें कल (चैन) नहीं पड़ता था। कोई कर्मचारी रामखेलावन की बातों को सहजता से सुनता तो कोई केवल हाँ-हूँ करके उस ओर कान नहीं देता और उन्हें स्टोप जला कर चाय बनाने के लिए कह देता या पानी की ही माँग करके उनसे बचने की कोशिश करता।

पर रामखेलावन की बातों को रमेसर बाबू बहुत ही सजगता से सुनते और पूरा ध्यान देते हुए बीच-बीच में हाँ-हूँ करने के साथ कुछ सवाल भी पूछते। एक दिन की बात है, रामखेलावन जी कार्यालय थोड़ा जल्दी ही पहुँच गए और सीधे रमेस बाबू के कमरे में घुस गए। पर उस समय रमेसर बाबू अपनी कुर्सी पर नहीं थे, शायद वे अभी कार्यालय पहुँचे ही नहीं थे।

रामखेलावन थोड़ा डरे-सहमे लग रहे थे और बार-बार अपने माथे पर आ रहे पसीने को गमछे से पोछ रहे थे। वे ज्यों ही कमरे से बाहर निकले त्यों ही कार्यालय के प्रांगण में उन्होंने रमेस बाबू को अपनी साइकिल को खड़े करते हुए देखा।

वे दौड़कर रमेसर बाबू के पास पहुँच गए और बिना जयरम्मी किए ही हकलाकर, घबराकर बोले, “बाबू, बाबू! कल रात को तो गजब हो गया। मेरा पूरा परिवार आफत में आ गया है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूँ?” रमेसर बाबू ने उन्हें अपने कमरे की ओर चलने का इशारा करते हुए आगे-आगे तेज कदमों से अपने कार्यालय-कक्ष में प्रवेश किए।

फिर एक कुर्सी पर रामखेलावन जी को बैठने का इशारा करते हुए अपने झोले को वहीं मेज पर रखकर एक गिलास में पानी लेकर कक्ष के बाहर आकर हाथ-ओथ धोए। उसके बाद कमरे में लगे हनुमानजी की फोटो को अगरबत्ती दिखाने के बाद अपनी कुर्सी पर बैठते हुए रामखेलावनजी से बोले,

“रामखेलावनजी, अब अपनी बात पूरी विस्तार से बताइए।”

उनकी अनुमति मिलते ही रामखेलावनजी कहना शुरू किए, “बाबू, कल मैं जब शाम को घर पर पहुँचा तो पता चला की मेरी बहू कुछ लकड़ी आदि की व्यवस्था करने जंगल की ओर गई थी और वहीं उसे किसे चुड़ैल ने धर लिया था। वह इधर-उधर जंगल में भटक रही थी तभी कुछ गाँव के ही गाय-बकरी के चरवाहों की नजर उस पर पड़ी। वे लोग स्थिति को भाँप गए और मेरी बहू को पकड़कर घर पर छोड़ गए। फिर गाँव के ही सोखा बाबा ने झाँड़-फूँक की उसके बाद उस चुड़ैंल से छुटकारा मिला।

पर आज सुबह फिर से उस पर चुड़ैल हावी हो गई है, सुबह से ही सोखा बाबा उसे उतारने में लगे हैं, पर वह छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं?” रामखेलावन की बातों को सुनकर रमेस बाबू थोड़े गंभीर हुए और अचानक पता नहीं क्या सूझा कि हँसने लगे।

रमेस बाबू की यह हालत देखकर रामखेलावनजी तो और भी हक्के-बक्के हो गए। उन्हें समझ में नहीं आया कि आखिर इनको क्या हो गया, कहीं इनपर भी तो किसी भूत-प्रेत का साया नहीं पड़ गया? अभी रामखेलावनजी यही सब सोच रहे थे तभी रमेस बाबू अपनी कुर्सी पर से उठे और बिना कुछ बोले रामखेलावन को अपने पीछे आने का इशारा करते हुए कमरे से बाहर निकल गए।

कमरे से बाहर निकल कर रमेसर बाबू पास की ही एक झाँड़ी से कुछ पत्तों को तोड़ा और मन ही मन कुछ मंत्र बुदबुदाए फिर रामखेलावन को उन पत्तों को देते हुए बोले कि आप इसे पीसकर अपनी बहू को पिला दें, और अपने घर पर ही रूकें। मैं कार्यालय में कुछ जरूरी काम-काज निपटाकर अभी 1-2 घंटे में आपके घर पर पहुँचता हूँ। रामखेलावनजी बिना कुछ बोले, केवल सिर हिलाए और उन पत्तों को लेकर घर की ओर बढ़ें। रास्ते में उन्हें केवल एक ही बात खाए जा रही थी कि रमेसर बाबू को यहाँ आए 3 साल हो गए पर कभी उन्होंने इस बात का जिक्र नहीं किया कि वे भूत-प्रेतों को उतारना भी जानते हैं।

कहीं वे मजाक में तो इन पत्तों को तोड़कर, झूठ-मूठ में कुछ बुदबुदाकर मुझे नहीं दे दिए? पर रमेस बाबू ऐसा नहीं कर सकते, वे तो बहुत गंभीर आदमी हैं, और हमारी सारी बातों को भी तो बहुत गंभीरता से लेते हैं और समय-समय पर हर प्रकार से हमारी मदद भी तो करते रहते हैं। ना-ना, वे मेरे साथ मजाक नहीं कर सकते।

यही सब सोचते-सोचते रामखेलावनजी घर पर पहुँच गए। घर के बाहर 10-15 गाँव-घर के ही लोग बैठे नजर आए। एक खटिया पर सोखा बाबा भी बैठकर लोगों से कुछ बात-चीत कर रहे थे। रामखेलावनजी को देखते ही सोखा बाबा बोल पड़े, “रामखेलावन, यह चुड़ैल तो बहुत ढीठ है, रात को छोड़ तो दी थी पर सुबह फिर से आ गई। 2-3 घंटे मैंने कोशिश किया पर छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है,

अभी भी आंगन में नाच-कूद रही है। मेरे मंत्रों का अब तो उस पर कुछ असर भी नहीं हो रहा है, यहाँ तक कि मेरा भी मजाक उड़ा दी। इतना सब होने के बाद मैं उसे छोड़कर बाहर आकर बैठ गया हूँ। मैं अब कुछ नहीं कर सकता। मेरा जितना पावर था, वह सब अजमा लिया।” रामखेलावनजी सोखा बाबा के ही बगल में बैठते हुए अपनी लड़की को आवाज लगाए, उनकी लड़की घर में से दौड़ते हुए बाहर निकली।

फिर रामखेलावनजी ने उन पत्तों को उसे देते हुए कहा कि अभी इसे पीसकर बहू को पिला दो। अगर ना-नूकर करती है तो जबरदस्ती पिलाओ। इसके बाद रामखेलावन की लड़की उन पत्तों को लेकर घर में गई तथा उन पत्तों को पीसकर अपनी भाभी को पिलाई। अरे यह क्या, एक घूँट अंदर जाते ही रामखेलावन जी की बहू तो काफी शांत हो गई और वहीं आंगन में ही एक तरई पर बैठ गई।

अब उसके व्यवहार में काफी अंतर आ गया था। उसका कूदना-नाचना बंद हो गया। रामखेलावनजी की लड़की दौड़ते हुए घर में बाहर निकली और रामखेलावनजी की ओर देखकर बोली, “बाबू, बाबू! भउजी को अब आराम हो गया है, वे आंगन में ही अब शांति से बैठ गई हैं।” बाहर जितने लोग बैठे थे, वे सब हतप्रभ हो गए।

आखिर जो चुड़ैल इतने बड़े सोखा से बस में नहीं आई, वह दो-चार पत्तों को पिलाने से कैसे बस में आ सकती है? आखिर वे कैसे पत्ते थे? क्या किसी धर्म-स्थान से लाए गए थे या किसी बहुत बड़े पंडित, ओझा, सोखा आदि ने दिए थे? वहाँ बैठे लोगों में से एक ने रामखेलावनजी की ओर देखा पर कुछ बोले इससे पहले ही रामखेलावनजी ने उन पत्तों के बारे में बता दिया।

सभी लोग बिन देखे उस रमेस बाबू के प्रति नतमस्तक हो गए। सोखा बाबा ने कहा कि वास्तव में आपके रमेस बाबू तो बहुत पहुँचे निकले। जिस चुड़ैल को बस में करने के लिए मैंने सारे के सारे हथकंडे अपना लिए, उसे उनके मंत्रित दो-चार पत्तों ने बस में कर लिया। फिर तो रामखेलावनजी थोड़ा तन कर बैठ गए और लगे रमेसर बाबू का गुणगान करने।

अभी वे लोग आपस में बात कर ही रहे थे तभी रमेस बाबू की साइकिल वहाँ रूकी। रमेस बाबू को देखते ही रामखेलावनजी दौड़कर रमेसर बाबू के हाथ से साइकिल लेकर खुद ही खड़ी करते हुए बोले, रमेस बाबू, आपके पत्तों ने तो कमाल कर दिया। अब बहू काफी अच्छी है और शांति से आंगन में बैठी है।

रमेस बाबू के इतना कहते ही वहाँ बैठे सभी लोग खड़े हो गए और रमेस बाबू की जयरम्मी करने लगे। रमेस बाबू सबका अभिवादन स्वीकार करते हुए उन लोगों के बीच ही एक खाट पर बैठ गए।

फिर रमेस बाबू ने रामखेलावनजी की बहू को घर में बाहर बुलवाया। वह काफी शांत थी पर रमेस बाबू को लगा कि अभी भी वह चुड़ैल यहीं है और पत्ते का असर खत्म होते ही फिर से इसे जकड़ लेगी। रमेस बाबू ने रामखेलावनजी की बहू को अपने पास बैठने का इशारा करते हुए कुछ मंत्र बुदबुदाने लगे।

अरे यह क्या, रामखेलावनजी की बहू घबराकर बोल उठी, मुझे छोड़ दीजिए, मैं जा रही हूँ, मैं अब कभी भी इसे नहीं पकड़ूँगी। मुझे जाने दीजिए, मुझे जाने दीजिए, मैं जल रही हूँ, मुझे छोड़ दीजिए। उस चुड़ैल को इस तरह गिड़गिड़ाते हुए देखकर रामखेलावनजी की काफी हिम्मत बढ़ गई।

वे बोल पड़े, रमेस बाबू, इसे छोड़िएगा मत। इसे जला कर भस्म कर दीजिए। पर वह चुड़ैल रामखेलावनजी की ओर ध्यान न देते हुए, रमेस बाबू की ओर दयनीय स्थिति में देखते हुए अपने प्राणों की भीख माँगती रही। रमेसर बाबू काफी गंभीर लग रहे थे। वे रामखेलावनजी की बहू की ओर गुस्से से देखते हुए बोले कि तुम कौन हो और इसे क्यों पकड़ीं?

इस पर वह चुड़ैल गिड़गिड़ाते हुए बोली की मैं पास के ही जंगल में रहती हूँ। मैं बंजारा परिवार से हूँ, एकबार हमारे परिवार ने इसी जंगल के बाहर अपना टेंट लगाया था। शाम के समय मैं लकड़ी लेने जंगल में प्रवेश की। मुझे पता नहीं चला कि कब मैं घने जंगल में पहुँच गई और रास्ता भी भटक गई। तब तक रात भी होने लगी थी। जंगल में पूरा अंधेरा पसरना शुरू हो गया था। मैं थोड़ी डर गई थी पर हिम्मत नहीं खोई थी। अचानक मेरे दिमाग में एक विचार आया।

मैंने सोचा कि रात के इस अंधेरे में अब रास्ता खोजना ठीक नहीं। कहीं किसी जंगली जानवर की शिकार न हो जाऊँ। इसलिए मैंने हिम्मत करके वहीं एक मोटे जंगली पेड़ पर चढ़कर बैठ गई। मैंने सोचा कि सुबह होते ही मेरे परिवार के लोग जरूर मुझे खोजने आएंगे और अगर नहीं भी आए तो मैं दिन में अपना रास्ता खोज लूँगी।

पर वह रात शायद मेरे जीवन की समाप्ति के लिए ही आई थी। मैं जिस पेड़ पर चढ़कर बैठी थी, उसी पर एक प्रेत का डेरा था। आधी रात तक तो सब कुछ एकदम ठीक-ठाक था पर उसके बाद अचानक वह प्रेत कहीं से उस पेड़ पर आ बैठा।

उसके आते ही जैसे पूरे जंगल में भयंकर तूफान आ गया हो। अनेकों पेड़ों की डालियाँ तेज हवा से डरावने रूप से हिलने लगी थीं। मुझे देखते ही वह जोरदार ढंग से अट्टहास किया और मुझे कोई प्रेतनी ही समझ कर बोला कि तुम्हें पता नहीं कि यह मेरा निवास है।

मैं कुछ जरूरी काम से जंगल से बाहर क्या गया, तूने मेरे बसेरे पर कब्जा कर लिया। मैं तूझे छोड़ूँगा नहीं, इतना कहकर वह मेरे तरफ झपटा, अत्यधिक डर से तो मेरी चींख निकल गई।

मैं बहुत तेज चिल्लाई की मैं कोई प्रेतनी नहीं हूँ। मैं इंसान हूँ इंसान। मेरी बातों को सुनकर तो वह और जोर से अट्टहास करने लगा और बोला कि मुझे एक संगिनी चाहिए। तुझे अगर सही-सलामत रहना है तो मुझसे विवाह करना होगा। मरता क्या न करता।

मैंने सोचा कि अब इस समय बस एक ही रास्ता है कि इसकी बातों को मान लिया जाए और दिन उगने के बाद यहाँ से खिसक लिया जाएगा। मैंने उसके हाँ में हाँ मिलाते हुए अपनी सहमति दे दी। मुझे क्या पता था कि यह सहमति मुझपर बहुत भारी पड़ेगी। इतना कहने के बाद रामखेलावन की बहू पर सवार वह चुड़ैल फूट-फूटकर रोने लगी।

रमेस बाबू थोड़े भावुक हो गए और उसके प्रति थोड़ी नरमी दिखाते हुए पानी भरा लोटा उसको पीने के लिए दे दिए। दो-चार घूँट पानी पीने के बाद उसने फिर से कहना शुरू किया। मेरी सहमति देने के बाद वह प्रेत पता नहीं कहाँ गायब हो गया, उसके गायब होते ही मैंने थोड़ीं चैन की साँस ली पर यह क्या अभी 10-15 मिनट भी नहीं बीते होंगे कि उस जंगल में जैसे भूचाल आ गया हो।

एक बहुत बड़ा तूफान आ गया हो। कितने पेड़ों की पता नहीं कितनी डालियाँ टूटकर धरती पर पड़ गईं। कम से कम सैकड़ों भूत-प्रेत वहाँ उपस्थिति हो गए थे। चारों तरफ चीख-पुकार मचा हुआ था। कुछ डरावनी अट्टहास कर रहे थे तो कुछ इस डाली से उस डाली पर कूद-फाँद रहे थे, तो कुछ ताली बजाकर नाच रहे थे। मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है।

तब तक वही प्रेत फिर से मेरे पास प्रकट हुआ और बोला की विवाह की व्यवस्था करने चला गया था। अपने परिवार वालों को बुलाने चला गया था। शादी में इन सबको भी तो शरीक करना होगा। अरे यह क्या अब तो मेरी शामत आ गई। पूरा शरीर पीला पड़ गया।

कुछ बोलने की हिम्मत नहीं रही, तभी अचानक एक प्रेतनी वहां प्रकट हुई और उस प्रेत से लड़ने लगी। वह प्रेतनी बोल रही थी कि मेरे रहते तूँ दूसरी शादी करेगा, कदापि नहीं, कदापि नहीं। मैं ऐसा नहीं होने दूँगी और इतना कहने के साथ ही उस प्रेतनी ने उस डाल से मुझे धक्का दे दिया और जमीन पर गिरने के कुछ ही समय बाद मेरी इहलीला समाप्त हो गई थी।

इतने कहने के साथ ही वह चुड़ैल फिर से रोने लगी थी। इसके बाद रमेस बाबू ने उस चुड़ैल को चुप रहने का इशारा करते हुए कहा कि आज के बाद तूँ इन गाँव वालों को कभी परेशान नहीं करोगी। चुड़ैल ने हामी भरते हुए कहा कि ठीक है। पर मैं तो एक बहुत ही छोटी आत्मा हूँ। इन पास के जंगलों में पता नहीं कितनी भयानक-भयानक आत्माएँ विचरण करती हैं। आप उन सबसे इस गाँव वालों को कैसे बचा पाएँगे।

उस चुड़ैल की इस बात को सुनते हुए रमेस बाबू हल्की मुस्कान में बोले। तूँ तो बकस इन लोगों को, बाकी भूत-प्रेतों से कैसे निपटना है, वह तूँ मुझपर छोड़। इसके बाद रमेस बाबू ने लोगों को अब कभी न पकड़ने की बात उस चुड़ैल से तीन बार कबूल करवाई तथा साथ ही उसे थूककर चाटने के बाद ही जाने दिया।

तो पाठकगण, रमेस बाबू ने उस चुड़ैल से तो गाँव वालों को छुटकारा दिला दिया पर क्या वे दूसरे भूत-प्रेतों से उन गाँव वालों की रक्षा कर पाए??? राज को राज ही रहने दिया जाए। खैर आप लोग बताएँ कि यह भूतही काल्पनिक कहानी आप लोगों को कैसी लगी???

जय बजरंग बली।

समाप्त!

डर से भी बड़ा डर

खड़ खड़--खड़ खड़..ट्रेन द्रुत गति से भागी चली जा रही थी।

संध्या काल का समय था,

तेज बारिश और बीच बीच मे बिजली की चमक वातानुकूलित कोच की खिड़कियों से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी। केबिन का एकांत और यह भयावह मौसम मुझ जैसे डरपोक आदमी को और डरा रहा था। थोड़ी देर बाद गाड़ी के पहियों की रफ़्तार कम हुई और एक मध्यम से स्टेशन पर गाड़ी रुकी।

बारिश इतनी ज्यादा थी कि मैं स्टेशन का नाम नहीं पढ़ पा रहा था।मैं अपने केबिन मे अकेला था और इस उधेड़बुन मे था की कोई सह यात्री आये, जिससे वार्तालाप करते करते आगे का रास्ता आसानी से काटा जा सके और एक अंदरुनी भय जो मेरे अंदर जागृत हो चुका है उससे मुझे निजात मिल सके।

तभी किसी ने केबिन का दरवाजा खटखटाया और एक शांत सा दिखने वाला व्यक्ति केबिन मे दाखिल हुआ।अपना सामान आदि व्यवस्थित करने के बाद वो मेरी तरफ देख कर मुस्कराया और मेरी तरफ हाथ आगे बढ़कर उसने अपना परिचय दिया.. मैं मिस्टर घोष...।

वो बोला -मैं कोलकाता जा रहा हूँ..पुनर्जन्म से सम्बंधित एक कार्यशाला मे भाग लेने के लिए।मैंने उसे बताया कि मैं कानपुर मे व्याख्याता के पद पर हूँ और पटना जा रहा हूँ। उसने कुछ खाने का सामान निकाला और मुझसे भी खाने हेतु आग्रह किया।किन्तु मैं बहुत ही सशंकित व्यक्तित्व का प्राणी.. ट्रेन मे किसी अजनबी के द्वारा दिए गए खाने को लेना असंभव था

मेरे लिए।मैंने बहुत विनम्रता से उसके आग्रह को ठुकराया। वो भी कम उस्ताद नहीं था ...कस कर हँसा और बोला- संशय कर रहे हैं मेरे ऊपर,अभी तो कुछ नहीं देखिये आगे क्या क्या होता है। उसके यह शब्द सुन कर मुझे सांप सूंघ गया किन्तु मैंने किसी तरह अपनी घबराहट को छिपाया।

कोई स्टेशन आने पर वो उतरता और ट्रेन चलने के बाद किसी दूसरे कम्पार्टमेंट से चढ़ कर फिर आ जाता। पूछने पर बोलता की बीच बीच मे रेलवे की नौकरी भी कर लेता हूँ।थोड़ी देर बाद मैं और वह विभिन्न विषयों पर चर्चा करने लगे।

उसने पुनर्जन्म से सम्बंधित बातें प्रारम्भ कीं और पुनर्जन्म को अन्धविश्वास बताया।थोड़ी देर बाद उसने मुझसे पूछा की क्या आप भूत-प्रेत पर विश्वास करते हैं?

मैंने कहा-बिल्कुल।वो जोर से हँसा और बोला यह सब बकवास है।मुझे भूतों पर विश्वास था किन्तु वो भूतों के अस्तित्व को नकारता रहा। रात अपने यौवन पर पहुँच चुकी थी,चर्चा उपरांत मैं वातानुकूलित प्रथम श्रेणी के कक्ष मे सोने का प्रयास कर रहा था।

अचानक मुझे ऐसा अनुभव हुआ की कोई मेरे गले पर गर्म अंगार रख रहा है।.मैं हड़बड़ा कर उठा ...कहीं कोई नहीं...मेरे अलावा उस कक्ष मे मेरा वही सह यात्री था जो सामने की बर्थ पर लेटा घोड़े बेंचकर सो रहा था। मैं फिर सोने का प्रयास करने लगा।

अभी आँख लगी ही थी की मुझे अपने पेट पर बहुत तेज दबाव और हंसने की तेज आवाज सुनाई दी। मैं घबराकर उठा तो देखा की सहयात्री बर्थ पर नहीं था।लगभग एक दो मिनट बाद वो आया और बोला जनाब सोये नहीं... मैंने अपनी घबराहट रोकते हुए उससे कहा अभी नींद नहीं आ रही और मैंने अपने बैग से एक मैग्जीन निकाली और पढ़ने का नाटक करने लगा।

सहयात्री भी बर्थ पर लेट गया और कुछ देर मे उसके खर्राटे केबिन मे गूंजने लगे।मैं भी थोडा निश्चिन्त हुआ और बर्थ पर आँख बंद कर लेट गया। ट्रेन कभी धीमी होती कभी रफ़्तार पकड़ लेती लेकिन मेरे दिल ने अब तेज रफ़्तार ही पकड़ रखी थी...,

भय और घबराहट के कारण लघुशंका की इच्छा अपने आप जीवित हो जाती है..और मैं टॉयलेट की तरफ मुड़ जैसे ही मैंने टॉयलेट का दरवाजा खोला वो सहयात्री मुझे अंदर दिखा और मैं चिल्लाते हुए अपनी बर्थ की तरफ भागा... ,

देखा तो वो सहयात्री इत्मिनान से अपनी बर्थ पर सो रहा है...मैंने घबराहट मे उसे जगाया...वो बोला..अरे क्या हुआ ? इतना मासूम लग रहा था , वो जैसे कुछ जानता ही ना हो....

मैंने कहा- आप यहाँ भी और वहां टॉयलेट मे भी....

वो कुटिलता से हँसा और बोला -मैं कितने रूप मे कहीं पर भी रह सकता हूँ। घबराहट के मारे मैं पसीने से तर बतर..बिल्कुल निर्जीव सा खड़ा उसके सामने।वो बोला -तुम्हें भूतों पर विश्वास था ना..

तुम्हे तुम्हारे विश्वास का प्रमाण देना था।तुम्हारे जैसे लोगों के कारण ही हम भूत-पिशाच लोगों का अस्तित्व है...इतना कहकर वो मेरी आँखों के सामने से अचानक गायब हो गया।

मैं डर के मारे अवाक् और निर्जीव सा अपनी बर्थ पर बैठा था।तभी केबिन के अंदर टिकट निरीक्षक आया उसका चेहरा देखकर मुझे बेहोशी छाने लगी क्योंकि यह वही सहयात्री था मेरा..और वो टिकट चेक कर मुस्कराता हुआ चला गया...

समाप्त!

अधजला खंडहर

बात उन दिनों की है जब मैं कॉलेज का स्टूडेंट था| अपने कॉलेज की ओर से हम सभी कैम्प के लिए एक जंगल में गए थे| , हलकी ठंढ थी ; अत: रात में हम सबने पूरी रात कैम्प – फायर के साथ डांस करने ,गाने आदि का प्रोग्राम तय किया| मुझे और सभी साथियों को कैम्प फायर के लिए लकडियाँ इकट्ठी करने का भार सौंपा गया| मैं निकला तो सबके साथ ही लेकिन जंगल के प्राकृतिक सौन्दर्य में भटकता हुआ अकेले बहुत दूर कहीं निकल गया|

अचानक आसमान बादलों से भर गया और गरज के साथ बारिश होने लगी| बादलों के लगातार गरजने से मैं पेड़ के नीचे खड़ा रहना मुनासिब न समझ आसपास किसी घर की तलाश में एक दिशा में भागने लगा|मुझे कुछ ही दूरी पर एक लाल ईंटों से बनी शानदार बिल्डिंग नजर आई| , बिल्डिंग रोशनी से पूरी नहाई हुई थी और उसमें ढेर सारे लोग हैं – ऐसा दूर से ही लग रहा था| मैं तेजी से भागते हुए उस बिल्डिंग में जा घुसा और सामने से आती हुई एक खुबसूरत नर्स से टकराते – टकराते बचा| नर्स ने मुझे घूर कर देखते हुए कहा – “ बहुत अधिक भीग गए हो ,सर्दी लग जायेगी| उधर बाईं ओर एक स्टोर रूम है ; वहां जाकर जो भी मिले उससे कहना सिस्टर जूलिया ने दुसरे सूखे और साफ़ कपडे मुझे देने को कहा है – वह तुम्हे कपडे दे देगा|

“ मैं हक्का – बक्का मुंह फाड़े सिस्टर जूलिया को देखता रहा| मुझे एकदम से यह समझ नहीं आया कि मैं क्या करूँ| मेरी स्थिति देखकर सिस्टर जूलिया खिलखिलाकर हंस पड़ी और बोली – “पहले तो तुम अपना मुंह बंद करो वरना मुंह में मच्छड घुस जायेंगे और अब जाकर वीसा ही करो जैसा मैं ने कहा है|

” मैं हलके से ‘हाँ ‘ में सर हिला सिस्टर की बताई दिशा में जाने को मुद गया|अभी कुछेक दस कदम ही चला होउंगा कि मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रखा| मैं चौंककर पीछे मुदा और अपने सामने आर्मी की वर्दी में एक युवक को खडा मुस्कुराता पाया| मेरे चेहरे पर आश्चर्य का बादल अपना घर बना चुका था ;

जिसे देखते ही उस युवक को हंसी आ गई| उसने धीमे ,किन्तु दृढ स्वर में कहा – “ मैं कैप्टन विनोद हूँ और यह हमारे देश की आर्मी का हॉस्पिटल है|’ कैप्टन विनोद की बातों ने मुझे आश्वस्त किया| मैं अब धीरे – धीरे सामान्य हो गया और मैं ने कैप्टन विनोद को सिस्टर जूलिया की कही बातें बताई| सुनकर ,कैप्टन विनोद के चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान फ़ैल गई और वे बोले –

“ तो सिसितर जूलिया से भी मिल चुके|”

“ जी , क्या मतलब है आपका ?”

“ कुछ नहीं ,चलो मैं तुम्हे सूखे कपडे देता हूँ चेंज कर लो नहीं तो सच में सर्दी लग जायेगी|

” और मैं कैप्टन विनोद के पीछे – पीछे एक बड़े से कमरे में पहुँच गया| कमरे के चारो ओर हरे रंग के परदे लगे हुए थे| ,

एक ओर एक बड़ा सा बेड पडा हुआ था और उसके सामने एक सोफा था| बीच में एक टेबल था जिस पर दो ग्लास ,एक बड़ी बोतल ब्रांडी की और एक या दो पत्रिकाएं पड़ी हुई थीं|कमरे के एक कोने में एक बड़ी सी अलमारी थी ;जिसमें से कैप्टन विनोद ने एक आसमानी रंग का कुरता – पायजामा निकालकर मुझे दिया और कमरे से लगे बाथरूम की ओर इशारा किया|

मैं बाथरूम से कपडे चेंज कर जैसे ही निकलने लगा मेरी नजर बाथरूम की एक दीवाल पर पड़ी| वह खून के छींटों से भारी हुई थी| यह देखकर मैं घबडा गया और जल्दी से बाहर निकलने को मुदा कि बाथरूम में लगे आईने में खुद को ही देखकर चौंक गया|

आईने में मेरा पूरा शरीर तो नजर आ रहा था लेकिन मेरे शरीर पर से मेरा सर गायब था|

अब मुझे डर लगने लगा और मैं हडबडा कर बाथरूम से निकल गया| ,

मुझे इस तरह बाहर निकलते देख कैप्टन विनोद ने हंसकर पूछा – “ क्या हुआ ?

अरे हाँ ,तुम ने तो अब तक मुझे अपना नाम ही नहीं बताया|”

“ कहाँ जाओगे ,

बाहर बहुत तेज बारिश हो रही है| लेकिन ,तुम जाना क्यों चाहने लगे अचानक यह मैं समझ नहीं पा रहा हूँ|”

“ कैप्टन विनोद आपकी बाथरूम की एक दीवाल पूरी खून के छींटों से भरी हुई है| और और आपके बाथरूम में लगा आईना भी कुछ अजीब सा है| उसमें मुझे मेरा पूरा शरीर तो दिखाई दिया लेकिन मेरा सर ही गायब था| मैं अब बिलकुल भी नहीं रुकुंगा यहाँ| बारिश में ही भीगता हुआ अपने कैम्प तक जाऊँगा|

” कहते हुए मैं कमरे से बाहर जाने वाले दरवाजे की ओर बढ़ा| “ रुको “ तभी कैप्टन विनोद की कडकती आवाज गूंजी “ तो तुमने सबकुछ देख ही लिया|”

“जी क्या मतलब है आपका ?

” मेरी आवाज में डर भर गया था|

“ मतलब चाहे जो हो|तुम तब तक यहाँ से नहीं जा सकते जबतक मैं तुम्हे कुछ बता न दूं|”

“ क्क्कक्या बताना चाहते हैं आप ?”

“ जो आजतक कोई न जान सका|”

“ जो आज तक कोई न जान सका वह मैं जानकार क्या करूंगा| प्लीज ,अब मुझे जाने दें|”

– मैं डर से रुआंसा हो गया| “नहीं , बिलकुल भी नहीं| और , तुम्हे मुझसे डरने की भी कोई जरुरत नहीं| सैनिक सबकी रक्षा के लिए होते हैं| मैं भी तुम्हारी सुरक्षा ही कर रहा हूँ|”

- कैप्टन विनोद के स्वर में कोमलता थी – “ आओ मेरे साथ इस सोफे पर बैठ जाओ| मैं तुम्हे एक कहानी सुनाता हूँ| कहानी खत्म होते ही मैं तुम्हे तुम्हारे कैम्प तक जीप से छोड़ आऊंगा| वैसे भी तुम अपने साथियों से काफी आगे निकल आये हो|वहां तक तुम अब चलते हुए शायद पहुँच न पाओ|

” कैप्टन विनोद के स्वर में जाने कैसी आश्वस्ति थी मैं जाकर उनके बगल में बैठ गया| कैप्टन विनोद ने कहना शुरू किया –

“दुश्मनों ने धोखे से हमारे अस्पताल को अपना निशाना बनाया| दुश्मन देश के दो सैनिक हमारे सैनिक के वेश में एक हमारे ही घायल सैनिक को लेकर आये| वह घायल था और और हमारे देश की सेना ने उसे बहुत ढूंढा लेकिन नहीं मिला था| शायद , साजिश के तहत उसे घायल होते ही घुसपैठियों ने कहीं छुपा दिया था|

अचानक अपने खोये सैनिक को अपने हॉस्पिटल में पा सभी खुश हो गए और बिना अधिक पड़ताल किये हॉस्पिटल के गेस्ट रूम में घायल को लेकर आने वाले छद्म वेष धारियों को ठहरने की इजाजत दे दी गई|

अभी उस सैनिक का इलाज चल ही रहा था कि जोरों का ब्लास्ट हुआ और पूरा हॉस्पिटल एक पल में खंडहर में तब्दील हो गया|” “ लेकिन हॉस्पिटल तो अपनी शानदार स्थिति में खडा है|

“ मेरी बातों को अनसुना कर कैप्टन विनोद ने अपनी बात जारी रखी – “ कोई नहीं बचा उस ब्लास्ट में| दीवाल पर पड़े खून के छींटे भी उसी ब्लास्ट में मारे गए हॉस्पिटल के कर्मचारियों के हैं|” “ हाँ , पर यह हॉस्पिटल तो मुझे खंडहर नहीं दिखता|

” जवाब में कैप्टन विनोद के चेहरे पर रहस्य भरी मुस्कान फ़ैल गई और उनका चेरा अजीब से भावों से भर गया| मैं उनके चेहरे को देखकर अन्दर से दहल गया|

फिर भी , मैं ने हिम्मत कर पूछा –

“ आप उस ब्लास्ट में बच कैसे गए ?” सुनते ही कैप्टन विनोद ठहाका लगा कर हंस पड़े और मुझ पर एक भरपूर नजर डालते हुए कहा –

“ यह कहानी आज से मात्र दस वर्ष पहले की है और मैं तो आज से पचास वर्ष पहले मर चुका हूँ|

” इसके आगे उनहोंने क्या कहा – मुझे कुछ नहीं मालुम|, चेहरे पर गीलेपन का अहसास जब काफी हुआ तो मैं जैसे नींद से जागा| मुझे घेरे हुए मेरे सभी सहपाठी और टीचर खड़े थे| मेरे आँख खोलते ही मेरे सर ने कहा –

“ थैंक गॉड ! तुम्हे होश आ गया|”

“ तो क्या मैं बेहोश था ?”

“ हाँ , तुन जंगल में जाने कहाँ भटक गए थे| जब सभी लौट आये और तुम नहीं आये तो हम सभी मिलकर तुम्हें ढूँढने निकले| काफी दूर जाने के बाद हमने एक जीप आती दिखाई दी जिसमें एक आर्मी मैन तुम्हे पीछे की सीट पर सुलाए हुए हमारे कैम्प को ढूंढते हुए आ रहे थे| उनहोंने हम सबको भी अपनी जीप पर बिठाया और कैम्प तक्ल छोड़ा|

हमने उन्हें काफी रोकने की कोशिश की लेकिन वे यह कहते हुए चले गए अभी नहीं रुक सकता एक जरुरी काम है|” जब हमने तुम्हारे बेहोश जाने और उन तक तुम्हारे पहुँचने के बारे में पूछा तो बोले – “ सोमेश ही बताएगा और जो भी बताएगा वह सब अक्षरश: सच होगा|

सबकी उत्सुक निगाहें अपनी ओर लगी देख मैं ने धीमे स्वर में पूछा -- + क्या उनका नाम कैप्टन विनोद था ?” सर ने “ हाँ “ में सर हिलाया| मैं ने सबको उधर चलने को कहा जिधर से सबने जीप आती देखी थी| पहले तो सर तैयार नहीं हुए लेकिन मेरे बहुत कहने पर वे राजी हो गए|

सुबह होते ही हम उधर की ओर गए| मैं उस जगह पर पहुँच कर गहरे आश्चर्य में डूब गया| वहां एक अधजला खंडहर था : जिसके एक टूटे पत्थर पर लिखा था “ आर्मी हॉस्पिटल “|,

समाप्त!

उलझे बालों वाली लड़की

लिया और कहने लगी प्लीज अल्बर्ट डोंट गो डोंट लीव मी , पर उस आदमी पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, सारा का चेहरा लाल हो गया था,

अचानक वो आदमी खड़ा हुआ, और मेरी ओर बढने लगा मैं जड़ थी जैसे मेरे आँखों के सामने कोई पिक्चर चल रही थी, तभी सारा के हाथ मे, ना जाने कहा से बन्दुक आ गई थी सारा फिर बोली अल्बर्ट स्टॉप. पर वो आदमी आगे बढ़ता ही जा रहा था. और फिर एक धमाका और ढेर सा धुँआ, और तब पहली बार मेरे गले से चीख निकली विक्रम और शिब्बू भागते हुए मेरे पास आये,

मैं उस कमरे मैं जड़ खड़ी हुई थी और लगातार चीखे जा रही थी वहां कुछ भी नहीं था, विक्रम मुझे उठा कर अपने कमरे मे लाया, मुझे पानी पिलाया, मैं पसीने मैं भीगी हुई थी, वो बार बार मुझसे पूछ रहा था क्या हुआ? क्या हुआ? पर मैं कुछ बता नहीं पा रही थी, फिर कब मैं बेहोश हो गई पता नहीं लगा !

जब मेरी आँख खुली सवेरा हो गया था विक्रम परेशान सा मेरे सिरहाने बैठा हुआ था रूम के दूसरे कोने मैं शिब्बू दिवार से सर लगा कर ऊंघ रहा था, मैंने उठने की कोशिश की तो विक्रम ने मेरी मदद की ऐसा लग रहा था जैसे मैं सदियो से बीमार हु बहुत कमज़ोरी लग रही थी. शिब्बू को विक्रम ने काफ़ी बना कर लाने को कहा, फिर मुझे बाहों मे भरते हुए कहा क्या हुआ था ? रुबिन तुम रात को वहां क्यों चली गई थी ?

मैंने सारी बात बता दी विक्रम सुन कर सन्न रह गया, उसने जैसे तैसे पैकिंग की मुझे सहारा दे कर तैयार करवाया और हम निकल पड़े कॉटेज से जैसे जैसे दूर जा रहे थे मेरे शरीर मे जैसे जान आती जा रही थी हम बाजार मे पहुच गए, विक्रम ने उस छोटे से ढाबे पर गाड़ी रोक दी वो बुड्डा चाय बना लाया विक्रम और मेरी सफ़ेद शक्ल देख कर वो बोला साहब हम तो पहले ही दिन आपको बताने वाले थे पर शहर के लोग ऐसे बातो को कहा मानते हो,

फिर जो उसने कहानी सुनाई

वो इस प्रकार थी-

यह बात उस ज़माने की है, जब अंग्रेज भारत छोड़ कर जाने वाले थे यह कॉटेज अंग्रेज अफसर अल्बर्ट केथ की थी उसकी फॅमिली इंग्लैंड में थी वो लगभग ४० साल का हट्टा कट्टा आदमी था, कुछ साल पहले वो बंगाल से एक एंग्लोइण्डियन लड़की सारा को अपने साथ ले आया था,

वो बेचारी उससे बहुत प्यार करती थी पर जब अंग्रेज भारत छोड़ कर जाने लगे तो अल्बर्ट सारा को छोड कर जाने लगा उसे वो साथ कैसे ले जाता इंग्लैंड मैं उसकी बीवी और ४ बच्चे थे ! सारा सारी जिन्दगी जिसे प्यार समझ रही थी वो तो बस मन बहलाव था,

उसने बहुत कोशिश की अल्बर्ट ना जाये पर वो ना माना और फिर सारा ने उसे गोली मार दी और खुद वॉटरफॉल से छलाँग मार कर आत्महत्या कर ली। तब से ही उनकी आत्मा भटक रही है ! मैं सारे रास्ते यही सोचती हुई आई की, क्यों सारा ने मुझे चुना क्या वो कुछ बताना चाहती थी, मुझे इशारा करना चाहती थी ?

जब गुडगाँव करीब आने लगा तो मैंने विक्रम को कहा क्या तुम भी मुझे छोड़ तो नहीं जाओगे हमारे रिश्ते का भी तो कोई नाम नहीं विक्रम मेरी और हैरानी से देखने लगा वो कुछ नहीं बोला जिंदगी वापिस आ कर फिर बिजी हो गई एक शाम मेरा फ़ोन बजा - हेल्लो जानेमन रेडी हो जाओ मम्मी पापा आ रहे है उलझे बालो वाली लड़की ने मेरी जिंदगी सुलझा दी थी

समाप्त!

भटकती रूह की सच्ची कहानी

भटकती रूह की सच्ची कहानी
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भूत-प्रेत के किस्से सुनने में बेहद रोमांचक और दिलचस्प लगते हैं लेकिन क्या हो जब यह किस्से सिर्फ किस्से ना रहकर एक हकीकत की तरह आपके सामने आएं?


आज की युवा पीढ़ी भूत और आत्माओं के होने पर विश्वास नहीं करती लेकिन जिस पर आप विश्वास नहीं करते वह असल में है ही नहीं यह तो संभव नहीं है ना. आज हम ऐसे ही भूतहा स्थान से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं एक आत्मा ने किया था.

जोधपुर (राजस्थान) स्थित बावड़ियों के किस्से स्थानीय लोगों में बहुत मशहूर हैं. यहां पानी की कई बावड़ियां हैं जिनमें से एक के बारे में कहा जाता है कि उसे भूत ने बनवाया था.जोधपुर से लगभग 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित ‘रठासी’ नाम का एक ऐतिहासिक गांव है.

जोधपुर (राजस्थान) स्थित बावड़ियों के किस्से स्थानीय लोगों में बहुत मशहूर हैं. यहां पानी की कई बावड़ियां हैं जिनमें से एक के बारे में कहा जाता है कि उसे भूत ने बनवाया था.जोधपुर से लगभग 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित ‘रठासी’ नाम का एक ऐतिहासिक गांव है.

मारवाड़ के इतिहास पर नजर डालें तो यह ज्ञात होता है कि जब जोधपुर में रहने वाले राजपूतों की चम्पावत शाखा का विभाजन हुआ तो उनमें से अलग हुए एक दल ने कापरडा गांव में रहना शुरू किया. लेकिन इस स्थान पर रहने वाले युवा राजपूत राजकुमारों ने गांव में साधना करने वाले साधु-महात्माओं को परेशान करना शुरू कर दिया.

उन राजकुमारों से क्रोधित होकर साधुओं ने उन्हें श्राप दे दिया कि उनके आने वाली पीढ़ी इस गांव में नहीं रह पाएगी.साधुओं के श्राप की बात जब राजकुमारों ने अपने घर में बताई तो सभी भयभीत हो गए और उस गांव को छोड़कर चले गए. इस गांव को छोड़कर वह जिस गांव में रहने के लिए गए उस गांव का का नाम है रठासी गांव. यह जोधपुर से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक ऐतिहासिक गांव है.इस गांव में एक बावड़ी है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह भूतों के सहयोग से बनी है

अर्थात उस बावड़ी को बनाने में भूत-प्रेतों ने गांव वालों की सहायता की थी. ठाकुर जयसिंह के महल में स्थित इस बावड़ी को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं. इस बावड़ी के विषय में यह कहानी प्रचलित है कि एक बार जब ठाकुर जयसिंह घोड़े पर सवार होकर जोधपुर से रठासी गांव की ओर जा रहे थे तब रास्ते में ठाकुर साहब का घोड़ा उनके साथ-साथ चलने वाले सेवकों से पीछे छूट गया और इतने में रात हो गई.

राजा का घोड़ा काफी थक चुका था और उसे बहुत प्यास लगी थी. रास्ते में एक तालाब को देखकर ठाकुर जयसिंह अपने घोड़े को पानी पिलाने के लिए ले गए.

आधी रात का समय था घोड़ा जैसे ही आगे बढ़ा राजा को एक आकृति दिखाई दी जिसने धीरे-धीरे इंसानी शरीर धारण कर लिया. राजा उसे देखकर डर गया, उस प्रेत ने राजा को कहा कि मुझे प्यास लगी है लेकिन श्राप के कारण मैं इस कुएं का पानी नहीं पी सकता.

राजा ने उस प्रेत को पानी पिलाया और राजा की दयालुता देखकर प्रेत ने उसे कहा कि वह जो भी मांगेगा वह उसे पूरी कर देगा.राजा ने प्रेत को कहा कि वह उसके महल में एक बावड़ी का निर्माण करे और उसके राज्य को सुंदर बना दे.

भूत ने राजा के आदेश को स्वीकारते हुए कहा कि वो ये कार्य प्रत्यक्ष रूप से नहीं करेगा, लेकिन दिनभर में जितना भी काम होगा वह रात के समय 100 गुना और बढ़ जाएगा. उस प्रेत ने राजा को यह राज किसी को ना बताने के लिए कहा.

इस घटना के दो दिन बाद ही महल और बावड़ी की इमारतें बनने लगीं. रात में पत्थर ठोंकने की रहस्यमय आवाजें आने लगीं, दिन-प्रतिदिन निर्माण काम तेज गति से बढ़ने लगा. लेकिन रानी के जिद करने पर राजा ने यह राज रानी को बता दिया कि आखिर निर्माण इतनी जल्दी कैसे पूरा होता जा रहा है.

राजा ने जैसे ही यह राज रानी को बताया सारा काम वहीं रुक गया. बावड़ी भी ज्यों की त्यों ही रह गई. इस घटना के बाद किसी ने भी उस बावड़ी को बनाने की कोशिश नहीं की.

समाप्त!


भुतिया घर

 एक रात, अँधेरे में छिपा एक भूतिया घर था। यहां कभी-कभी अजीब आवाजें आती थीं और साया बना रहता था। एक दिन, एक साहसी युवा ने उस घर में प्रवेश किया, ना केवल अपने घर को बल्कि भूतिया रहस्यों को भी जन्म दिया। उसके घर की घाटियों में अचानक एक पुरानी किताब खोई जो घर के पिछले मालिक की थी। किताब में लिखा था कि यह घर एक समय में सुंदर था, लेकिन एक राजगीर ने यहां एक अनोखा प्रयोग किया था, जिससे भूतिया बन गई। उन्होंने राजगीर के अजीब प्रयोग को पुनर्जीवित करने के लिए साहस रहस्य और भूतिया घर का खुलासा किया। घर से फिर अपनी पूरी शानदार वापसी की, और सभी ने उस युवा के डेवलियर ऑपरेशन को स्कोर किया।


इसके बाद उस युवक ने उस घर को अपना बना लिया और उसे "सुनहरा मकान" कहा। लोग अब उसे डर का केंद्र नहीं मानते बल्कि एक अद्भुत और प्रेरणादायक स्थान के रूप में देखते हैं। इस सफलता के बाद, उसने अपने आस-पास के लोगों को भी साहसिक रूप से जीने के लिए प्रेरित किया और उन्हें अपने सपने की दुकान के लिए प्रेरित किया। काम करने का साहस दिया। उन्होंने एक सामूहिक प्रोजेक्ट की शुरुआत की, जिसमें स्थानीय लोगों ने मिलकर अपने क्षेत्र को प्राकृतिक रूप से भरा हुआ बनाने का प्रयास किया। इसी तरह, "सुनहरा हाउस" ने एक भयानक भूतिया स्थान से निर्माण और सकारात्मक स्थान में बदलाव किया, जिसे नए लोगों ने बनाया। सपने की दिशा में बढ़ने की प्रेरणा।


इस सफल परियोजना ने उस क्षेत्र को प्रसिद्ध किया और लोगों के बीच सामूहिक सहयोग और साहस की भावना को मजबूत किया। युवाओं ने स्थानीय बच्चों के लिए शिक्षा केंद्र की स्थापना की जहां उनके लिए नए विचार और सृजनात्मकता के साथ अध्ययन किया गया था। वह नारीशक्ति को बढ़ावा देने के लिए समृद्धि कार्यक्रम चला रही थी, जिससे स्थानीय महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही थीं। उन्होंने कृषि और कर्मियों को मान्यता दी, जिससे क्षेत्र की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। इस सहयोग और समर्थन के परिणामस्वरूप, उस क्षेत्र ने एक सकारात्मक रूप में संगठित होने का संकेत दिया और यह दुनिया भर में एक प्रेरणा का उदाहरण बन गया।


इसके बाद युवाओं ने अपने क्षेत्र को पर्यावरण से लेकर सही तरीके से समाधान देने का प्रयास किया। उन्होंने पेड़-पौधे बनाने और प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र बनाने के लिए एक हरित पहल की शुरुआत की। इस क्षेत्र का मौसम और जलवायु सुधार और लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता को बढ़ावा दिया गया। उसने स्थानीय सांस्कृतिक प्रयासों को बढ़ावा दिया और आर्थिक समृद्धि के लिए स्थानीय शिल्पों का प्रचार-प्रसार किया। इस क्षेत्र की स्थानीय भूमि-समृद्धि और सांस्कृतिक विविधता का समर्थन किया गया। इस प्रकार, युवाओं ने अपने संघर्ष, साहस और दान से एक भूतिया घर को सुंदर, समृद्धि और समृद्ध विशिष्ट समाज में बदल दिया। उनके अध्यापिका सिर्फ अपनी स्थानीयता में ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र को प्रेरित किया और एक नए दृष्टिकोण में समृद्धि की राह दिखाई।


उन्होंने सिर्फ अपने क्षेत्र को ही नहीं बल्कि अपने प्रेरणादायक कार्य से पूरे देश में भी पहचान बनाई। उनकी कहानी ने लोगों को सिखाया कि छोटे क्षेत्रों में भी बड़ी स्थानीय परिवर्तन की संभावना है। युवक ने अब एक आत्मनिर्भरता और सामाजिक समर्थन संस्था बनाई है, जो लोगों को रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहायता प्रदान कर रही है। उनके संघर्ष और साहस ने साबित कर दिया कि एक व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में बदलाव और समाज ला सकता है। सकारात्मक बदलाव की सीढ़ी लगाई जा सकती है।


उन्होंने नए उदार विचार और सामाजिक समर्थन के साथ एक "सकारात्मक समृद्धि संगठन" की शुरुआत की, जो विभिन्न क्षेत्रीय लोगों को सहायता प्रदान कर रहा है। उन्होंने गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल की स्थापना की और उन्हें नई ताकत के साथ बढ़ावा दिया। इसके साथ ही, उन्होंने स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए युवा उद्यमियों को भी समर्थन दिया। उन्हें उच्च शिक्षा, प्रशिक्षण, और वित्तीय सहायता मिली ताकि वे नई और गरीबी की ओर कदम बढ़ा सकें। उस्का संघर्ष और विरासत ने न केवल अपने क्षेत्र को बल्कि पूरे देश को भी प्रेरित किया है। उनकी कहानी से पता चलता है कि किसी भी क्षेत्र से किस तरह की सही दिशा, रणनीति और संकल्प को सकारात्मक बनाया जा सकता है।


उनके संघर्ष और लक्ष्यों ने लोगों को एक सामूहिक समूह में शामिल किया है और उन्हें आश्वस्त किया है कि समृद्धि का मार्ग केवल साथियों से ही नहीं बल्कि साथ मिलकर ही बनता है। उन्होंने अपने क्षेत्र में लोगों को नए और सुधारित जीवन के लिए प्रेरित किया है। हर किसी को यह सिखाने के लिए प्रेरणा कर रही हैं कि जब हम साथ मिलकर काम करते हैं और समृद्धि की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। प्रशिक्षण से लेकर कदम-कदम पर काम कर रहे हैं, तो हम सभी मिलकर बड़ी शिफ्ट ला सकते हैं।


इसके बाद, उसने एक राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई और विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए एक समर्पित समूह बनाया। उसने लोगों को समृद्धि, सामाजिक न्याय, और पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक किया और उन्हें समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया।उसका संघर्ष और समर्पण ने एक सकारात्मक चरित्र का सृष्टि किया है, जिससे लोग उसे नहीं सिर्फ एक नेता बल्कि अपने समुदाय का सहारा और प्रेरणा भी मानते हैं। उसकी दिशा, संघर्ष, और समर्पण ने एक सशक्त और समृद्धि से भरा समाज बनाने की दिशा में एक नयी उम्मीद की रौशनी डाली है।


उसने एक विशेष अभियान चलाया, जिसमें उसने लोगों को साक्षरता, नौकरी योजनाएं, और स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए समर्थन प्रदान किया। उसने विभिन्न शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की शुरुआत की, जिससे लोगों को नौकरी मिलने का संभावना हुआ।उसका संघर्ष और समर्पण ने लोगों के बीच एक सामूहिक भावना को बढ़ावा दिया है और उन्हें सामाजिक समानता की दिशा में एक साथ बढ़ने के लिए प्रेरित किया है।उसकी इस सफलता ने न शिर्षक में ही उसे बल्कि उसके समूह को एक सशक्त और समृद्धि से भरा भविष्य दिखाने में सहायक हुआ है। उसकी आत्मकथा और संघर्ष एक प्रेरणादायक उदाहरण के रूप में बन गई है, जो लोगों को आत्मविश्वास और सकारात्मकता में बढ़ते हुए दिखाई दे रहा है।



यह एक डरावनी कहानी है:


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एक बड़े ही विचित्र और पुराने हवेली में एक अकेला लड़का नामक 'राजीव' रहता था। हवेली का माहौल डरावना था, और स्थानीय लोग इसे भूतिया मानते थे। एक दिन, जब राजीव हवेली के गहरे हिस्से में खोज रहा था, तो उसने एक छिपी हुई पुरानी किताब पाई।किताब में एक पुरानी कहानी थी जो इस हवेली के बारे में बताती थी। इसके अनुसार, हवेली के पिछले मालिक ने वहाँ प्राचीन राजा के खजाने की खोज की थी, जिसका पता डूबे हुए किसी सुनसान तहखाने में मिला था। खजाने की चोरी के बाद राजा ने एक श्राप दिया था, और हवेली के आबादी का अंत हो गया था।राजीव ने यह कहानी पढ़ी और सोचा कि यह तो सिर्फ एक किस्सा है, परंतु एक रात जब उसने वह छिपा हुआ तहखाना खोजने का निश्चय किया, तो उसका अनुभव डरावना हो गया। उसने अचानक अजीब आवाजें सुनी और आंखों के सामने एक भूत आया।भूत ने राजीव को खजाने के बारे में चेताया और उससे एक कारणदायक मिशन पर निकलने के लिए कहा। राजीव को डर के बावजूद उसने साहस जुट

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जिस भूत ने राजीव को मिशन पर भेजा, उसने कहा कि खजाना बहुत महत्वपूर्ण है और उसे पुनः पाना आवश्यक है, अन्यथा बड़ी मुसीबतें आ सकती हैं। राजीव, जो अपने जीवन के सबसे बड़े साहस का सामना कर रहा था, उसे स्वीकार कर लिया।


रात के अंधेरे में, वह अपने साथी भूत के साथ हवेली के अंधेरे हिस्से में जा पहुँचा, जहाँ खजाना छिपा था। वे खजाने की खोज में लग गए, लेकिन वहाँ कई भूतिया चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जैसे कि डरावने चिरपिंग आवाज़ें और भूतिया आक्रोश।


जब राजीव और उसका साथी भूत आखिरकार खजाने के पास पहुँचे, तो वे खुशी खुशी उसे ल

खजाने के पास पहुँचने पर, राजीव और भूत ने देखा कि यहाँ एक पुरानी खजानी थी, जिसमें मूल्यवान रत्न, सोने के सिक्के और अनमोल आभूषण रखे गए थे। इस खजाने का मूल्य अत्यधिक था और राजीव ने इसके पास जाने के लिए भरपूर संघर्ष किया था।


कुछ ही पलों में, जब राजीव और उसका साथी भूत खजाने की ओर बढ़ रहे थे, तो एक और भूत उनके आस-पास आकर उनके बीच कोफन खोलने और खजाने की रक्षा करने की कवायद में था।


राजीव ने संघर्ष में एक विचार बनाया और उसने खजाने की एक रत्न मुर्गा के साथ बदल दिया, जिसे उस भूत को काम में आया। फिर, जब वे खजाने को उठाने के लिए तैयार थे, वे खोजी ने उनकी छवि में देखा कि वे रत्न मुर्गा छुआ था और उसने उनके पास आने के लिए उनका रास्ता रोक दिया।


कहानी का नायक राजीव और उसका साथी भूत अब खजाने के साथ फंसे थे, और उन्हें उसके बाहर निकलने के लिए नए रास्ते ढूंढने में सफल होना था। क्या वे बच पाएंगे, या यह डरावना सफर उनके लिए अब और भी कठिन हो जाएगा?

राजीव और उसका साथी भूत, रत्न मुर्गा के साथ, बहुत ही चुनौतियों का सामना कर रहे थे। वे खजाने के बाहर निकलने के लिए कई आवश्यक चुनौतियों का सामना कर रहे थे, जैसे कि बड़े सांबर, डरावनी आवाजें और चूड़िल के साथ मुश्किल रास्तों में पहुँचना।


वे यह तय करने के लिए कि वे सही दिशा में जा रहे हैं, रत्न मुर्गा का सहारा ल


करके अपना मार्ग बनाते थे, और भूत की मदद से वे हर चुनौती को पार कर रहे थे। धीरे-धीरे, वे खजाने के पास पहुँच गए, जहाँ रत्न मुर्गा को सही जगह पर रखना था।


रत्न मुर्गा को सही जगह पर रखकर, राजीव और उसका साथी भूत खजाने से बाहर निकलने के लिए तैयार थे, परंतु उन्हें एक अच्छूक आवाज़ सुनाई दी: "तुम खजाने को कैसे हासिल किया?" वे पीछा करने वाले भूत के सामने आ गए, और वे खजाने की चोरी के बारे में सच्चाई बत


सच्चाई बताने पर, पीछा करने वाले भूत ने राजीव और उसके साथी भूत की महानता की प्रशंसा की। उन्होंने कहा, "तुमने अपने साहस और समर्पण के साथ खजाने की रक्षा की है, और तुम इसके ल


तुम इस खजाने के योग्य हो।" इसके बाद, वे तीनों एक साथ काम करके खजाने की रक्षा करने लगे।


खजाने की चोरी के बाद, जिसका असली मालिक राजा था, वह हवेली में वापस आया और खजाने की रक्षा की चुनौती देने के लिए तैयार था। परंतु उसने देखा कि राजीव और उसका साथी भूत अपने योग्यता और साहस के साथ खजाने की रक्षा कर रहे थे, और वह दोनों को खजाने का सही मालिक मान लिया।


इस तरह, राजीव और उसका साथी भूत ने खजाने की रक्षा करके खुद को साबित किया और उन्होंने डर का सामना करके एक महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की।


यह कहानी हमें यह सिखाती है कि असली साहस और महत्वपूर्ण लक्ष्य की दिशा में प्रयास करने से हम किसी भी चुनौती को पार कर सकते हैं, चाहे वो डरावना क्यों ना हो।


इस कहानी से हम यह सिख सकते हैं कि सफलता के लिए साहस, संघर्ष, और साथीता महत्वपूर्ण होते हैं। हमें अपने लक्ष्यों की दिशा में प्रयासशील रहना चाहिए, चाहे हमारे सामने कितनी भी मुश्किलें क्यों ना आएं।राजीव और उसका साथी भूत ने डर का सामना किया और उसे पार किया, और इससे वे खुद को साबित कर सके कि वे अपने मार्ग पर मजबूती से आगे बढ़ सकते हैं।इसके साथ ही, यह कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि डरावने माहौल में भी अक्सर महत्वपूर्ण ज्ञान और अवसर छिपे होते हैं, जिन्हें हमें धीरे-धीरे समझना चाहिए।


"आकाश की ओर की यात्रा"

 पारंपरिक गाँव में एक छोटे से लड़के का जीवन कथा जिसने सपनों की ओर अपनी यात्रा शुरू की। उसका नाम अर्जुन था, जो छोटे से ही अपने आकाशीय सपनों के पीछे भाग रहा था।अर्जुन की यात्रा उसके गाँव से लेकर ज़िन्दगी के महत्वपूर्ण संघर्षों और साफलियों की ओर बढ़ती है। उसका सपना आकाश की ऊँचाइयों को छूने का होता है, और वह उसके लिए कैसे मेहनत करता है और किसी भी मुश्किल को पार करता है, यह उपन्यास का मुख्य संदेश होता है।कहानी में वो चुनौतियों से भरपूर रास्तों पर जाता है, और आखिरकार अपने सपनों की प्राप्ति में सफल होता है। "आकाश की ओर की यात्रा" एक मोटीवेशनल और प्रेरणादायक कहानी होती है जो हमें सपनों की पुरी करने के लिए किसी भी मुश्किल का सामना करने की महत्वपूर्णता बताती है।


उपन्यास का शीर्षक: "आकाश की ओर की यात्रा।

1.भाग । गाँव के छोटे से अर्जुन के मन में एक अद्भुत सपना हमेशा से बसा था। वह रोज़ रात को आकाश की ओर देख कर सितारों को गिनता था, और विचार करता था कि वह कैसे एक दिन आकाश के ऊपर पहुँच सकेगा।उसके पिता उसके सपनों के पीछे की बड़ी मेहनत को समझते थे और उसे हमेशा उन सपनों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे।इस भाग में, हम अर्जुन के सपनों की ओर की शुरुआत को देखेंगे और उसके पास उन्हें पूरा करने के लिए कैसे कदम बढ़ाने की तैयारी हो रही है।कृपया जारी रखें, और आपको इस कहानी के अगले भागों में भी अधिक घटनाएँ मिल

भाग 2: सपनों की पहचानअर्जुन की यात्रा अब जोरों पर थी। वह अपने सपनों को पूरा करने के लिए गाँव से दूर जाता है और एक छोटे से शहर में एक काम पर नौकरी ढूंढता है।यहां, उसका सपना आकाश की ओर की यात्रा का पहला कदम ल

**भाग 3: संघर्ष और सफलता**


अर्जुन की आकाश की ओर की यात्रा अब एक नई मोड़ पर थी। उसने अपने कठिनाइयों का सामना किया और अपनी मेहनत और संघर्ष के बावजूद कभी हार नहीं मानी।


यह भाग उसके संघर्षों और सफलता की कहानी को दर्शाता है। वह कैसे अपने सपनों के पीछे लगा रहा और अपनी आवाज को आकाश की ओर बुलंद किया।


इस भाग में, हम देखेंगे कि अर्जुन कैसे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है और आकाश की ओर की यात्रा में आगे बढ़ रहा है।


कृपया जारी रखें, और आपको इस कहानी के आगामी भागों में भी अधिक घटनाएँ मिल

**भाग 4: सपनों की पूर्ति**


अर्जुन की आकाश की ओर की यात्रा का आखिरी भाग इसके हादसे और सफलता का महत्वपूर्ण संदर्भ है। वह अब अपने सपनों की पूर्ति की ओर बढ़ रहा है और आखिरकार अपनी मेहनत का फल पा रहा है।


इस भाग में, हम उसकी आखिरी कठिनाइयों और आकाश की ओर की यात्रा के सफल अंजाम को देखेंगे। यह 


**भाग 5: सपनों का साकार**


अर्जुन की आकाश की ओर की यात्रा का आखिरी भाग यहां पर है, जहां उसके सपने साकार हो रहे हैं। वह आकाश की ऊँचाइयों में पहुंच चुका है और अपने सपनों की पूर्ति के लिए अद्वितीय कठिनाइयों का सामना कर रहा है।


इस भाग में, हम देखेंगे कि अर्जुन कैसे अपने सपनों को पूरा कर रहा है, और आकाश की ओर की यात्रा में उसकी आखिरी सफलता कैसे हो रही है। उसका सफल सफर और उसकी सफलता उसके सपनों को पूर्ति देते हैं, जो इस कहानी की मुख्य संदेश है।


धन्यवाद कि आपने "आकाश की ओर की यात्रा" के इस पांचवें भाग को पढ़ा! यह कहानी अर्जुन के सपनों की पूर्ति के साथ एक प्रेरणादायक समापन 

पाएगी।


**भाग 6: सपनों की ऊँचाइयों की प्राप्ति**


आरंभिक संघर्षों और मेहनत के बाद, अर्जुन की आकाश की ओर की यात्रा अब अपने उच्चतम बिंदु पर है। उसने अपने सपनों की ऊँचाइयों को पूरा करने के लिए अनगिनत संघर्षों का सामना किया है और अब वह अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के बहकदम हो चुका है।


इस भाग में, हम देखेंगे कि अर्जुन कैसे अपनी आकाश की ओर की यात्रा को समाप्त करता है और उसके सपनों की ऊँचाइयों की प्राप्ति कैसे हो रही है। उसकी सफलता और उसकी साकार सपनों की पूर्ति कहानी के इस समापन में हो ती है।


यह कहानी आपको सपनों की महत्वपूर्णता और साकार करने के लिए मेहनत और संघर्ष की महत्वपूर्ण सीख देगी।

जल्द



डर से जीत

 जब रात का अंधकार गांव को लपेट लेता और चाँद की किरनें छूप जाती हैं, तो वहां की छोटी सी गलीयों में अद्वितीय और डरावनी घटनाएं होने लगती हैं। गांव के लोग बिना किसी आवाज के अपने घरों में बंद हो जाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि रात की इस घड़ियाल में कुछ अनजान और डरावने चीजें हो सकती हैं।


एक रात, गांव का एक युवक, अर्जुन, अपने दोस्तों के साथ अंधकार में एक अजीब दरियाई कुआँ के पास जाता है। जब वे वहां पहुँचते हैं, तो वे दरियाई कुआँ के चारों ओर एक अद्वितीय चमकती आँखों के साथ एक डरावने पुराने पेड़ की छाया में बैठे हुए एक बुढ़िया को देखते हैं। वह बुढ़िया उन्हें दरावनी कहानियों की एक किताब देती है और कहती है कि यह किताब उन्हें अपनी जिन्दगी की सबसे डरावनी कहानी से जोड़ती है।


अर्जुन और उसके दोस्त उस किताब को ल डर से जीत 

लेते हैं और वो किताब पढ़ने लगते हैं। इसके साथ ही कहानी में एक रहस्यमय स्त्री के बारे में भी बताया जाता है, जिसकी प्रतिभाग रात की घंटी के साथ गांव में सुनाई देता है, लेकिन किसी ने उसे कभी देखा नहीं।


किताब की पृष्ठों के माध्यम से, अर्जुन और उसके दोस्त गांव के असली रहस्य के पीछे जानने लगते हैं। वे दरियाई कुआँ के खूबसूरत पेड़ के नीचे दरियाई कुआँ का असली रहस्य खोजते हैं और वहां के बुढ़िया के पुराने रहस्य को भी हल करते हैं।


इस उपन्यास में डर, रहस्य, और साहस का बेहद रोचक मेल मिलता है, जो पढ़ने वालों को दुनिया के अनजानी हिस्सों के साथ सफर पर लेजाता है। यह गांव की गहराइयों में छिपे रहस्यों की पूरी कहानी है, जो पढ़ने वालों को हैरान कर देगी।


अर्जुन और उसके दोस्त कई महीनों तक वही किताब पढ़ते रहते हैं और रात के डरावने पलों के बारे में अधिक जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि गांव के लोग बिना आपसी मिलनसर में बंद हो जाते हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि वे जिन्दगी की सबसे डरावनी कहानी से रूबरू हो सकते हैं।


एक दिन, जब अर्जुन और उसके दोस्त किताब के आखिरी पन्ने तक पहुँचते हैं, तो वे एक और बड़े रहस्य के बारे में पता करते हैं, जिससे वह सारे गांव को जोड़ने के लिए काम करते हैं। इस रहस्य का समाधान


 गांव के लोग एक बड़े समूह के रूप में एकजुट होकर अपने दरों और रहस्यों का सामना करते हैं। उन्होंने यह समझा कि उनका सबसे बड़ा डर उनके अपनों के बीच एक-दूसरे से दूरी बढ़ रहा था।


इसके परिणामस्वरूप, गांव के लोग अपने रिश्तों को मजबूत करने और साथी बनने के लिए कठिनाइयों का सामना करते हैं। उन्होंने एक-दूसरे की समर्थन में खड़ा होकर अपने डरों का सामना किया और वे एक मजबूत, एकजुट समुदाय बन गए।


इस उपन्यास के माध्यम से हमें यह सिखने को मिलता है कि डर और रहस्यों से सामना करने के लिए सजग और एकजुट होने की महत्वपूर्णता है, और जब समूह मिलकर काम करता है, तो वो हर मुश्किल को पार कर सकता है।

कल्पेश्वर वन कि कहानी

 



कल्पेश्वर वन भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित है और इसकी कहानी एक धार्मिक और प्राकृतिक महत्व की ओर इशारा करती है।


कल्पेश्वर वन का नाम उसके प्रमुख मंदिर, "कल्पेश्वर महादेव मंदिर," से जुड़ा है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसका महत्व हिन्दू धर्म में बहुत ऊँचा माना जाता है।


कहानी के अनुसार, कल्पेश्वर मंदिर का स्थापना काल्पेश्वर वन क्षेत्र में हुआ था। लोग मानते हैं कि यहां के वन्यजीवों के साथ धार्मिक सम्बन्ध बहुत प्राचीन समय से हैं।


इस जंगल का मनोहारी प्राकृतिक सौंदर्य और शांति के लिए प्रसिद्ध है। कल्पेश्वर वन में घने वनस्पति, प्राकृतिक झीलें, और वन्यजीवों का आवास होता है। यहां के आदिवासी जनजातियां इस वन के साथ जड़े हुए हैं और उनका जीवन इस वन के साथ अटूट रिश्ते की ओर इशारा करता है।


कल्पेश्वर वन विशेष रूप से धार्मिक और प्राकृतिक पर्यटन के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल है, जो लोगों को शांति, स्थिरता, और आध्यात्मिकता का अनुभव करने का मौका देता है।

चुड़ैल का बदला: रात की रानी की कहानी

**चुड़ैल का बदला: रात की रानी की कहानी**

**प्रस्तावना:**
यह कहानी एक प्राचीन गाँव "चंदनपुर" की है, जो एक प्यारी लड़की, रात की रानी, के लिए जानी जाती है, जिसे चुड़ैलों के साथ सम्बंध थे। एक नया नोवेल, "चुड़ैल का बदला," इस कहानी को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत करता है:

**कहानी:**
**भूमिका:** चंदनपुर गाँव में एक सुंदर लड़की नामक "रात की रानी" बचपन से ही अद्वितीय थी। उसकी आँखों में वो खास ब्लू रंग की चमक थी जो उसे अद्वितीय बनाती थी।

**संकेत:** एक दिन, चंदनपुर में एक संकेत मिलता है कि एक बड़ी चुड़ैल शक्ति प्राप्त करने के लिए वापस आ गई है और उसका निशाना रात की रानी पर है।

**यात्रा और साजिश:** रात की रानी, अपने प्यारे गाँव की सुरक्षा के लिए, एक आद्यत्मिक यात्रा पर निकलती है। वह चुड़ैल के सामने अपने अद्वितीय गुणों का प्रयोग करती है और एक बड़ा राज खोलती है, जिसका सम्बंध चुड़ैल के पिछले जन्म से है।

**संघर्ष और समाधान:** रात की रानी और चुड़ैल के बीच महायुद्ध होता है, जिसमें प्यार और शक्ति के बीच की टक्कर का बदला लिया जाता है।

**निष्कर्ष:** क्या रात की रानी चुड़ैल से बदला लेती है और अपने गाँव को बचा पाती है? या क्या उसका प्यार और साहस उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं? "चुड़ैल का बदला" एक रोमांटिक और आद्यत्मिक यात्रा की कहानी है, जिसमें दिल की बातें और साहस का मेल होता है।

फूल

फूल रात के आंधेरे में एक पुराने और डरावने हवेली के सामने खिल रहा था। हवेली का नाम "भूतिया महल" था, और यह आस-पास के गाँववालों के लिए एक खौफ का साया बन गया था। लोग कहते थे कि वहाँ रात के समय अजीब-अजीब आवाजें आती थीं और अजनबी आत्माओं की छायाएँ घूमती रहती थीं।

इस भूतिया महल की दिलचस्प कहानी है, जिसमें एक युवक नामक "रवि" का सामर्थ्य था कि वह अपने दोस्तों के साथ इसे एक रात जाएंगे और इसके रहस्य को सुलझाएंगे।

रवि और उसके दोस्तों ने अपना सामग्री साथ लिया और भूतिया महल की ओर बढ़ते हुए एक अजीब और बेहद डरावने माहौल में पहुंचे। वे हवेली के द्वार पर खड़े हो गए और वहाँ एक पुराना और अरबों साल पुराना कुंड है जिसमें एक सदी पहले हुई एक रहस्यमय हत्या की घटना की गई थी।

रवि और उसके दोस्त उस कुंड के पास पहुंचे और वहाँ अपनी फ्लैशलाइट्स की मदद से नीचे झाँकने लगे। वे देखते हैं कि कुंड के अंदर कुछ तरह की अजीब चीज छिपी है। रवि ने धीरे से उस चीज को उठाया और देखा कि वह एक पुराना किताब है।

किताब के पन्नों पर अजीब-अजीब मंत्र और चित्र थे, जो कुछ अजनबी जगह की प्रतिमाओं के साथ थे। जैसे ही रवि ने किताब को खोला, वह खुद को एक अजीब समय की भास्कर पाया, जब वही कुंड उसी दशा में हुआ था जब हत्या हुई थी। रवि ने देखा कि वही अरबों साल पुरानी हत्या के दृश्य हो रहे थे।

धीरे-धीरे, वह देखते हैं कि हत्या का आरोपी वो खुद है, लेकिन उसका चेहरा पुराने समय की वजह से मिट चुका है। उसने अपने दोस्तों के साथ हत्या की वजह और सच्चाई का पता लगाने का फैसला किया।

वे धीरे-धीरे हत्या के पीछे के रहस्य को सुलझते हैं, और उन्होंने वह दुखद और भयंकर सच्चाई खोल दी कि वो बिना जाने ही भूतिया महल में फंस गए थे, और उन्होंने खुद को एक आत्मा के रूप में बाँध लिया था।

यह उपन्यास फूल के फूल के भयानक और रहस्यमय दुनिया को छूने का प्रयास करता है, जब आत्मा और अजीब घटनाएँ अचानक आपके आस-पास हो जाती हैं। क्या रवि और उसके दोस्त इस भूतिया महल से बाहर निकल पाएंगे, या वह वहीं फंस जाएंगे और भूतिया महल की आत्मा के साथ एक अजीब खेल में शामिल हो जाएंगे?


फूल का भूत

प्रमोद, शीतलागढ़ के एक छोटे से गाँव का लड़का, बगीचे में काम करने के लिए रोज़ बुलाया जाता था। उसे अजीब चीजें महसूस होतीं, खासकर रात के समय। उसने सुना था कि वहाँ रात को कुछ आवाजें और चीखें आतीं हैं, लेकिन कोई नहीं देखता।एक रात, प्रमोद बगीचे में रात बिताने का निर्णय लेता है। जब वह अकेला होता है, तो वह अजीब दिशाओं से आवाज़ें सुनता है और एक पुराने पीपल के पेड़ के पास जाता है। वहाँ वह एक अत्यंत डरावनी छाया के साथ एक अदृश्य शव का पता लगाता है।इसके बाद, प्रमोद की जीवन में घटनाएँ और संघटनाएँ बदल जाती हैं, और वह बगीचे के रहस्य को सुलझाने का प्रयास करता है। क्या प्रमोद शीतलागढ़ के इस हॉरर से भरपूर रहस्य को हल कर पाएंगे? यह उपन्यास उसकी कहानी को बताता है, जो हॉरर और सस्पेंस से भरा हुआ है।



शीतलागढ़ की रातें

प्रमोद, शीतलागढ़ के एक छोटे से गाँव का लड़का, बगीचे में काम करने के लिए रोज़ बुलाया जाता था। उसे अजीब चीजें महसूस होतीं, खासकर रात के समय। उसने सुना था कि वहाँ रात को कुछ आवाजें और चीखें आतीं हैं, लेकिन कोई नहीं देखता।एक रात, प्रमोद बगीचे में रात बिताने का निर्णय लेता है। जब वह अकेला होता है, तो वह अजीब दिशाओं से आवाज़ें सुनता है और एक पुराने पीपल के पेड़ के पास जाता है। वहाँ वह एक अत्यंत डरावनी छाया के साथ एक अदृश्य शव का पता लगाता है।इसके बाद, प्रमोद की जीवन में घटनाएँ और संघटनाएँ बदल जाती हैं, और वह बगीचे के रहस्य को सुलझाने का प्रयास करता है। क्या प्रमोद शीतलागढ़ के इस हॉरर से भरपूर रहस्य को हल कर पाएंगे? यह उपन्यास उसकी कहानी को बताता है, जो हॉरर और सस्पेंस से भरा हुआ है।

एक थी डायन कहानी

एक बार की बात है, एक छोटे से गांव में एक महिला रहती थी, जिसे लोग "डायन" कहकर डराते थे। वह सचमुच में किसी डायन जैसी नहीं थी, लेकिन लोगों की भ्रमित धारणाओं के कारण वह अकेली रहती थी और उसे समाज से बाहर कर दिया था।

एक दिन, एक युवक गांव में आया और उसने डायन के बारे में सबकुछ सुना। वह निर्धारित किया कि वह सच्चाई को जानें बिना किसी कड़वी धारणा के उस महिला से मिलेगा।

जब वह उस महिला से मिला, तो उसने देखा कि वह बहुत ही सामान्य और सधारण महिला है, जो आवाजाहीन थी और विचलित दिखती थी। वह उसके साथ बात करने लगा और जाना कि वह कैसे इस दुर्भाग्य से गुज़र रही थी।

युवक ने गांववालों को वास्तविकता बताई और उन्हें यह समझाया कि डायन केवल एक मिथक है। उसने समुदाय को एक साथ आने के लिए प्रोत्साहित किया और उन्हें उस महिला के साथ मिलकर एक सशक्त गांव बनाने में मदद करने के लिए प्रोत्साहित किया।

इसके परिणामस्वरूप, गांववालों ने अपने धारणाओं को बदल दिया और समृद्धि और विकास की ओर बढ़ने के लिए मिलकर काम किया। डायन के खिलाफ जो डर था, वह दूर हो गया और एक नया आदर्श समाज बना।

कर्ण पिसाजनी भविष्य नहीं देख सकतीं

आज के वैज्ञानिक युग में भूत-प्रेत और पारलौकिक शक्तियों से जुड़ी घटनाओं पर कोई विश्वास नहीं करता. ऐसी घटनाओं के पीछे विज्ञान और तर्क ज्ञान को आधार बताकर भले ही ऊपरी तौर पर इनके पीछे छिपी काली सच्चाई से पल्ला झाड़ लिया जाता हो लेकिन हकीकत टालना या उसे नजरअंदाज करना उतना ही फिजूल है, जितना देखी हुई को अनदेखा कर देना.क्या आपका सामना किसी ऐसे इंसान से हुआ है जिसने पहली ही मुलाकात में आपको वो सब बता दिया हो जिसे आप या आपके करीबी लोग जानते हैं? आपके घर में कितने लोग हैं, कौन क्या-क्या करता है, आपकी किससे बनती है और कौन आपका दुश्मन है, यह सब आपको उस व्यक्ति ने सिर्फ आपका चेहरा देखकर ही बता दिया हो?अगर वास्तव में आपका ऐसे किसी भी व्यक्ति से सामना हुआ है तो उसकी इस जानकारी के चलते आपको लगा होगा या तो वो कोई धोखेबाज है या फिर वह कोई महान सिद्ध पुरुष है. अगर उस व्यक्ति के लिए आपके भीतर ऐसी धारणा आई है तो हम आपको बता दें कि उस व्यक्ति के पास वो शक्ति है जो उसे दुनिया की कोई भी जानकारी एक क्षण में प्रदान कर सकती है. यह तंत्र साधना का वो कमाल है जिसे कड़ी सिद्धि द्वारा प्राप्त किया जा सकता है.

कर्ण पिशाचिनी सिद्धि, यह वो तंत्र विद्या है जिसमें आपके हर सवाल का जवाब एक अलौकिक ताकत आपके कान में आकर दे जाती है, वह जवाब सिर्फ आपको ही सुनाई देता है. इस विद्या को कर्ण पिशाचिनी विद्या के अलावा पिशाच विद्या या नेक्रेमेंसी भी कहा जाता है. इस सिद्धि को प्राप्त करने के बाद आप अलौकिक ताकतों से जब चाहे संपर्क साध सकते हैं.

यह साधना बेहद कठिन है लेकिन अगर एक बार इस सिद्धि को प्राप्त कर लिया जाए तो आप अपने मरे हुए परिजनों, जिनकी आत्माएं भटक रही हैं, से जब चाहे बात कर सकते


इस सिद्धि को प्राप्त करने के बाद साधक वशीकरण एवं पाश मंत्र के जरिए एक प्रेतनी का स्वामी बन जाता है और वह प्रेतनी से हर जानकारी पल भर में उगलवा सकता है. वह प्रेतनी उस साधक के कान में ही वास करती है इसीलिए उसे कर्ण पिशाचिनी कहा जाता है.


यह प्रेतनी उस साधक को आपके बारे में हर उस घटना से रूबरू करवा सकती है, जो या तो आपके साथ हो चुकी है या तो वर्तमान में हो रही है क्योंकि कर्ण पिशाचिनी भविष्य नहीं बता सकती. उसकी पहुंच सिर्फ अतीत और वर्तमान तक ही होती है.

आवाजों का रहस्य

वैसे मै भूत प्रेतों में विश्वास नहीं करता हु लेकिन उस दिन जो मेरे साथ हुआ उसको देखकर मुझे इस किस्से को आपके समक्ष रखना चाहता हु | एक रात वहा पर हम परिवार के पांच सदस्य मै , मेरी दादी , चाचा ,चाची और मेरा चचेरा भाई थे और मै सोफे पे सो रहा था और दादी से बाते कर रहा था और चाचा ,चाची और मेरा चचेरा भाई उपरी माले पर बने रूम में सो रहे थे |  
मैंने फिर से तेज आवाज में उसका नाम पुकारा और इस बार भी वोही आवाज़ दुगुनी तेज सुनाई दे रही थी | जब मैंने इसे बार बार सूना तो मेने बिना डरे उस अंधेरी गैलरी में जाने की सोची और यह देखकर हक्का बक्का रह गया कि वहा कोई भी मौजूद नहीं था | अब मुझे थोडा डर लगने लगा | मै जल्दी से वहा से भागा और मेरे कमरे से होते हुए आकाश के कमरे में गया और देखा कि वो तो सो रहा था |  


रात के 10:30 बजे थे तभी मैंने अचानक देखा कि किसी ने गैलरी की बिजली बंद कर दी | जिस रूम में हम बैठे थे वो गैलरी से थोडा दूर था और मुझे वहा से गैलरी में कुछ नहीं दिख रहा था | यह पक्का करने के लिए मैंने अपने चचेरे भाई आकाशको आवाज़ दी और दुसरी तरफ मुझे हां की आवाज़ सुनाई दी | मै चौंक गया कि वो वहा कैसे पहुच गया क्यूंकि उस गैलरी तक सिर्फ हमारे रूम से ही जाने का रास्ता है |  

मैंने उसी समय उसे जगाया और गैलरी वाली घटना बताई | आकाश ने कहा कि मै तो सो रहा था और मै नीचे तो आया ही नहीं मै यह सब सुनकर डर गया कि यह सब कैसे हो गया ?? क्यूंकि कोई चोर भी हमारे कमरे में घुसे बिना उस गैलरी तक नहीं पहुच सकता | मैंने सोचा ये सब मेरे साथ ही हुआ लेकिन अगले दिन चाचा ने बताया कि उन्हें भी कभी आवाज़े सुनाई देती है लेकिन वो ध्यान नहीं देते है | कुछ महीनो बाद उन्होंने भी वो घर बेचकर दूसरा नया घर ले लिया |

भारत में कितने प्रकार के भुत मिलते हैं

भारतीय लोककथाओं और परंपराओं में विभिन्न प्रकार के भूत-प्रेत, असरी, और आत्मा से जुड़े कई प्रकार के भूत होते हैं। यह कुछ प्रमुख प्रकार के भूत हैं:

1. **चुड़ैल**: चुड़ैल एक प्रकार की भूतिया औरत होती है जो रात के समय लोगों के पास आती है और उन्हें भ्रमित करती है।

2. **डाकिनी**: डाकिनी भी एक प्रकार की भूतिया स्त्री होती है, जो बच्चों को बहलाने का काम करती है और फिर उन्हें अपने बलम से खा जाती है।

3. **चुड़ाईल**: चुड़ाईल एक प्रकार की प्श्यकाशी भूत होती है, जो अपनी भूतिया साथियों के साथ लोगों को बेहलती है।

4. **पिशाच**: पिशाच भूत पुराने संस्कृति में मिलते हैं, और ये अधिकतर नकरात्मक प्रवृत्ति के होते हैं।

5. **आत्मा**: आत्मा अमर और अदृश्य होती है, और यह लोगों की जानकारी के बिना उनके पास आ सकती है।

6. **प्रेत**: प्रेत भूत अवश्यम्बिक रूप से दुखी होते हैं और वे अपनी दुख भरी कहानियों में लोगों को बताते हैं।

ये केवल कुछ प्रकार के भूत हैं, और भारत के विभिन्न क्षेत्रों में और भी अनगिनत भूत-प्रेत कथाएँ और परंपराएँ हैं। ये कथाएँ अक्सर स्थानीय संस्कृति और लोककथाओं से जुड़ी होती हैं और भारतीय जीवन में गहरा सांस्कृतिक महत्व रखती हैं।

रास्ते का भयंकर साया

एक बार की बात है, एक गाँव के पास एक लांबा और अंधेरा जंगल था। यह जंगल गाँव को शहर से जोड़ने वाले एक सुनसान सड़क के किनारे था, जिसका नाम "रास्ता भूत" था।

गाँववाले रात के समय उस सड़क पर नहीं जाते थे, क्योंकि कहानियों में कहा जाता था कि रात को रास्ते पर एक भयंकर साया घूमता रहता है। लोग कहते थे कि वह साया किसी को अपने जाल में फंसा देता है और फिर उसके साथ कुछ अनजाने और भयंकर चीखते-पुकारते साबित होते हैं।

एक दिन, गाँव के एक बहादुर लड़के नामक अर्जुन ने निश्चय किया कि वह इस रास्ते पर जाकर देखेगा कि यह साया सचमुच में मौजूद है या नहीं।

रात के समय, अर्जुन ने एक बड़ा बतखाना टॉर्च लिया और सड़क पर बढ़ा। सड़क पर पहुंचने पर उसने कुछ दिव्य चिन्हों को देखा और एक विशाल बर्फी साया के रूप में दिखाई दिया।

अर्जुन डरने का नाम नहीं लेता और धीरे-धीरे साया की ओर बढ़ता है। जब वह साया के पास पहुँचता है, तो वह देखता है कि वह साया एक वृक्ष की छाया में है और वह वृक्ष की छाया से आराम से सो रहा था।

इसके बाद, गाँव में फैले डर के बारे में एक सच्चाई का पता चलता है कि यह साया सचमुच में डरावना नहीं था, और गाँववाले अब रात को भी उस सड़क पर जा सकते हैं बिना किसी चिंता के।

इस कहानी से हमें यह सिखने को मिलता है कि हमें अकेले दरावनी कहानियों और अफवाहों पर विश्वास नहीं करना चाहिए, और हमें खुद जाकर सच्चाई की जाँच करनी चाहिए।

एक चुड़ैल डाकिन

एक जंगल में एक बड़ी ही भयंकर चुड़ैल रहती थी, जिसका नाम डाकिना था। डाकिना विलापुनी और अहंकारी थी, और वह अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करके लोगों को डराने का आनंद लेती थी।

एक दिन, डाकिना ने जंगल में एक साधू को देखा, जो अपनी तपस्या कर रहा था। डाकिना को विचार आया कि वह साधू उसकी शक्तियों को भंग कर सकता है, और उसने साधू के पास जाकर उसके सामने आवाज किया।

साधू ने डाकिना की बातों को ध्यान से सुना और फिर उसे एक उपदेश दिया, "डाकिना, तुम्हें अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने की आवश्यकता नहीं है। इन्हें सच्चे कार्यों में लगाओ और लोगों की मदद करो।"

डाकिना ने साधू के उपदेश का पालन किया और अपनी भयंकर शक्तियों का उपयोग सही मार्ग पर करने लगी। वह अब जंगल के लोगों की समस्याओं का समाधान करने में मदद करती और उनका दुख हरती।

डाकिना के सहयोग से, जंगल का माहौल बदल गया और वह अब लोगों की सच्ची रक्षिका बन गई। उसका नाम अब भी चुड़ैल था, लेकिन अब वह लोगों के दिलों में डर की बजाय आशीर्वाद और सहानुभूति की प्रतीति होती थी।

इस कहानी से हमें यह सिखने को मिलता है कि शक्ति का सच्चा मतलब दूसरों की मदद करने में है, और हमें उसे सही तरीके से उपयोग करना चाहिए।

डर से जीत

एक समय की बात है, एक छोटे से गांव में जो कि एक जंगल के किनारे था, एक डरपोक लड़का नामक राजू रहता था। राजू का दिन अपने डर से गुजरता था। उसके साथी गांववाले हमेशा मजाक उड़ाते और उसे 'भूतिया राजू' कहकर हंसते रहते थे।

एक दिन, राजू ने गांव के पुराने पुस्तकालय के बारे में सुना। वहां पर एक पुस्तक होती थी, जिसमें जंगल की पुरानी कहानियाँ लिखी होती थीं। राजू की रुचि पुस्तकों में थी, लेकिन उसका डर उसे उस पुस्तकालय में जाने से रोक रहा था।

एक दिन, राजू ने अपने दोस्तों से सहायता मांगी, और उन्होंने उसे पुस्तकालय ले जाने में मदद की। वहां पर वे एक पुरानी किताब ढूंढने में लग गए, और वो किताब उन्होंने खोज ली। जब वे किताब खोलकर पढ़ने लगे, तो वह कहानी थी जो गांववालों के बीच में बड़े ही प्रसिद्ध थी।

कहानी के अनुसार, जंगल में एक पुराना और भूतिया हवेली था, जिसमें चमकदार जेवरात छिपे थे। इसे ढूंढ़ने का ख्वाब सभी गांववालों का था, लेकिन कोई भी वहां जाने का डरता था।

राजू और उसके दोस्त ने उस हवेली की खोज करने का निश्चय किया। वे रात के समय हवेली की ओर बढ़े और वहां पहुंचकर देखा कि हवेली में कुछ अद्वितीय चीजें हैं, जिन्होंने उन्हें हैरान कर दिया।

वे जेवरातों की खोज में अपने डर को पार करके अगले सुबह गांव लौटे और उन्होंने अपनी कहानी साझा की। गांववालों ने उनके साहस की सराहना की और साथ में हवेली की खोज में निकले। वे जेवरातों को पाकर गर्वित हुए और गांव को धन से भर दिया।

इस कहानी से राजू ने सिखा कि डर को पार करने से ही सफलता मिलती है और आगे बढ़ने का सही मौका मिलता है। वह अब डर के बजाय उसे मुकाबला करने का साहस रखता था, और गांव के लिए वह एक अद्भुत गतिमान बन गया।

भुत कि दोस्ती

एक बार की बात है, एक गाँव में जहाँ पुरानी गलियों और कुँवारी हवेलियों के बीच में एक पुराना हवेला खड़ा था, वहाँ पर एक भूत रहता था। गाँव के लोग कहते थे कि वो हवेला रात के समय अद्भुत आवाज़ें बजाता और डरावनी दिखाई देता था। 

एक दिन, एक साहसी युवक नामक रवि गाँव में आया और वो भूत के बारे में सुनकर खुद को प्रतिस्थापित करने का निश्चय किया। रवि रात के समय हवेले में पहुंचा और वहाँ अपनी टॉर्च जलाई। तभी वह देखा कि एक पुराना आदमी एक किताब पढ़ रहा था। 

रवि ने देखा कि भूत केवल एक आत्मा था, जो अपनी पुरानी पसंदीदा किताब को पढ़ रहा था। वह भूत था क्योंकि वह अदृश्य था, लेकिन वह किसी को कोई चोट नहीं पहुंचा रहा था।

रवि ने भूत से बात की और उसकी दर की कहानी सुनी। भूत ने कहा कि वह अकेला है और सोच रहा है कि वह अपनी पसंदीदा किताब के साथ अमनपसंद रूप से रह सकता है।

रवि ने भूत के साथ मिलकर गाँव के लोगों को इस बारे में बताया और उन्होंने भूत को स्वागत किया। अब वह भूत और गाँव के लोग साथ में रहते हैं, और उनके बीच में एक अच्छी दोस्ती है।

इस कहानी से हमें यह सिखने को मिलता है कि किसी की दिशा-निर्देशन और समय के साथ लोगों की सोच और दृष्टिकोण बदल सकते हैं, और दर की जगह दोस्ती और सहयोग का महत्व हो सकता है।

भुतहा अस्पताल के खौफनाक रासते से गुजरना पड़ा भारी

आज जो मै आपको किस्सा बताने जा रहा हु वो हमारे कस्बे के भूतहा अस्पताल का है | सारे कस्बे के लोग इस अस्पताल को भूतहा अस्पताल कहते है | इस अस्पताल का असली नाम विक्टोरिया अस्पताल है | इस अस्पताल को आज से करीबन 100 साल पहले अंग्रेजो ने बनवाया था | उस अस्पताल के सामने एक कब्रिस्तान है |


मेरे दादाजी ने मुझे बताया था कि आज से 60 साल पहले इस अस्पताल में ऑपरेशन के दौरान एक लडकी की मौत हो गयी थी | तब से उस लडकी की आत्मा उस अस्पताल में भटकती है | रात ढलते ही कोई भी इन्सान उस रास्ते से नहीं गुजरता है क्यूंकि उस लडकी की आत्मा राहगीरों को परेशान करती है | हालंकि मै दादाजी की बताई पुरानी भूतहा कहानियों में ज्यादा विश्वास नहीं करता था |

एक रात मै अपने दो दोस्तों अंकित और राजू के साथ रात को बाइक पर घूम रहा था तभी मेरे एक दोस्त ने मुझसे विक्टोरिया अस्पताल वाले रास्ते से चलने को कहा | हम में से कोई भी ज्यादा भूत प्रेतों पर विश्वास नहीं करते थे और हमने उस रास्ते से जाने का पक्का किया | उस समय रात के 10 बज चुके थे | हम तीनो ने ये बात अपने परिवार वालो को नहीं बताने का वादा किया और उस रास्ते पर निकल पड़े | जैसे ही हम उस रास्ते से निकले रास्ते पर रेत होने की वजह से हमारी बाइक फिसल गयी और हम तीनो धडाम से बाइक से दूर गिर गए | गनीमत थी कि हम लोगो को कोई चोट नहीं आयी थी |बाइक चला रहे मेरे दोस्त अंकित ने बोला कि उसका बैलेंस तो बराबर था फिर ये बाइक कैसे फिसल गयी | हालंकि वो थोडा डर गया था तो मेरे दुसरे मित्र राजू ने बाइक चलाने को कहा |


अब राजू बाइक चला रहा था | हम 1 किमी ही चले थे कि अचानक हमारी गाडी का टायर पंचर हो गया और गाडी की स्पीड तेज़ होने से गाडी इस बार फिर पिछली बार से भी दूर तक फिसलती गयी | इस बार हमे कोहनियों और घुटनों पर थोड़ी चोट आयी थी | अंकित फिर से बोला कि इस जगह में जरुर कोई गडबड है हम लोग वापस उल्टे चलते है | लेकिन मैंने और राजू ने उसकी बात नहीं मानी और बाइक उठाकर पैदल चलना शुरू कर दिया|


हम थोड़ी दूर ही चले थे कि अचानक किसी लडकी के चीखने की आवाज़े सुनाई दी | ये सुनकर हम रुक गए और अंकित बोला “यार तुम लोगो को चीखने की आवाज़ सुनाई दी क्या ??” हमने उसकी बातो को अनसुना कर कहा कि कोई जानवर की आवाज़ होगी | पांच मिनट चलने के बाद फिर वोही चीख फिर से सुनाई दी | इस बार तो हम दोनों को भी थोडा डर लगने लगा | हम तीनो ने वापस चलने के बारे में सोचा लेकिन हम रास्ते के बीच में आ गये थे | पीछे चलने में 3 किमी और आगे चलने में 2 किमि ओर बाकी थे | हम लोगो ने आगे जाने का सोचा |

थोडा आगे चलने पर हमे बरगद के पेड़ के नीचे एक औरत दिखाई दी | इतनी रात को अकेली औरत को देखकर हमारे तो रौंगटे खड़े हो गये थे | हम लोगो ने पीछे मुड़ने का सोचा | तभी वो बुढी औरत चिल्लाई “बेटा रुको मुझे हाईवे तक का रास्ता बता दो ” | हमने पूछा कि “इतनी रात को आप इस रास्ते से कैसे निकल रही हो “| तो उस बुढिया ने कहा कि “मै पड़ोस के गाँव की रहने वाली और मेरे पास पैसे नहीं है इसलिए मै पैदल ही निकल पडी , हाईवे के उस पार मेरा गाँव है ” | हमने उस बुढिया की बात का विश्वास कर लिया और आगे निकल पड़े | रास्ते में वो बुढिया हमसे सारी बाते पूछने लगी | बुढिया हम तीनो के पीछे चल रही थी हम तीनो दोस्त अब अपनी बात कर रहे थे | तभी राजू बोला कि ” लो मांजी आपका रास्ता आ गया ” और वो जैसे ही पीछे मुड़ा तो वहा कोई नहीं था | हम तीनो की तो सिट्टी पिट्टी गुल हो गयी | हम बाइक को धक्का मारते हुए जोर से भागने लगे | भागते भागते अंकित ठोकर खाकर गिर गया और हमे जोर से चीखे सुनाई दी |हमने भी बाइक को वही पटककर अंकित को साथ लेकर दौड़ने लगे और अस्पताल के पास कब्रिस्तान तक पहुच गए |

ये सब घटित होते 12 बज चुकी थी | हम पसीने से तर बतर हो गए थे और कब्रिस्तान पार कर एक मंदिर में रुक गए क्यूंकि अगर बिना बाइक के घर जाते तो जूते पड़ते | इसलिए उस रात मंदिर में ही रुक गए और सुबह होते ही बाइक लेकर अपने अपने घर आ गये और घर वालो दोस्त के यहा रुकने का बहाना बना दिया | उस रात के बाद से हम उस रास्ते से कभी नहीं गए | मुझे आज भी सपनों में वो भूतिया बुढिया और चीखने की आवाज़े आती है |

आत्मा से प्यार – एक छोटी सी लव स्टोरी

आत्मा से प्यार – एक छोटी सी लव स्टोरी मित्रो मेरा नाम राजेन्द्र यादव है और मै उत्तर प्रदेश का रहने वाला हु | मै आज आपको अपनी आप बीती सुनाना चाहता हु | मै हिंदुस्तान यूनिलीवर कंपनी में ऑपरेटर का काम करता हु | मेरा घर कंपनी से 10 किमी दूर है | मेरे पास एक बाइक जिससे मै अपना घर से कम्पनी और कम्पनी से घर का सफर पूरा करता हु |

एक दिन ऑफिस से घर जा रहा था तो रास्ते में मुझे मेरे कॉलेज [जिसमें मैंने अपनी ग्रेजुएशन पुरी की थी ] के बाहर एक लडकी दिखाई दी, जो मुझे देखकर मुस्करा रही थी | मैंने उसे टालते हुए मै घर की ओर निकल पड़ा | दुसरे दिन फिर वोही लडकी मुझे उसी जगह पर दिखाई दी | वो भी मुस्करा रही थी और मै भी मुस्कुराता हुआ निकल पड़ा | मूझे उसकी प्यारी से मुस्कान से प्यार हो गया था लेकिन कभी रुकने की कोशिश नहीं की | वो लडकी कई दिनों तक मुझे दिखी और एक दिन वो मुझे वहा नहीं दिखाई दी | मै बैचैन हो गया लेकिन मै उसके बारे में कुछ नहीं जानता था उअर ना कभी बात की थी इसलिए उसका पता भी नहीं लगा सकता था | मई कई दिनों तक उस लडकी के नहीं दिखने से बैचेन रहा | कई बार तो मै कम्पनी से जल्दी निकलकर उसका इन्तेजार भी करता पर वो मुझे नहीं दिखी |
एक दिन मेरे मोबाइल पर किसी अनजाने नंबर से फ़ोन आया | मैंने फ़ोन उठाया तो एक लडकी बोली | उसने मेरा नाम पूछा और वो मुझसे बात करने लगी और बताया कि मै वही लडकी हु जिसे तुम रोज़ बाइक से गुजरते हुए देखा करते थे | मै अचम्भित रह गया कि इसके पास मेरा नंबर कैसे आया और ये मेरसे क्यों बात कर रही है | लेकिन उसकी मीठी बातो में इतना खो गया कि ये सब बाते भूल गया |
एक दिन उसने मुझे कॉलेज के बाहर मिलने के लिए बुलाया | मै और मेरा दोस्त हम दोनों बाइक पर उससे मिलने को गये क्यूंकि कभी मै लडकी से अकेले नहीं मिला था तो घबरा रहा था | मै और मेरा दोस्त जैसे ही कॉलेज के बाहर पहुचे तो वहा वो लडकी कही पर भी दिखाई नहीं दी | मैंने काफी फ़ोन लगाया लेकिन फ़ोन स्विच ऑफ था |मै घर लौट गया उर घर में घुसते ही उसका फोन आया तो मैंने गुस्से से कहा कि हम वहा पर आपका इंतजार कर रहे थे आप क्यों नहीं आयी | तो उसने कहा कि “तुम अपने दोस्त को क्यों साथ लेकर आये थे मुझसे अकेले मिलने आना “| मैंने कहा ठीक है |

अगले दिन सुबह सुबह मैंने उसके फ़ोन लगाया लेकिन उसकी मम्मी ने फ़ोन उठा लिया | मै एक बार तो डर गया लेकिन कॉलेज के प्रोजेक्ट का बहाना कर उससे बात करने को उसकी मम्मी से कहा | उसकी मम्मी ने कहा “पागल हो गये हो क्या प्रिया को मरे तो तीन महीने हो चुके है “| मै हक्का बक्का रह गया और मेरे हाथ से मोबाइल छुट गया और मै बुरी तरह कांपने लगा | मैने सोचा कि जिस लडकी को देख रहा था और जिससे मै बात कर रहा था वो एक आत्मा थी | मुझे फिर भी विश्वास नहीं आया|
मैंने अगले दिन फिर प्रिया की मम्मी के फ़ोन लगाकर सारी घटना सुनाई तो उन्होंने कहा “मेरी बात पर यकीन ना हो तो मेरे घर आकर देख लो “| मैं प्रिया के घर गया तो प्रिया के फोटो पर माला लगी थी | उसकी माँ ये घटना सुनकर भावुक गो गयी लेकिन उस दिन से मैंने अपनी वो सिम निकालकर फेंक दी और नए नंबर ले लिए और फिर कभी फोन नहीं आया | लेकिन आज भी मै अनजान नंबर से अक्सर सहम जाता हु | मित्रो अगर आपको मेरी आप बीती पसंद आये तो शेयर जरुर करे | ये कहानी मै प्रिया को समर्पित करता हु और IGS को धन्यवाद देता हु कि उन्होंने मेरी आप बीती को आप लोगो तक पहुचाया |

एक ऐसी रहस्यमय झिल,जो पानी से। नहीं नरकंकाल से है भरी

 मित्रो भारत के रहस्यमय सफर की इस कड़ी में हम आपको आज ऐसी जगह से रूबरू करवाएंगे जिसके रहस्य को दुनिया भर के वैज्ञानिक नहीं समझ पाए | आज हम आपको हिमालय की सुदूर घाटियों के स्थित रूपकुंड झील के अनसुलझे रहस्य के बारे में आपको बतायेंगे | रूपकुंड झील , उत्तराखंड की हिमालय पहाडियों के बीच स्थित 5000 मीटर गहरी बर्फीली झील है जो कि सर्दियों में जम जाती है और गर्मियों में पिघल जाती है | इस झील तक केवल पर्वतारोही ही आते है | 1942 में यहा पर आये पर्वतारोहियों को 100 से भी ज्यादा नरकंकाल मिले तभी से ये जगह वैज्ञानिको के लिए रहस्य का सबब बना हुआ है | कैसे यहा आये नरकंकाल और किसके है ये नरकंकाल , इस रहस्य को सुलझाते वक्त यहा तीन अलग अलग तथ्य मिले है | पहले तथ्य के अनुसार द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सैनिक जब इस रास्ते से गुजर रहे थे तो घनी बर्फ होने की वजह से उन्हें रास्ता पता करने में बड़ी परेशानी हुई | कई दिनों तक घूमते घूमते हाय्पोथेर्मिया की वजह से इस झील वाली जगह इनकी मौत हो गयी | दूसरा तथ्य ये कहता है कि प्राचीन समय में जसधावल नामक राजा संतान प्राप्ति की खुशी में नंदा देवी दर्शन करने जा रहा था और रास्ते में अचानक ओलावृष्टी के कारण पूरा जत्था उस बर्फ की झील में दफन हो गया |तीसरा तथ्य ये कहता है कि 12 वी शताब्दी में यहा मुहम्मद तुगलक का आक्रमण हुआ था तो कुछ कहानिया जोरावर सिंह और उसके सैनिको पर आधारित है जो इस झील में तिब्बत के युद्ध के दौरान शहीद हो गए थे किस तथ्य में कितनी सच्चाई है कोई नहीं जानता लेकिन आज भी उस झील में इन नरकंकालो को देखा जा सकता है | इतनी अधिक मात्रा में एक वीरान जगह पर नरकंकालो के मिलने से नेशनल जोग्राफिक की टीम भी यहा पर खोज करने आयी थी | आज भी इस जगह पर कई पर्वतारोही इस रहस्य को देखने आते है | 2013 में इंडिया टुडे अखबार में इस झील के रहस्य पर से पर्दाफाश किया और बताया कि वैज्ञानिको की खोज में 9वी शताब्दी में हुई भयंकर ओलावृष्टी में 200 से अधिक इन्सान यहा इस झील में दब गए | अगर आप भी इस झील को देखना चाहते है तो अपने आप को मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार कर लिजिये |

रात होते ही जाग जाते हैं डैथ वैली के पत्थर

डेथ वैली के नाम से बहुत कम लोग परिचित होंगे क्योंकि अभी इसके बारे में सिर्फ दबी जुबान से ही चर्चाएं होती रहीं लेकिन अब इस वैली का सच शायद बाहर आ रहा है क्योंकि अभी तक ‘नासा’ जो इस वैली और यहां मौजूद पत्थरों की पहेली को सुलझाने की बात कर रहा था वह भी अब अपने हाथ खड़े कर चुका है क्योंकि उसे भी यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर 700 पाउंड का पत्थर एक स्थान से दूसरे स्थान तक कैसे जा सकता है जबकि वहां किसी और के होने का कोई सबूत नहीं है और ना ही वहां कुछ ऐसा है जो इतने भारी पत्थर को हिला पाने तक में सक्षम हो.


कैलिफोर्निया (अमेरिका) स्थित डेथ वैली के तैरते पत्थरों की कहानी लोग सदियों से कहते-सुनते आ रहे हैं लेकिन इन कहानियों पर किसी ने कभी यकीन नहीं किया. लोगों का कहना है कि इस वैली में स्थित पत्थर यहां तैरते हैं, वह अपने आप एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचते हैं क्योंकि इस वैली के भीतर कोई जादुई शक्ति है.

लेकिन चमत्कार की अवधारणा को सिरे से नकारने वाला विज्ञान एक बार फिर इस जगह के चमत्कारी होने जैसी बातों को मनगढंत मान रहा है. एक थ्योरी के तहत प्लेनेटरी साइंटिस्ट प्रोफेसर रॉल्फ लॉरेंज ने यह समझाने का प्रयास किया है कि किस तरह यह पत्थर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचते हैं. प्रोफेसर रॉल्फ का कहना है कि सर्दियों के मौसम में इस वैली के पत्थरों पर बर्फ जम जाती है और जब सर्दियों का मौसम जाते ही इन पत्थरों के ऊपर कीचड़ जम जाता है तो बर्फ छिप जाती है और बर्फ के आवरण से जमी चट्टानों को इस स्थान पर बहने वाली तेज हवा आगे की ओर धकेल देती है और देखने वाले को यह लगता है कि रेत में यह भारी भरकम पत्थर खुद तैरते हुए आगे बढ़ गए हैं, जबकि सच कुछ और ही है. प्रोफेसर रॉल्फ का कहना है कि जब किसी चट्टान के ऊपर बर्फ की चादर चढ़ जाती है तो उस चट्टान में मौजूद तरल पदार्थों का स्तर बदलते तापमान के साथ-साथ बदलता रहता है और चट्टान आगे पीछे होने लगती है जिससे यह अभास होता है कि यह चट्टान रेत में तैर रही है.

आपको यकीन नहीं होगा कि इस थ्योरी से पहले लोग इस चट्टान के बारे में बहुत कुछ बोलते थे. कोई कहता था कि इन चट्टानों में जादुई शक्तियां हैं तो कोई इस स्थान को एलियन या तंत्र-मंत्र से श्रापित मानता था. अब आपको हो सकता है इस बात पर हंसी आए लेकिन लोग इस स्थान पर मौजूद पत्थरों को अपने घर भी ले गए थे क्योंकि वह इन्हें चमत्कारी मानते थे. प्रोफेसर रॉल्फ के इस स्थान के रहस्य को साफ कर देने के बाद भी लोग इस स्थान पर एलियन और तंत्र विद्या की मौजूदगी को सही मानते हैं.

भटकती रूह की सच्ची कहानी

 




भूत-प्रेत के किस्से सुनने में बेहद रोमांचक और दिलचस्प लगते हैं लेकिन क्या हो जब यह किस्से सिर्फ किस्से ना रहकर एक हकीकत की तरह आपके सामने आएं? आज की युवा पीढ़ी भूत और आत्माओं के होने पर विश्वास नहीं करती लेकिन जिस पर आप विश्वास नहीं करते वह असल में है ही नहीं यह तो संभव नहीं है ना. आज हम ऐसे ही भूतहा स्थान से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं एक आत्मा ने किया था.


जोधपुर (राजस्थान) स्थित बावड़ियों के किस्से स्थानीय लोगों में बहुत मशहूर हैं. यहां पानी की कई बावड़ियां हैं जिनमें से एक के बारे में कहा जाता है कि उसे भूत ने बनवाया था.
जोधपुर से लगभग 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित ‘रठासी’ नाम का एक ऐतिहासिक गांव है. मारवाड़ के इतिहास पर नजर डालें तो यह ज्ञात होता है कि जब जोधपुर में रहने वाले राजपूतों की चम्पावत शाखा का विभाजन हुआ तो उनमें से अलग हुए एक दल ने कापरडा गांव में रहना शुरू किया. लेकिन इस स्थान पर रहने वाले युवा राजपूत राजकुमारों ने गांव में साधना करने वाले साधु-महात्माओं को परेशान करना शुरू कर दिया. उन राजकुमारों से क्रोधित होकर साधुओं ने उन्हें श्राप दे दिया कि उनके आने वाली पीढ़ी इस गांव में नहीं रह पाएगी.

साधुओं के श्राप की बात जब राजकुमारों ने अपने घर में बताई तो सभी भयभीत हो गए और उस गांव को छोड़कर चले गए. इस गांव को छोड़कर वह जिस गांव में रहने के लिए गए उस गांव का का नाम है रठासी गांव. यह जोधपुर से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक ऐतिहासिक गांव है.

इस गांव में एक बावड़ी है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह भूतों के सहयोग से बनी है अर्थात उस बावड़ी को बनाने में भूत-प्रेतों ने गांव वालों की सहायता की थी. ठाकुर जयसिंह के महल में स्थित इस बावड़ी को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं. इस बावड़ी के विषय में यह कहानी प्रचलित है कि एक बार जब ठाकुर जयसिंह घोड़े पर सवार होकर जोधपुर से रठासी गांव की ओर जा रहे थे तब रास्ते में ठाकुर साहब का घोड़ा उनके साथ-साथ चलने वाले सेवकों से पीछे छूट गया और इतने में रात हो गई.


राजा का घोड़ा काफी थक चुका था और उसे बहुत प्यास लगी थी. रास्ते में एक तालाब को देखकर ठाकुर जयसिंह अपने घोड़े को पानी पिलाने के लिए ले गए. आधी रात का समय था घोड़ा जैसे ही आगे बढ़ा राजा को एक आकृति दिखाई दी जिसने धीरे-धीरे इंसानी शरीर धारण कर लिया. राजा उसे देखकर डर गया, उस प्रेत ने राजा को कहा कि मुझे प्यास लगी है लेकिन श्राप के कारण मैं इस कुएं का पानी नहीं पी सकता. राजा ने उस प्रेत को पानी पिलाया और राजा की दयालुता देखकर प्रेत ने उसे कहा कि वह जो भी मांगेगा वह उसे पूरी कर देगा.

राजा ने प्रेत को कहा कि वह उसके महल में एक बावड़ी का निर्माण करे और उसके राज्य को सुंदर बना दे. भूत ने राजा के आदेश को स्वीकारते हुए कहा कि वो ये कार्य प्रत्यक्ष रूप से नहीं करेगा, लेकिन दिनभर में जितना भी काम होगा वह रात के समय 100 गुना और बढ़ जाएगा. उस प्रेत ने राजा को यह राज किसी को ना बताने के लिए कहा. इस घटना के दो दिन बाद ही महल और बावड़ी की इमारतें बनने लगीं. रात में पत्थर ठोंकने की रहस्यमय आवाजें आने लगीं, दिन-प्रतिदिन निर्माण काम तेज गति से बढ़ने लगा. लेकिन रानी के जिद करने पर राजा ने यह राज रानी को बता दिया कि आखिर निर्माण इतनी जल्दी कैसे पूरा होता जा रहा है. राजा ने जैसे ही यह राज रानी को बताया सारा काम वहीं रुक गया. बावड़ी भी ज्यों की त्यों ही रह गई. इस घटना के बाद किसी ने भी उस बावड़ी को बनाने की कोशिश नहीं की.

छत पर रेंगती प्रेतनी

 





कनाडा के ओनटेरियो के नियाग्रा फॉल्स के पास स्थित इस टनल का नाम सुनते ही लोग कांपने लग जाते हैं. इस टनल का निर्माण सन 1900 में ग्रांड रेलवे लाइंस के ठीक नीचे किया गया था और इस टनल को बनाने का उद्देश्य उस इलाके के पानी के बहाव को पास ही स्थित खेतों की सिंचाई के लिए प्रयोग किया जाना था.


16  भी हि ला कर रख सकती है. टनल का निर्माण हुए काफी वक्त बीत गया था और सब कुछ बहुत आराम से और ठीकठाक चल रहा था.  


लेकिन अचानक एक दिन यहां एक दर्दनाक हादसा हुआ जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया. इस टनल के आसपास आबादी बहुत कम थी इसीलिए हर समय यहां पानी भी नहीं बहा करता था. जब पानी बहुत भर जाता था तो उस समय इस टनल का प्रयोग किया जाता था.  इस टनल में यूं तो कई हादसे हुए लेकिन एक हादसा ऐसा था जिससे ओनटेरियो शहर आज तक उबर नहीं पाया है. एक बार की बात है जब इस टनल में पानी का बहाव नहीं था, इस टनल के पास एक घर में बाप और बेटी रहा करते थे. हवा का रुख बहुत तेज था और चारों ओर सिर्फ और सिर्फ अंधेरा था.  

लड़की घर में अकेली थी और पीछे वाले कमरे में सो रही थी कि अचानक उस घर में आग लग गई और देखते ही देखते आग ने पूरे घर को अपनी चपेट में ले लिया. लड़की ने घर से बाहर निकलने की कोशिश की लेकिन तब तक उसके कपड़ों को आग ने पकड़ लिया.  

खुद को बचाने के लिए वह टनल की तरफ भागी लेकिन टनल में भी उस समय पानी नहीं था. आग की जलन की वजह से वह चीखती चिलाती रही, उसकी चीख बहुत भयानक और दर्दनाक थी जिसे सुनकर कई लोग वहां इकट्ठा हो गए लेकिन किसी ने उस लड़की को नहीं बचाया और आखिरकार उस लड़की ने यहां दम तोड़ दिया.  


इसके अलावा यहां एक और लड़की की ऐसे ही जलने के कारण मौत हुई थी. लोगों का कहना है कि इस टनल में कुछ दरिंदों ने एक लड़की का सामूहिक बलात्कार किया और अपने जुर्म को छिपाने के लिए उस लड़की को जिन्दा जला दिया. उसकी चीखें आसपास के इलाकों तक सुनाई दीं.  

सुबह जब लोग उस टनल में पहुंचे तो लड़की का अधजला हुआ शरीर वहां पड़ा था और तब से लेकर आज तक वहां शरीर के जलने की वैसी ही बदबू आती है जैसी पहले आती थी. रोशनी को देखकर परेशान करती हैं रूहें स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर कोई उस स्थान पर रोशनी करता है तो उन लड़कियों की रूहें उसे परेशान करती हैं.  

कहते हैं एक सफाई कर्मचारी जब टनल की सफाई के लिए अंदर गया तो जैसे ही उसने माचिस जलाई तभी एक भयानक चीख उस टनल में गूंजने लगी और उस कर्मचारी ने अपने सिर के ठीक ऊपर दीवार पर एक छिपकली की तरह कुछ रेंगते देखा. उसका चेहरा जला हुआ था. इस घटना के बाद वह आदमी तो बच गया लेकिन उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया.


इंसानों का खून पीकर प्यास बुझाने वाली एक डायन की कहानी -

 छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर ग्राम के निकट जांजगीर इलाके में आज भी खून की प्यासी डायनों का बसेरा है। स्थानीय लोगो का मानना है कि यहां रात में गुजरने वाले राहगीरों को डायन पहले तो अपने वश में करती है और बाद में उस इंसान का खून पीकर स्वय को अमर रखने का प्रयास करती हैं।



कहा जाता है कि यह इलाका डायन का है। यहां इंसान का कदम रखना खतरे से खाली नहीं है। और अगर आप कैसे भी गए तो किसी तरह की चूक आपके लिए काफी नुकसानदेह साबित हो सकती है। अगर आपको यकीन न हो तो यहां पर अभिशप्त पेड़ों में कील गाड़ कर खुद देख लीजिए, यकीनन आप लोगो का मौत से सामना हो जाएगा। आप लोगो को भले ही यह अंधविश्वास लगे, मगर इस भूतिया गांव का तो यही दस्तूर है। इस भूतिया गांव को पूरे सूबे में अभिशप्त माना जाता है। यहां एक-दो नहीं, बल्कि सारे इलाके में डायनों का बसेरा जमा है।

बिलासपुर के निकट इस छोटे से इलाके जांजगीर में डायनों की अब पूरी टोली विधमान है। ऐसा माना जाता है कि पहले यहां एक डायन रहती थी, लेकिन डायन ने गांव की ही कुछ लड़कियों की आत्मा को वश में करके उनको अपने साथ मिला लिया। आज वही लड़कियां इन डायनों के साथ मिलकर खुद को अमर रखने की कोशिश करती है।ये गांव वही है वो जगह जहां वास्तविकता में यहा पुरुषों के रात को निकलने पर प्रतिबंध है। कब किस जगह पर डायन उन्हें अपने वश में कर लेगी कोई नहीं जानता। अभी तक यहा पर कुल 38 ऐसे मामले हैं जिनमें पुरुष लापता हो गए , लेकिन उनका अभी तक कोई पता नहीं लगा। यही माना जाता है कि डायन उन पुरुषो को निगल गई।जांजगीर में पेड़ों को काटने पर भी प्रतिबंध है। यहां पेड़ों के उपर डायनों के रहने की बात बताई जाती है। एक बार एक पेड़ काटने पर गांव के एक इन्सान की मौत हो गई थी। तब से ही माना जाता है कि डायन का पेड़ काटने पर ही उसकी मौत हुई।

यहां पर एक टूटी हवेली नूमा छोटी सी कोटरी है। जिसमें कोई भी नहीं आता जाता। माना जाता है कि इस अंधेरी कोठरी में जो भी गया वो वापस नहीं लौटा। 7 लोगों की मौत की गवाह इस भूतिया कोठरी को यहां के प्रशासन ने भी सील किया हुआ है।डायनों को अपने वश में करने के लिए यहा कई तांत्रिकों ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। लेकिन इस बीच एक दो तांत्रिकों को भी मौत का सामना करना पड़ा। जिसके बाद तांत्रिक भी यहां की डायनों को अपने वश में करने से घबराने लगे।

कहा जाता है कि गांव में हर अमवस्या और पूर्णिमा की रात को कोई नहीं रहता। हालांकि यह काफी पुरानी बात है। अब लोग अपने घरों को अच्छे से बंद कर वहीं रहते हैं।गांव के कुछ लोगों ने यह अनुभव किया है कि अक्सर रास्ते में चलते वक्त उन्हें अजीबोगरीब आवाजें सुनाई देती है, लेकिन पीछे मुड़ने पर कोई नहीं होता। गांव के सुधाकर नाम के व्यक्ति ने तो अपनी बाइक पर एक डायन को लिफ्ट तक दी थी। काफी लंबा रास्ता तय करने के बाद उसे अहसास हुआ कि पीछे कोई बैठा ही नहीं था

जांजगीर के लोगो का मानना है कि यहां कई साल पहले एक खूबसूरत महिला के साथ गांव के कुछ शराबी लोगों ने बलात्कार किया उसे बंदी बनाकर रख दिया और बाद में उसकी उस महिला की बेरहमी से हत्या कर दी। इसके बाद वही डायन बनकर यहाँ अपना बदला पूरा करती है।


सावधानी

 नदी, पूल या सड़क पार करते समय भगवान का स्मरण जरूर करें। एकांत में शयन या यात्रा करते समय पवित्रता का ध्यान रखें। पेशाब करने के बाद धेला अवश्य लें और जगह देखकर ही पेशाब करें। रात्रि में सोने से पूर्व भूत-प्रेत पर चर्चा न करें। किसी भी प्राकार के टोने-टोटकों से बच कर रहें।







ऐसे स्थान पर न जाएं जहां पर तांत्रिक अनुष्ठान होता हो, जहां पर किसी पशु की बलि दी जाती हो या जहां भी लोबान आदि धुंवे से भूत भगाने का दावा किया जाता हो। भूत भागाने वाले सभी स्थानों से बच कर रहें, क्योंकि यह धर्म और पवित्रता के विरुद्ध है। 


जो लोग भूत, प्रेत या पितरों की उपासना करते हैं वह राक्षसी कर्म के होते हैं ऐसे लोगों का संपूर्ण जीवन ही भूतों के अधिन रहता है। भूत-प्रेत से बचने के लिए ऐसे कोई से भी टोने-टोटके न करें जो धर्म विरुद्ध हो। हो सकता है आपको इससे तात्कालिक लाभ मिल जाए, लेकिन अंतत: जीवन भर आपको परेशान ही रहना पड़ेगा।

शरीर की तलाश

 





हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां हर मोड़ पर इंसानों के भीतर डर और सिहरन पैदा करने के लिए आत्माएं और अन्य शैतानी ताकतें अपना रौब दिखाती रहती हैं. अब आप भले ही इस तथ्य पर यकीन ना करें लेकिन आपकी हर हरकत, हर कदम पर बुरी व अच्छी आत्माओं की नजर रहती है.  


यह आत्माएं आपको एक पल के लिए भी तन्हा नहीं छोड़तीं, हां कई बार भीड़भाड़ से बचते हुए वह आपको अकेलेपन में ही अपने होने का एहसास करवाती हैं. ऐसी ही एक घटना से हम आज आपको रुबरू करवाने जा रहे हैं जो कोई कहानी नहीं बल्कि एक आम इंसान के साथ घटित एक खौफनाक घटना है. आज से कुछ 5-10 साल पुरानी है. अशोक नाम का एक व्यक्ति जिसका गांव पूर्वी उत्तर-प्रदेश के एक कस्बाई इलाके में था.  


वैसे तो वो दिल्ली में नौकरी करता था लेकिन घर आए हुए काफी समय बीत चुका था इसीलिए छुट्टी लेकर वह घर आया हुआ था. यह इलाका बेहद सुनसान और घनी झाड़ियों के बीच बसा हुआ था और इन घनी झाड़ियों की बीच शाम के समय अकसर सन्नाटा ही पसरा रहता था. अशोक को बचपन से ही छत पर सोने की आदत थी और बड़े होने के बाद जब भी वह गांव जाता तो अपने घर की खुली छत पर ही सोता था.  


लेकिन एक रात छत पर सोना ही उसके लिए महंगा साबित हुआ क्योंकि यह वो रात थी जब उसका सामना एक ऐसे साये से हुआ जो नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से उसके पास तो आया लेकिन अशोक की सूझबूझ की वजह से वह उसका बाल भी बांका नहीं कर सका. रात का करीब एक बजा था कि अचानक किसी आवाज ने अशोक की नींद खोल दी. वह अपनी चारपाई से उठ कर छत की रेलिंग के पास जाकर आसपास देखने लगा.  


उसे अपने घर से थोड़ी ही दूर पर किसी साये को इधर-उधर घूमते हुए देखा, छोटा सा कस्बाई इलाका था उसे लगा शायद कोई अपने घर से बाहर आया होगा. वह वापिस जाकर चारपाई पर लेट गया. उसे फिर कुछ आवाज सुनाई दी लेकिन इस बार आवाज थोड़ी ज्यादा पास से आ रही थी. वह फिर उठा और छत से नीचे देखने लगा. उसे अपने घर के पास ही एक साया दिखाई दिया लेकिन खौफनाक बात यह थी कि वह सिर्फ साया था उसका शरीर नहीं था.  


इतने में उसे सीढ़ियों पर किसी के बहुत ही तेजी के साथ चढ़ने की आवाज सुनाई दी. 1 मिनट से भी कम समय में वह साया उसकी नजरों के सामने खड़ा था. उसकी शक्ल, हाथ-पैर कुछ भी नहीं था, अगर कुछ था तो वह सिर्फ एक सफेद साया जो धीरे-धीरे अशोक की तरफ बढ़ता जा रहा था. कहते हैं बुराई को काटने के लिए अच्छाई का ही सहारा लिया जाता है इसीलिए उस साये से खुद को बचाने के लिए उस समय अशोक ने कवच कीलक अर्गला मंत्र का जाप करना शुरू कर दिया.  


वह लगातार 5 मिनट तक यह जाप करता रहा और वह साया उनके पास आता रहा. अचानक ही वह साया अंतरध्यान हो गया. वह हवा था और एक दम से हवा में बहकर गायब हो गया. वह कहां गया, कहां से आया था कुछ पता नहीं चला लेकिन कुछ समय जब तक वह साया अशोक के सामने रहा उन चंद लम्हों ने अशोक के हाथ-पांव फुला दिए थे.

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