शरीर की तलाश

 





हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां हर मोड़ पर इंसानों के भीतर डर और सिहरन पैदा करने के लिए आत्माएं और अन्य शैतानी ताकतें अपना रौब दिखाती रहती हैं. अब आप भले ही इस तथ्य पर यकीन ना करें लेकिन आपकी हर हरकत, हर कदम पर बुरी व अच्छी आत्माओं की नजर रहती है.  


यह आत्माएं आपको एक पल के लिए भी तन्हा नहीं छोड़तीं, हां कई बार भीड़भाड़ से बचते हुए वह आपको अकेलेपन में ही अपने होने का एहसास करवाती हैं. ऐसी ही एक घटना से हम आज आपको रुबरू करवाने जा रहे हैं जो कोई कहानी नहीं बल्कि एक आम इंसान के साथ घटित एक खौफनाक घटना है. आज से कुछ 5-10 साल पुरानी है. अशोक नाम का एक व्यक्ति जिसका गांव पूर्वी उत्तर-प्रदेश के एक कस्बाई इलाके में था.  


वैसे तो वो दिल्ली में नौकरी करता था लेकिन घर आए हुए काफी समय बीत चुका था इसीलिए छुट्टी लेकर वह घर आया हुआ था. यह इलाका बेहद सुनसान और घनी झाड़ियों के बीच बसा हुआ था और इन घनी झाड़ियों की बीच शाम के समय अकसर सन्नाटा ही पसरा रहता था. अशोक को बचपन से ही छत पर सोने की आदत थी और बड़े होने के बाद जब भी वह गांव जाता तो अपने घर की खुली छत पर ही सोता था.  


लेकिन एक रात छत पर सोना ही उसके लिए महंगा साबित हुआ क्योंकि यह वो रात थी जब उसका सामना एक ऐसे साये से हुआ जो नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से उसके पास तो आया लेकिन अशोक की सूझबूझ की वजह से वह उसका बाल भी बांका नहीं कर सका. रात का करीब एक बजा था कि अचानक किसी आवाज ने अशोक की नींद खोल दी. वह अपनी चारपाई से उठ कर छत की रेलिंग के पास जाकर आसपास देखने लगा.  


उसे अपने घर से थोड़ी ही दूर पर किसी साये को इधर-उधर घूमते हुए देखा, छोटा सा कस्बाई इलाका था उसे लगा शायद कोई अपने घर से बाहर आया होगा. वह वापिस जाकर चारपाई पर लेट गया. उसे फिर कुछ आवाज सुनाई दी लेकिन इस बार आवाज थोड़ी ज्यादा पास से आ रही थी. वह फिर उठा और छत से नीचे देखने लगा. उसे अपने घर के पास ही एक साया दिखाई दिया लेकिन खौफनाक बात यह थी कि वह सिर्फ साया था उसका शरीर नहीं था.  


इतने में उसे सीढ़ियों पर किसी के बहुत ही तेजी के साथ चढ़ने की आवाज सुनाई दी. 1 मिनट से भी कम समय में वह साया उसकी नजरों के सामने खड़ा था. उसकी शक्ल, हाथ-पैर कुछ भी नहीं था, अगर कुछ था तो वह सिर्फ एक सफेद साया जो धीरे-धीरे अशोक की तरफ बढ़ता जा रहा था. कहते हैं बुराई को काटने के लिए अच्छाई का ही सहारा लिया जाता है इसीलिए उस साये से खुद को बचाने के लिए उस समय अशोक ने कवच कीलक अर्गला मंत्र का जाप करना शुरू कर दिया.  


वह लगातार 5 मिनट तक यह जाप करता रहा और वह साया उनके पास आता रहा. अचानक ही वह साया अंतरध्यान हो गया. वह हवा था और एक दम से हवा में बहकर गायब हो गया. वह कहां गया, कहां से आया था कुछ पता नहीं चला लेकिन कुछ समय जब तक वह साया अशोक के सामने रहा उन चंद लम्हों ने अशोक के हाथ-पांव फुला दिए थे.

ऐसे स्थान जहां खतरनाक और दुष्ट आत्माएं केद हैं

 भूत-प्रेत से जुड़ा कोई भी लेख, कहानी या फिर फिल्म इंसानी मस्तिष्क को सबसे पहले और सबसे ज्यादा आकर्षित करते हैं लेकिन सच यही है कि इस पर तब तक विश्वास नहीं किया जा सकता जब तक कि कोई इन्हें अपनी आंखों से ना देख ले या फिर कोई इन्हें महसूस ना कर ले. ऐसा ही कुछ तथ्य भूत बंगलों से जुड़ा हुआ है जिस पर वो व्यक्ति कभी विश्वास नहीं करता जिसने वहां मौजूद पारलौकिक शक्तियों का अनुभव ना किया हो. आज हम आपको ऐसे ही कुछ विश्व प्रसिद्ध हॉंटेड हाउस के बारे में बताएंगे जिनके भीतर बुरी आत्माओं का वास तो है लेकिन जहां कुछ लोग इसे सिर्फ मनगढ़ंत कहानी मानते हैं तो कुछ इन जगहों का नाम सुनकर भी कांप जाते हैं


1.व्हाइट हाइस: जी हां, विश्व के सबसे ताकतवर आदमी का निवास स्थान व्हाइट हाउस सिर्फ इसलिए नहीं जाना जाता क्योंकि वहां अमेरिका के राष्ट्रपति रहते हैं बल्कि इससे भी ज्यादा खास बात यह है कि यहां अमेरिका के दूसरे राष्ट्रपति जॉन एडम्स, जिन्होंने अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, की आत्मा आज भी इस स्थान को छोड़कर नहीं गई है. बहुत से लोगों ने यहां किसे बूढ़े व्यक्ति को घूमते देखा है, जो एक ही नजर में आंखों से ओझल हो जाता है. कुछ लोग इस बूढ़ी परछाई को लिंकन की आत्मा कहते हैं लेकिन इस परछाई के पहनावे और व्यवहार से इसे जॉन एडम्स का ही प्रेत कहा जाता है

2.द शूनर होटल (इंगलैंड): विश्व का सबसे पुराना और सबसे भूतहा स्थान है यह होटल. इतिहास के महान चरित्र किंग जॉर्ज तृतीय और चार्ल्स डिकन इस होटल में बहुत समय तक रुके थे. उन्हें यहां ठहरना पसंद था. वैसे तो यह होटल आज भी आमजन के पूरी रात खुला रहता है लेकिन फिर भी आप यहां ठहरने का रिस्क नहीं ले सकते क्योंकि ब्रिटेन की एक पैरानॉर्मल सोसायटी ने यह पाया है कि यहां प्रेत आत्माएं अपनी मौजूदगी दर्ज करवा चुकी हैं और उनके साथ समीपता रखना इंसानों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. इस होटल के कमरे 17 और 28 बेहद खौफनाक हैं, यहां ठहरने वाला कोई भी व्यक्ति अपनी जान नहीं बचा पाया है

3.ला लौरी हाउस (अमेरिका): सन 1800 के शुरुआती दौर में इस होटल में मैडम ला लौरी रहा करती थी. दुनिया के सामने वह एक बहुत अच्छी महिला के तौर पर रहती थी लेकिन पीठ पीछे वह अपने गुलामों और नौकरों के साथ बहुत बुरा और अमानवीय सलूक करती थी. एक रात उनके एक गुलाम ने उस घर में आग लगा दी जिसमें जलकर ला लौरी की मौत हो गई. लेकिन उस आग में सिर्फ उनका शरीर जला था क्योंकि उसकी आत्मा आज भी वही भटक रही है और वहां आने वाले लोगों को यातनाएं देती है. लोगों ने कई बार वहां अजीब सी आवाजें सुनी हैं, जो सुनने में बेहद डरावनी होती हैं

4. द टॉवर ऑफ लंदन (इंग्लैंड): एक समय था जब इस जगह इंग्लैंड की खतरनाक कुख्यात हस्तियों को बंदी बनाकर रखा जाता था, जिनमें से कई बंधकों के सिर काट दिए गए या उन्हें फांसी पर लटका दिया गया. उन्हीं मृत बंधकों की खतरनाक आत्माएं आज यहां भटकती हैं और आने-जाने वाले हर व्यक्ति को परेशान करती हैं. लोगों ने कई बार यहां दर्द से चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुनी हैं और कटे सिर वाले शरीर को घूमते हुए देखा है.


बहामपीसाज व हिमालय संत

 रमेसर बाबू अपने कार्यालय में अपनी सीट पर बैठकर फाइलों को उलट-पलट रहे थे। उनका कार्यालय ग्रामीण क्षेत्र में था जहाँ जाने के लिए कच्ची सड़कों से होकर जाना पड़ता था। अरे इतना ही नहीं, कार्यालय के आस-पास में जंगली पौधों की अधिकता थी, कहीं कहीं तो ये जंगली पौधे इतने सघन थे कि एक घने जंगल के रूप में दिखते थे। कार्यालय के मुख्य दरवाजे को छोड़ दें तो बाकी हिस्से पूरी तरह से घाँस-फूँस आदि से ढंके लगते थे। कार्यालय के कमरों की खिड़कियों आदि पर लंबे-लंबे घास-फूँसों का साम्राज्य था। दिन में भी कार्यालय में एक हल्का अंधकार पसरा रहता था, जिससे ऐसा लगता था कि यह कार्यालय हरी-भरी वादियों में शांत मन से बैठा हुआ किसी गहरे चिंतन में डूबा हुआ हो। क्योंकि इस कार्यालय में कुल कर्मचारियों की संख्या मात्र 5 ही थी जिसमें से एक रामखेलावन थे, जो चपरासी के रूप में यहाँ अपनी सेवा दे रहे थे। रामखेलावन ही वह व्यक्ति थे जिनके कार्य-व्यवहार से यह शांत कार्यालय कभी-कभी मुखर हो उठता था और कर्मचारियों की हँसी-ठिठोली से जाग उठता था।  

रामखेलावन जी, पास के ही एक गाँव के रहने वाले थे और प्रतिदिन कोई न कोई असहज घटना कार्यालय के बाकी 4 कर्मचारियों को सुनाया करते थे। वे विशेषकर जब भी कार्यालय में प्रवेश करते तो सबसे पहले रमेसर बाबू के कमरे में जाते और राम-राम कहने के साथ ही शुरू हो जाते कि बाबू कल तो गाँव में गजब हो गया था। रमदेइया को जंगल में चुडैल ने पकड़ लिया था तो मनोहर का सामना एक भयानक भूत से हो गया था। जबतक रामखेलावन जी सभी कर्मचारियों से मिलकर कुछ भूत-प्रेत, गाँव-गड़ा की बातें नहीं बता लेते, उन्हें कल (चैन) नहीं पड़ता था। कोई कर्मचारी रामखेलावन की बातों को सहजता से सुनता तो कोई केवल हाँ-हूँ करके उस ओर कान नहीं देता और उन्हें स्टोप जला कर चाय बनाने के लिए कह देता या पानी की ही माँग करके उनसे बचने की कोशिश करता। पर रामखेलावन की बातों को रमेसर बाबू बहुत ही सजगता से सुनते और पूरा ध्यान देते हुए बीच-बीच में हाँ-हूँ करने के साथ कुछ सवाल भी पूछते। एक दिन की बात है, रामखेलावन जी कार्यालय थोड़ा जल्दी ही पहुँच गए और सीधे रमेसर बाबू के कमरे में घुस गए। पर उस समय रमेसर बाबू अपनी कुर्सी पर नहीं थे, शायद वे अभी कार्यालय पहुँचे ही नहीं थे।  

रामखेलावन थोड़ा डरे-सहमे लग रहे थे और बार-बार अपने माथे पर आ रहे पसीने को गमछे से पोछ रहे थे। वे ज्यों ही कमरे से बाहर निकले त्यों ही कार्यालय के प्रांगण में उन्होंने रमेसर बाबू को अपनी साइकिल को खड़े करते हुए देखा। वे दौड़कर रमेसर बाबू के पास पहुँच गए और बिना जयरम्मी किए ही हकलाकर, घबराकर बोले, - बाबू, बाबू! कल रात को तो गजब हो गया। मेरा पूरा परिवार आफत में आ गया है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूँ? - रमेसर बाबू ने उन्हें अपने कमरे की ओर चलने का इशारा करते हुए आगे-आगे तेज कदमों से अपने कार्यालय-कक्ष में प्रवेश किए। फिर एक कुर्सी पर रामखेलावन जी को बैठने का इशारा करते हुए अपने झोले को वहीं मेज पर रखकर एक गिलास में पानी लेकर कक्ष के बाहर आकर हाथ-ओथ धोए। उसके बाद कमरे में लगे हनुमानजी की फोटो को अगरबत्ती दिखाने के बाद अपनी कुर्सी पर बैठते हुए रामखेलावनजी से बोले, - रामखेलावनजी, अब अपनी बात पूरी विस्तार से बताइए। - उनकी अनुमति मिलते ही रामखेलावनजी कहना शुरू किए, - बाबू, कल मैं जब शाम को घर पर पहुँचा तो पता चला की मेरी बहू कुछ लकड़ी आदि की व्यवस्था करने जंगल की ओर गई थी और वहीं उसे किसे चुड़ैल ने धर लिया था। वह इधर-उधर जंगल में भटक रही थी तभी कुछ गाँव के ही गाय-बकरी के चरवाहों की नजर उस पर पड़ी।  

वे लोग स्थिति को भाँप गए और मेरी बहू को पकड़कर घर पर छोड़ गए। फिर गाँव के ही सोखा बाबा ने झाँड़-फूँक की उसके बाद उस चुड़ैंल से छुटकारा मिला। पर आज सुबह फिर से उस पर चुड़ैल हावी हो गई है, सुबह से ही सोखा बाबा उसे उतारने में लगे हैं, पर वह छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं? - रामखेलावन की बातों को सुनकर रमेसर बाबू थोड़े गंभीर हुए और अचानक पता नहीं क्या सूझा कि हँसने लगे। रमेसर बाबू की यह हालत देखकर रामखेलावनजी तो और भी हक्के-बक्के हो गए। उन्हें समझ में नहीं आया कि आखिर इनको क्या हो गया, कहीं इनपर भी तो किसी भूत-प्रेत का साया नहीं पड़ गया? अभी रामखेलावनजी यही सब सोच रहे थे तभी रमेसर बाबू अपनी कुर्सी पर से उठे और बिना कुछ बोले रामखेलावन को अपने पीछे आने का इशारा करते हुए कमरे से बाहर निकल गए। कमरे से बाहर निकल कर रमेसर बाबू पास की ही एक झाँड़ी से कुछ पत्तों को तोड़ा और मन ही मन कुछ मंत्र बुदबुदाए फिर रामखेलावन को उन पत्तों को देते हुए बोले कि आप इसे पीसकर अपनी बहू को पिला दें, और अपने घर पर ही रूकें। मैं कार्यालय में कुछ जरूरी काम-काज निपटाकर अभी 1-2 घंटे में आपके घर पर पहुँचता हूँ। रामखेलावनजी बिना कुछ बोले, केवल सिर हिलाए और उन पत्तों को लेकर घर की ओर बढ़ें। रास्ते में उन्हें केवल एक ही बात खाए जा रही थी कि रमेसर बाबू को यहाँ आए 3 साल हो गए पर कभी उन्होंने इस बात का जिक्र नहीं किया कि वे भूत-प्रेतों को उतारना भी जानते हैं। कहीं वे मजाक में तो इन पत्तों को तोड़कर, झूठ-मूठ में कुछ बुदबुदाकर मुझे नहीं दे दिए?  


पर रमेसर बाबू ऐसा नहीं कर सकते, वे तो बहुत गंभीर आदमी हैं, और हमारी सारी बातों को भी तो बहुत गंभीरता से लेते हैं और समय-समय पर हर प्रकार से हमारी मदद भी तो करते रहते हैं। ना-ना, वे मेरे साथ मजाक नहीं कर सकते। यही सब सोचते-सोचते रामखेलावनजी घर पर पहुँच गए। घर के बाहर 10-15 गाँव-घर के ही लोग बैठे नजर आए। एक खटिया पर सोखा बाबा भी बैठकर लोगों से कुछ बात-चीत कर रहे थे। रामखेलावनजी को देखते ही सोखा बाबा बोल पड़े, - रामखेलावन, यह चुड़ैल तो बहुत ढीठ है, रात को छोड़ तो दी थी पर सुबह फिर से आ गई। 2-3 घंटे मैंने कोशिश किया पर छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है, अभी भी आंगन में नाच-कूद रही है। मेरे मंत्रों का अब तो उस पर कुछ असर भी नहीं हो रहा है, यहाँ तक कि मेरा भी मजाक उड़ा दी। इतना सब होने के बाद मैं उसे छोड़कर बाहर आकर बैठ गया हूँ। मैं अब कुछ नहीं कर सकता। मेरा जितना पावर था, वह सब अजमा लिया। - रामखेलावनजी सोखा बाबा के ही बगल में बैठते हुए अपनी लड़की को आवाज लगाए, उनकी लड़की घर में से दौड़ते हुए बाहर निकली। फिर रामखेलावनजी ने उन पत्तों को उसे देते हुए कहा कि अभी इसे पीसकर बहू को पिला दो। अगर ना-नूकर करती है तो जबरदस्ती पिलाओ। इसके बाद रामखेलावन की लड़की उन पत्तों को लेकर घर में गई तथा उन पत्तों को पीसकर अपनी भाभी को पिलाई।  

अरे यह क्या, एक घूँट अंदर जाते ही रामखेलावन जी की बहू तो काफी शांत हो गई और वहीं आंगन में ही एक तरई पर बैठ गई। अब उसके व्यवहार में काफी अंतर आ गया था। उसका कूदना-नाचना बंद हो गया। रामखेलावनजी की लड़की दौड़ते हुए घर में बाहर निकली और रामखेलावनजी की ओर देखकर बोली, - बाबू, बाबू! भउजी को अब आराम हो गया है, वे आंगन में ही अब शांति से बैठ गई हैं। - बाहर जितने लोग बैठे थे, वे सब हतप्रभ हो गए। आखिर जो चुड़ैल इतने बड़े सोखा से बस में नहीं आई, वह दो-चार पत्तों को पिलाने से कैसे बस में आ सकती है? आखिर वे कैसे पत्ते थे? क्या किसी धर्म-स्थान से लाए गए थे या किसी बहुत बड़े पंडित, ओझा, सोखा आदि ने दिए थे? वहाँ बैठे लोगों में से एक ने रामखेलावनजी की ओर देखा पर कुछ बोले इससे पहले ही रामखेलावनजी ने उन पत्तों के बारे में बता दिया। सभी लोग बिन देखे उस रमेसर बाबू के प्रति नतमस्तक हो गए। सोखा बाबा ने कहा कि वास्तव में आपके रमेसर बाबू तो बहुत पहुँचे निकले। जिस चुड़ैल को बस में करने के लिए मैंने सारे के सारे हथकंडे अपना लिए, उसे उनके मंत्रित दो-चार पत्तों ने बस में कर लिया। फिर तो रामखेलावनजी थोड़ा तन कर बैठ गए और लगे रमेसर बाबू का गुणगान करने।  

अभी वे लोग आपस में बात कर ही रहे थे तभी रमेसर बाबू की साइकिल वहाँ रूकी। रमेसर बाबू को देखते ही रामखेलावनजी दौड़कर रमेसर बाबू के हाथ से साइकिल लेकर खुद ही खड़ी करते हुए बोले, रमेसर बाबू, आपके पत्तों ने तो कमाल कर दिया। अब बहू काफी अच्छी है और शांति से आंगन में बैठी है। रमेसर बाबू के इतना कहते ही वहाँ बैठे सभी लोग खड़े हो गए और रमेसर बाबू की जयरम्मी करने लगे। रमेसर बाबू सबका अभिवादन स्वीकार करते हुए उन लोगों के बीच ही एक खाट पर बैठ गए। फिर रमेसर बाबू ने रामखेलावनजी की बहू को घर में बाहर बुलवाया। वह काफी शांत थी पर रमेसर बाबू को लगा कि अभी भी वह चुड़ैल यहीं है और पत्ते का असर खत्म होते ही फिर से इसे जकड़ लेगी। रमेसर बाबू ने रामखेलावनजी की बहू को अपने पास बैठने का इशारा करते हुए कुछ मंत्र बुदबुदाने लगे। अरे यह क्या, रामखेलावनजी की बहू घबराकर बोल उठी, मुझे छोड़ दीजिए, मैं जा रही हूँ, मैं अब कभी भी इसे नहीं पकड़ूँगी। मुझे जाने दीजिए, मुझे जाने दीजिए, मैं जल रही हूँ, मुझे छोड़ दीजिए। उस चुड़ैल को इस तरह गिड़गिड़ाते हुए देखकर रामखेलावनजी की काफी हिम्मत बढ़ गई। वे बोल पड़े, रमेसर बाबू, इसे छोड़िएगा मत। इसे जला कर भस्म कर दीजिए

पर वह चुड़ैल रामखेलावनजी की ओर ध्यान न देते हुए, रमेसर बाबू की ओर दयनीय स्थिति में देखते हुए अपने प्राणों की भीख माँगती रही। रमेसर बाबू काफी गंभीर लग रहे थे। वे रामखेलावनजी की बहू की ओर गुस्से से देखते हुए बोले कि तुम कौन हो और इसे क्यों पकड़ीं? इस पर वह चुड़ैल गिड़गिड़ाते हुए बोली की मैं पास के ही जंगल में रहती हूँ। मैं बंजारा परिवार से हूँ, एकबार हमारे परिवार ने इसी जंगल के बाहर अपना टेंट लगाया था। शाम के समय मैं लकड़ी लेने जंगल में प्रवेश की। मुझे पता नहीं चला कि कब मैं घने जंगल में पहुँच गई और रास्ता भी भटक गई। तब तक रात भी होने लगी थी। जंगल में पूरा अंधेरा पसरना शुरू हो गया था। मैं थोड़ी डर गई थी पर हिम्मत नहीं खोई थी। अचानक मेरे दिमाग में एक विचार आया। मैंने सोचा कि रात के इस अंधेरे में अब रास्ता खोजना ठीक नहीं। कहीं किसी जंगली जानवर की शिकार न हो जाऊँ। इसलिए मैंने हिम्मत करके वहीं एक मोटे जंगली पेड़ पर चढ़कर बैठ गई। मैंने सोचा कि सुबह होते ही मेरे परिवार के लोग जरूर मुझे खोजने आएंगे और अगर नहीं भी आए तो मैं दिन में अपना रास्ता खोज लूँगी। पर वह रात शायद मेरे जीवन की समाप्ति के लिए ही आई थी। मैं जिस पेड़ पर चढ़कर बैठी थी, उसी पर एक प्रेत का डेरा था।  


आधी रात तक तो सब कुछ एकदम ठीक-ठाक था पर उसके बाद अचानक वह प्रेत कहीं से उस पेड़ पर आ बैठा। उसके आते ही जैसे पूरे जंगल में भयंकर तूफान आ गया हो। अनेकों पेड़ों की डालियाँ तेज हवा से डरावने रूप से हिलने लगी थीं। मुझे देखते ही वह जोरदार ढंग से अट्टहास किया और मुझे कोई प्रेतनी ही समझ कर बोला कि तुम्हें पता नहीं कि यह मेरा निवास है। मैं कुछ जरूरी काम से जंगल से बाहर क्या गया, तूने मेरे बसेरे पर कब्जा कर लिया।  


मैं तूझे छोड़ूँगा नहीं, इतना कहकर वह मेरे तरफ झपटा, अत्यधिक डर से तो मेरी चींख निकल गई। मैं बहुत तेज चिल्लाई की मैं कोई प्रेतनी नहीं हूँ। मैं इंसान हूँ इंसान। मेरी बातों को सुनकर तो वह और जोर से अट्टहास करने लगा और बोला कि मुझे एक संगिनी चाहिए। तुझे अगर सही-सलामत रहना है तो मुझसे विवाह करना होगा। मरता क्या न करता। मैंने सोचा कि अब इस समय बस एक ही रास्ता है कि इसकी बातों को मान लिया जाए और दिन उगने के बाद यहाँ से खिसक लिया जाएगा। मैंने उसके हाँ में हाँ मिलाते हुए अपनी सहमति दे दी। मुझे क्या पता था कि यह सहमति मुझपर बहुत भारी पड़ेगी। इतना कहने के बाद रामखेलावन की बहू पर सवार वह चुड़ैल फूट-फूटकर रोने लगी। रमेसर बाबू थोड़े भावुक हो गए और उसके प्रति थोड़ी नरमी दिखाते हुए पानी भरा लोटा उसको पीने के लिए दे दिए। दो-चार घूँट पानी पीने के बाद उसने फिर से कहना शुरू किया। मेरी सहमति देने के बाद वह प्रेत पता नहीं कहाँ गायब हो गया, उसके गायब होते ही मैंने थोड़ीं चैन की साँस ली पर यह क्या अभी 10-15 मिनट भी नहीं बीते होंगे कि उस जंगल में जैसे भूचाल आ गया हो।  



एक बहुत बड़ा तूफान आ गया हो। कितने पेड़ों की पता नहीं कितनी डालियाँ टूटकर धरती पर पड़ गईं। कम से कम सैकड़ों भूत-प्रेत वहाँ उपस्थिति हो गए थे। चारों तरफ चीख-पुकार मचा हुआ था। कुछ डरावनी अट्टहास कर रहे थे तो कुछ इस डाली से उस डाली पर कूद-फाँद रहे थे, तो कुछ ताली बजाकर नाच रहे थे। मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है। तब तक वही प्रेत फिर से मेरे पास प्रकट हुआ और बोला की विवाह की व्यवस्था करने चला गया था। अपने परिवार वालों को बुलाने चला गया था। शादी में इन सबको भी तो शरीक करना होगा। अरे यह क्या अब तो मेरी शामत आ गई। पूरा शरीर पीला पड़ गया। कुछ बोलने की हिम्मत नहीं रही, तभी अचानक एक प्रेतनी वहां प्रकट हुई और उस प्रेत से लड़ने लगी। वह प्रेतनी बोल रही थी कि मेरे रहते तूँ दूसरी शादी करेगा, कदापि नहीं, कदापि नहीं। मैं ऐसा नहीं होने दूँगी और इतना कहने के साथ ही उस प्रेतनी ने उस डाल से मुझे धक्का दे दिया और जमीन पर गिरने के कुछ ही समय बाद मेरी इहलीला समाप्त हो गई थी। इतने कहने के साथ ही वह चुड़ैल फिर से रोने लगी थी। इसके बाद रमेसर बाबू ने उस चुड़ैल को चुप रहने का इशारा करते हुए कहा कि आज के बाद तूँ इन गाँव वालों को कभी परेशान नहीं करोगी। चुड़ैल ने हामी भरते हुए कहा कि ठीक है। पर मैं तो एक बहुत ही छोटी आत्मा हूँ। इन पास के जंगलों में पता नहीं कितनी भयानक-भयानक आत्माएँ विचरण करती हैं। आप उन सबसे इस गाँव वालों को कैसे बचा पाएँगे। उस चुड़ैल की इस बात को सुनते हुए रमेसर बाबू हल्की मुस्कान में बोले। तूँ तो बकस इन लोगों को, बाकी भूत-प्रेतों से कैसे निपटना है, वह तूँ मुझपर छोड़। इसके बाद रमेसर बाबू ने लोगों को अब कभी न पकड़ने की बात उस चुड़ैल से तीन बार कबूल करवाई तथा साथ ही उसे थूककर चाटने के बाद ही जाने दिया। तो पाठकगण, रमेसर बाबू ने उस चुड़ैल से तो गाँव वालों को छुटकारा दिला दिया पर क्या वे दूसरे भूत-प्रेतों से उन गाँव वालों की रक्षा कर पाए?



अभी भी याद आ रहा है, जब मैं अपने गाँव के उस बुजुर्ग पंडीजी से यह कहानी सुन रहा था तो भूत-प्रेत के साथ ही उनकी यात्रा के दौरान विस्मय कर देने वाली बातें तो मुझे एक ऐसी दुनिया की सैर करा रही थीं, जहाँ से मैं बिलकुल हीअनजान था और तब यह सोच भी नहीं सकता था कि ऐसा भी है या ऐसा भी हो सकता है? जी हाँ, घटना घटने के समय हमारे गाँव के वो खमेसर पंडीजी बर्मा (अब म्यांमार) में चीनी मिल में नौकरी करते थे।


आज भी गाँवों आदि में अगर कोई व्यक्ति गाँव से दूर खेतों, बागों आदिमें हो या किसी सुनसान जगह पर हो तो कुछ भी खाने से पहले उस खानेवाले वस्तु का कुछभाग उस जगह पर गिरा (चढ़ा) देता है ताकि उसके सिवा अगर वहाँ कोई है, जैसे कि कोई न दिखने वाला प्राणी, प्रेत आदि तो वह उसे ग्रहण कर ले। गँवई लोग गाँव के बाहर अगर कहीं सूनसान क्षेत्र में होते हैं, या किसी ऐसे क्षेत्र में जहाँ उनको लगता है कि यहाँ आस-पास में कोई अदृश्य आत्मा हो सकती है तो वे लोग जब भी सूर्ती (तंबाकू) बनाते हैं तो खाने से पहले थोड़ा सा उस अदृश्य आत्मा के लिए गिरा (चढ़ा) देते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि अगर सूर्ती नहीं चढ़ाएंगे तो अदृश्य आत्मा नाराज होकर उनको परेशान कर सकती है। सुनी-सुनाई बात बता रहा हूँ, कई बार कितने ग्रामीणों को एकांतमें सूर्ती (तंबाकू) मसलकर बिना चढ़ाए खुद खाने की सजा मिल चुकी है। जी, हाँ आस-पास का प्रेत उन लोगों को कभी-कभी तो पटककर मारा है या बहुत परेशान किया है और कभी-कभी तो ऐसे लोगों को उस खिसियाए भूत से अपनी जान बचाने के लिए सूर्ती का पूरा पत्ता ही चढ़ाना पड़ा है और साथ में लंगोट आदि भी। सूर्ती (तंबाकू) का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ कि इस कहानी का सही सूत्रधार सूर्ती (तंबाकू) ही है, अगर उस समय इस सूर्ती (तंबाकू) ने अपना कमाल नहीं दिखाया होता तो शायद यह कहानी कभी जनम ही नहीं लेती।

चीनी मिल में हमारे गाँव के खमेसर पंडीजी के साथ ही अन्य कई भारतीय भी नौकरी करते थे। एक बार खमेसर पंडीजी ने उस चीनी मिल में काम करने वाले अपने कुछ भारतीय दोस्तों से कहा कि क्यों न हम लोग एक बार हिमालय की यात्रा पर, हिमालय के दर्शन करने के लिए चलें। मुझे बहुत ही इच्छा है कि हिमालय की सैर करूँ, 1-2 हफ्ते हिमालय में रहकर हिमालय वासियों से मिलूँ, उनके रहन-सहन देखूँ और साथ ही अपने दादाजी से बराबर सुनते आया हूँ कि हिमालय में यति (हिममानव) के साथ ही बहुत सारेविलक्षण जीव रहते हैं। उन्होंने आगे कहा कि मैं तो अपने दादाजी से सुन रखा हूँ किहिमालय की कंदराओं में आज भी बहुत सारे संत पूजा-पाठ करते, धूँई रमाए हुए और समाधि में लीन देखे जा सकते हैं। उन्होंने आगे यह भी बताया कि हिमालय में सिद्ध महात्मा लोग रहते हैं, जिनके दर्शनमात्र से सारे मनोरथ पूरे हो जाते हैं। इतना ही नहीं हिमालय में दिव्य औधषियाँ पाई जाती हैं, जिनके दर्शन या स्पर्श मात्र से बड़े-बड़े रोग अपने आप ठीक हो जाते हैं। उन्होंने अपने साथियों को बताया कि कैसे एक बार उनके दादाजी अपने कुछ साथियों के साथ हिमालय में गए हुए थे। उनके एक साथी को कोई असाध्य चर्मरोग था पर पता नहीं हिमालय में उसके पैरों आदि से ऐसी कौन-सी दिव्य औषधि टकरा गई की 2-3 दिन में ही उसका असाध्य चर्म रोग ठीक हो गया। खमेसर पंडीजी की यह अलौकिक बातें सुनकर उनके चार साथी हिमालय की यात्रा के लिए तैयार हो गए।


आज हिमालय भले अतिक्रमण का शिकार हो रहा है, लोग वहां भी गंदगी फैला रहे हैं, उस दिव्य क्षेत्र को प्रदूषित कर रहे हैं पर इस घटना (75-80 साल पहले) के समय हिमालय की दिव्यता, सौंदर्य, स्वच्छता स्वर्गिक आनंद का बोध कराती थी। हिमालय की आबोहवा में सांस लेना अपने आप में स्फूर्तभर देता था, मन में आनंद का संचार कर देता था। मानव कीक्रूरता, स्वार्थ की आलोचना करते समय अक्सर चिंतक, लेखक बहक जाता है, अच्छा हो कि हम लोग सीधे कहानी की ओर चलें नहीं तो कहनी कहानी है, बतानी कहानी है और हम मानव के अमानव रूप का वर्णन करने में लग जाएंगे।

खमेसर पंडीजी अपने चार अनुभवी, बहादुर साथियों के साथ हिमालय की यात्रा पर निकल गए। उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में कई हफ्ते बिताए और बहुत सारी अलौकिक, विस्मयभरी बातें, घटनाएँ देखीं। रोंगटे खड़ी कर देनी वाली यह घटना आज भी मेरे जेहन में वैसे ही मौजूद है जैसे मैंने उन पंडीजी से 20-25 वर्ष पहले सुन रखी है। पंडीजी ने बताया कि एक दिन वे बहुत ही सुबह अपने साथियों के साथ हिमालय के एक छोटे शिखर पर चढ़ रहे थे तो लगभग 300 मीटर की दूरी पर उन लोगों को एक बहुत ही विशाल मानव दिखाई दिया। उन्होंने जैसा कि अपने दादाजी से सुन रखा था कि हिमालय में विशाल मानव जिन्हें यति या हिममानव कहते हैं, घूमते रहते हैं। उन्हें उस विशाल मानव को देखकर बहुत ही कौतुहल हुआ और उन्होंने अपने साथियों से कहा कि हम लोग छिप-छिपकर इस महामानव का पीछा करते हैं और इसके बारे में कुछ बातें पता करते हैं। फिर क्या था उस विशाल मानव का पीछा करने के चक्कर में ये लोग हिमालय की उस पहाड़ी पर कब बहुत ही ऊपर चढ़ गए और लगभग दोपहर भी हो गई, इन लोगों को पता ही नहीं चला। वह विशाल मानव भी बहुत दूर होते-होते कहीं गायब हो गया था या किसी गुफा में प्रवेश कर गया था।

खमेसर पंडीजी के एक साथी ने कहा कि हम लोग काफी ऊपर चढ़ आए हैं औरकाफी समय भी हो गया है। भूख भी सताने लगी है और अत्यधिक प्यास भी, साथ ही हम लोगोंके पास न कुछ खाने को है और न ही पानी ही। फिर क्या था अब वे लोग उस पहाड़ी परपानी की तलाश में, कुछ खाद्य फलों की तलाश में आस-पास भटकने लगे। अचानक उन लोगोंको आभास हुआ कि वे लोग रास्ता भटक गए हैं, यह आभास होते ही सबकी साँस अटक गई। अबक्या किया जाए, किधर जाया जाए। एक पेड़ के नीचे वे लोग बैठकर भगवान से गुहार करनेलगे कि काश कोई आ जाए और उन्हें रास्ता दिखा दे। पर शायद वे लोग गलती से ऐसेक्षेत्र में प्रवेश कर गए थे जहाँ किसी अन्य मनुष्य का नामो-निशान नहीं लग रहा था।धीरे-धीरे शाम भी होने लगी थी और प्यास-भूख से इन लोगों का बहुत ही बुरा हाल होरहा था। दिमाग भी काम करना बंद कर दिया था। अब कोई चमत्कार ही इन्हें बचा सकता था।खैर इनके साथ ही इनके चारों साथी भी बहुत ही हिम्मती थे। उन लोगों ने आपस में एकदूसरे को हिम्मत और धैर्य बनाए रखने के लिए कहा। खमेसर पंडीजी ने कहा कि हमें ईश्वर पर पूरा विश्वास है और जरूर हम लोग इस परेशानी से बाहर निकलेंगे। अचानक इनके एक साथी ने अपनी सूर्ती वाली थैली टटोली और उसमें से सूर्ती निकाल कर उसमें चूना मिलाकर मसलते हुए कहा कि दिमाग काम नहीं कर रहा है तो क्यों न सूर्ती (तंबाकू) का आनंद लिया जाए। इतना कहकर वह सूर्ती को मसलने लगा। सूर्ती को मसलने और थोंकने के बाद परंपरानुसार, अपनी आदत अनुसार उसने अपने साथियों को सूर्ती देने से पहले थोड़ी सी सूर्ती वहां यह कहते हुए गिरा दिया कि जय हो यहाँ के भूत-प्रेत, बाबा आदि। कृपया ग्रहण करें और हम लोगों की भूल को क्षमा करते हुए हमें राह दिखाएँ, हमें घर पहुँचाएँ।


जी हाँ, उस चढ़ाई हुई सूर्ती ने अपना काम कर दिया। अचानक वहाँ बहुत ही भयानक और तीव्र हवा चली, आस-पास के छोटे-छोटे पेड़ अजीब तरह से एक दूसरे से टकराए और एक विशाल भूतकायाप्रकट हो गई। वह काया देखने में तो इंसान जैसी ही थी पर आकार-प्रकार में एकदम अलगजो उसके प्रेत होने की पुष्टि कर रही थी। खमेसरजी और उनके साथी डरे नहीं अपितु हाथजोड़कर अभिवादन की मुद्रा में उस विशाल काया की ओर देखने लगे। खमेसरजी और उनका कोई साथ कुछ बोले इससे पहले ही वह विशाल काया तड़प उठी। बहुत दिनों के बाद कुछ खाने को मिला है। तुम लोगों का मैं शुक्रगुजार हूँ। इसके बाद उस विशाल काया ने कहा कि मुझसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैं इस क्षेत्र में चाहकर भी किसी का नुकसान नहीं पहुँचा सकता।


इसके बाद वह प्रेत काया वहाँ से जाए इससे पहले ही खमेसर पंडीजी ने कहा कि हे भूतनाथ! हम लोग रास्ता भटक गए हैं, कृपया हमें नीचे तक बस्ती में जाने का मार्ग बताएँ। खमेसर पंडीजी की बात सुनकर वह प्रेत पहले तो हँसा पर फिर अचानक गंभीर हो गया। उसने कहा कि मैं तो खुद ही भटक गया हूँ। सालों हो गए, इस क्षेत्र से निकलने की कोशिश कर रहा हूँ पर खुद ही नहीं निकल पा रहा हूँ। उसने आगे कहा कि मैं ब्राह्मण हूँ। बहुत पहले इस क्षेत्र में आया था। एक गुफा में एक महात्मा की सेवा में लग गया था क्योंकि मुझे सिद्धियाँ प्राप्त करनी थीं। एक दिन मुझसे एक घिनौना अपराध हो गया। मैंने महात्माजी के समाधि में जाने के बाद धीरे से उठा और उस गुफे के बाहर आ गया। गुफे से बाहर आने के बाद अपनी थोड़ी सी शक्ति जो मुझे प्राप्त हुई थी उसके बल पर आस-पास अपने तपोबल से नजर दौड़ाई। मुझे पास में ही किसी भूतनी केहोने का आभास हुआ। मैंने अपनी शक्ति से उसे अपनी ओर खींच लिया और उसे एक सुंदरयुवती में परिवर्तित कर दिया। फिर मैं उसके साथ विहार करने लगा। मैं विहार मेंइतना लीन था कि मुझे पता ही नहीं चला कि मेरे महात्मा गुरुजी मेरे पास आ गए हैं।अचानक मुझे भान हुआ कि मेरे गुरुजी गुस्से में जल रहे हैं। मैं काँपने लगा और इशारे में उस भूतनी को भागने के लिए कहा। कुछ बोलूँ इससे पहले ही मेरे गुरुजी बोल होते, “नीच ब्राह्मण! तूने ब्राह्मण का, तपोशक्तियों का अनादर किया है। तूँ जीने का अधिकारी नहीं। मैं तूझे श्राप देता हूँ कि तूँ भी मनुष्य योनि त्यागकर प्रेत हो जा।” गुरुजी के इतना कहते ही मेरा शरीर जलने लगा और मैं कुछ कर पाता इससे पहले ही मनुष्य योनि त्यागकर प्रेत योनि में आ गया था। इसके बाद गुरुजी ने कहा कि तूँ आस-पास के क्षेत्र में ही भटकता रहेगा और अपने किए की सजा भुगतता रहेगा और इतना कहकर गुरुजी गुफा में प्रवेश कर गए। फिर मैंने कई बार सोचा कि गुफा में जाकर अपने गुरु से क्षमा माँगू पर जब भी उस गुफा की ओर बढ़ने की कोशिश करता हूँ, शरीर जलने लगती है और कोई बड़ी शक्ति मुझे गुफा में प्रवेश नहीं करने देती।

इसके बाद उस ब्रह्मपिशाच ने कहा कि शायद आप लोग गुफा में प्रवेश कर जाएँ। उसने कहा कि अगर आप लोग गुफा में प्रवेश कर जाएंगे तो आप लोगों की जान अवश्य बच जाएगी, क्योंकि गुफा में बहुत सारे सिद्ध, अतिसिद्ध महात्मा रहते हैं, वे लोग अपने तपोबल से आप सबको नीचे बस्ती में पहुँचा सकते हैं। इसके बाद उस ब्रह्मपिशाच ने कहा कि निडर होकर मेरे साथ आइए, मैं गुफा का द्वार दिखाता हूँ। फिर क्या था बिना कुछ बोले या दिमाग पर जोर डाले हम लोग उस प्रेत के पीछे हो लिए। कुछ दूर चलने के बाद हमें कुछ ऊँचाई पर एक गुफा की आकृति दिखी। उस प्रेत ने बताया कि थोड़ा ऊपर जो एक छेद दिख रहा है, आप लोग उससे गुफा में प्रवेश करने की कोशिश करें। हम सभी लोग उस प्रेत की बात सुनकर हतप्रभ हो गए। हम लोग कोई छोटे-मोटे जीव, साँप, बिल्ली आदि हैं क्या कि इस पतले छेद से अंदर जा पाएंगे? शायद वह ब्रह्मप्रेत हमारे मन की बात जान गया। उसने अट्टहास किया औरबोला, अरे डरिए मत। यह अलौलिक द्वार है। अगर आप लोगों ने थोड़ा भी पुन्य किया है, या अच्छे इंसान होंगे तो इस पतले छेद के पास पहुँचकर प्रार्थना करने पर, नमस्कार करने पर यह छेद अपने आप आप लोगों को मार्ग दे देदा यानी बड़ा-चौड़ा हो जाएगा। हम साथियों ने इशारे ही इशारे में एक दूसरे की सहमति लेकर उस पतले छेद के पास पहुँचे। फिर क्या था, हम लोग झुककर उस छेद को प्रणाम किए। अरे यह क्या चमत्कार हो गया और वह पतला छेद एक बड़े आकार में बदल गया। फिर हम लोगों ने उस प्रेत महानुभाव को नमस्कार व विदा करते हुए उस गुफा में प्रवेश कर गए।

अनोखी, अद्भुत, अलौकिक, स्वर्गिक गुफा। जिसका वर्णन हो ही नहीं सकता। गुफा में हम लोग ज्यों-ज्यों अंदर बढ़ते गए, हम लोगों की थकावत, डर छूमंतर होते गए। एक ऐसा आनंद जो शायद आनंद की पराकाष्ठा हो। अब भले हम लोगों के साथ जो भी पर हमारा मनुज जन्म सफल हो गया था। हम लोगों को इस बात का भी गर्व हो रहा था कि वास्तव में हम लोग अच्छे इंसान हैं, तभी तो इस गुफा ने हमें अंदर आने के लिए मार्ग दे दिया।


खैर मैं (प्रभाकर पांडेय) भी अब इस अनोखी, रहस्यमयी, सभी सुखों को देने वाली, दिव्य गुफा में रहना चाहता हूँ और परमानंद की प्राप्ति करना चाहता हूँ। मैं ऐसा करूँ इससे पहले मेरा फर्ज यह भी है कि मैं अपने पाठक महानुभावों के लिए इस कहानी को पूरा करूँ।


गुफा में और कुछ अंदर जाने पर अचानक इन लोगों को रुकना पड़ा। क्योंकि सामने से इन्हें जंगली हिंसक पशु आते हुए दिखाई दे रहे थे तो कभी उफनती नदी इन्हें बहा ले जाने का प्रयास कर रही थी तो कभी प्रज्ज्वलित आगे बढ़ती अग्नि इन्हें जलाने का पर यह सब माया जैसा ही लग रहा था क्योंकि न वे हिंसक पशु इन्हें नुकसान पहुँचा रहे थे और ना ही नदी इन्हें भिगो रही थी और ना ही अग्नि इन्हें जला रही थी। इस हिम्मती दल ने हिम्मत दिखाई और आगे बढ़ना जारी रखा। कुछ दूर और आगे जाने पर एक महात्मा दिखे। जिनका शरीर दिव्य था। पूरे शरीर से आभा निकल रही थी, मस्तक सूर्य जैसा चमक रहा था, चेहरे पर एक अतुल्य, रहस्यमय मुस्कान तैर रही थी और वे दिव्य महात्मा धीरे-धीरे चहलकदमी कर रहे थे। हम लोग सहम गए और हाथ जोड़कर जहाँ थे वहीं खड़े हो गए। फिर क्या हुआ कि उस दिव्य महात्मा ने हमें और अंदर आने के लिए कहा और बिना कुछ बोले गुफा में एक तरफ बैठ जाने का इशारा किया। उस गुफा की सबसे रहस्य, अलौकिक बात यह थी कि जिस किसी को जितनी जगह चाहिए थी, वह अपने आप मिल जाती, बन जाती थी। अरे यह क्या, ज्योंही हम लोग बैठने लगे, पता नहीं कहाँ से हमारे बैठने वाली जगह पर खूबसूरत व आरामदायक बिस्तर बिछ गए। फिर उस महात्मा की सौम्य आवाज सुनाई दी, “मनुज श्रेष्ठ! लगता है कि आप लोग रास्ता भटक गए हैं और काफी देर से परेशान हैं। आप लोगों को भूख और प्यास भी खूब लगी है। आप लोगों को रास्ता बताने से पहल हमारा यह भी कर्तव्य बनता है कि आप अतिथियों की सेवा करूँ।” इतना कहने के बाद उस महात्माजी ने वहीं पास में उगी तुलसी माता के कुछ पत्तों को तोड़ा और हम पाँचों के सामने एक-एक रख दिए। फिर क्या था, एक नया, रहस्यमयी चमत्कार। मिनटों नहीं लगे उस तुलसी पत्ते को थाली-गिलास-स्वादिष्ट व्यंजनों में तब्दील होने में। सब से अनोखी बात यह थी कि हम सबके थाली में अलग-अलग व्यंजन थे यानि हमारे मन में उस समय जो खाने की इच्छा हो रही थी, उन्हीं व्यंजनों से हम लोगों की थाली भरी पड़ी थी। फिर क्या था उस दिव्य महात्मा का आदेश मिलते ही हम लोगों ने छक-छककर उस दिव्य प्रसाद का आनंद उठाकर पूरी तरह से तृप्त हो गए।


भोजन करने के बाद उस महात्माजी ने कहा कि इस गुफा में बहुत सारे महात्मा समाधि, पूजा-पाठ में लीन हैं। आप लोग अब इस गुफा में इससे आगे नहीं जासकते। मैं तो इन दिव्य गुरुओं का एक छोटा सा सेवक मात्र हूँ जो इन सबकी सेवा में लगा रहता हूँ। उस दिव्य महात्मा ने यह भी बताया कि वे काशी (बनारस) के पास के रहने वाले हैं और बचपन में ही संसार त्यागकर हिमालय में आ गए थे और काफी भटकने के बाद एक दिन एक महात्मा उन्हें इस गुफा में लेकर आए, तब से वे वहीं हैं और महात्माओं की सेवा में लगे हुए हैं। उन्होंने आगे बताया कि उन्हें इस गुफा में आए लगभग 5 सौ सालसे अधिक हो गए हैं। फिर उन्होंने कहा कि अब आप लोगों को यहाँ से फौरन निकलना चाहिए, क्योंकि अगर किसी अन्य गुरु महात्मा की नजर आप सब पर पड़ गई तो आप लोग भस्म भी हो सकते हैं क्योंकि न चाहकर भी कोई आम इंसान, प्राणी इन दिव्य महात्माओं के दिव्य नेत्र से जलने से नहीं बच सकता। हम लोग कुछ बोलें, इससे पहले ही उस महात्मा ने कहा कि आप लोग आँख बंद करें। हम सभी लोगों ने उस दिव्य महात्मा के आदेश का पालन करते हुए अपने नेत्रों को बंद कर लिया। फिर उस महात्मा की आवाज आई, अब आप लोग अपनी आँख खोलें। चमत्कार। अद्भुत, अविस्मरणीय चमत्कार। जब हम लोगों ने आँखें खोली तो अपने आप को हिमालयी क्षेत्र में उस बस्ती के पास खड़े पाए जहाँ हम लोग ठहरे हुए थे। कहानी खतम हुई। आप भले मानें या न मानें, बहुत सारे चमत्कार, रहस्यमय बातें हैं, जिनपर विज्ञान का वश नहीं चलता।





कमरा 999

एक उजाड़ शहर के मध्य में एक लंबे समय से परित्यक्त होटल था जिसे केवल "द क्रिमसन मैनर" नाम से जाना जाता था। स्थानीय लोग दबे स्वर में उस बुराई के बारे में बात करते थे जो कभी वहां रहती थी, गायब हुए मेहमानों और रहस्यमय ढंग से गायब होने की कहानियां फुसफुसाते हुए। इस भयानक इमारत के भीतर कई प्रेतवाधित कमरों में से, कमरा 999 को उन सभी में सबसे अधिक शापित कहा जाता था।

अफवाहों के पीछे की सच्चाई को उजागर करने के लिए उत्सुक, बहादुर युवा रोमांच-चाहने वालों के एक समूह ने एक भयानक रात में प्रेतवाधित होटल में जाने का फैसला किया। उनके निडर नेता, एलेक्स, यह साबित करने के लिए दृढ़ थे कि कहानियाँ अंधविश्वास के अलावा और कुछ नहीं थीं।

जैसे ही समूह ने चरमराते दरवाज़ों के माध्यम से कदम रखा, हवा में एक दमनकारी माहौल भर गया। प्राचीन लकड़ी के फर्श हर कदम पर कराहने लगते थे, मानो उन्हें पीछे मुड़ने की चेतावनी दे रहे हों। अपनी बेचैनी को नजरअंदाज करते हुए, वे परित्यक्त गलियारों का पता लगाने के लिए आगे बढ़े, उनकी फ्लैशलाइटें खस्ताहाल दीवारों पर भयानक छाया डाल रही थीं।

वे कक्ष 999 में पहुँचे, एक दरवाज़ा अजीब प्रतीकों और सूखे खून के धब्बों से ढका हुआ था। ऐसा लग रहा था कि इसके चारों ओर की हवा ठंडी हो गई है, और समूह झिझक रहा था, यह महसूस करते हुए कि अंदर कुछ द्वेषपूर्ण छिपा है। लेकिन जिज्ञासा और साहस ने उन्हें आगे बढ़ाया, और एलेक्स ने प्रत्याशा की कंपकंपी के साथ घुंडी घुमा दी।

अंदर, कमरे में हल्की रोशनी थी, धूल भरी नाइटस्टैंड पर एक टिमटिमाती मोमबत्ती थी। हवा क्षय की गंध से भारी थी, और दीवारें भयानक चित्रों से सजी हुई थीं जो उन्हें हर कोण से देख रही थीं। दीवार पर लगे एक दर्पण में उनके डरावने भाव प्रतिबिंबित हो रहे थे, लेकिन कुछ गड़बड़ थी - उनके प्रतिबिंब मुड़े हुए और विकृत दिख रहे थे।

जैसे-जैसे समूह ने आगे खोजबीन की, अजीब घटनाएँ सामने आने लगीं। उन्होंने असंबद्ध फुसफुसाहट, ठंडी हँसी और पीड़ा भरी चीखों की धीमी गूँज सुनी। उनकी फ्लैशलाइटें टिमटिमाती रहीं, जिससे वे रुक-रुक कर अंधेरे में चले गए। उनके दिलों में दहशत घर करने लगी और उन्हें एहसास हुआ कि वे कमरा 999 में अकेले नहीं हैं।

घुसपैठियों पर प्रहार करते हुए एक द्वेषपूर्ण उपस्थिति ने स्वयं को प्रकट किया। वस्तुएँ बिना किसी स्पष्टीकरण के कमरे में उड़ गईं, और तापमान गिर गया, जिससे फर्श पर बर्फ जमा हो गई। एक-एक करके, समूह के सदस्य गायब होने लगे, उनकी भयभीत चीखें शून्य में लुप्त हो गईं।

समूह के अंतिम शेष सदस्य एलेक्स ने बाहर निकलने का रास्ता खोजने के लिए संघर्ष किया। लेकिन ऐसा लग रहा था कि कमरा 999 बदल गया है और उसका लेआउट बदल गया है, जिससे बचना असंभव हो गया है। जैसे ही उस पर निरंतर भय का साया मंडराने लगा, उसकी नजर फर्श के नीचे छिपी एक डायरी पर पड़ी। यह एक पूर्व अतिथि का था जो कई साल पहले कमरे में रुका था।

डायरी में एमिली नाम की एक महिला की दुखद कहानी सामने आई, जिसने होटल में शरण ली थी, लेकिन एक क्रूर और अंधेरे अनुष्ठान का शिकार हो गई। उसकी बेचैन आत्मा अब कमरा 999 में फंस गई थी, जो उसकी शांति को भंग करने का साहस करने वाले किसी भी व्यक्ति से बदला लेना चाहती थी। एलेक्स को एहसास हुआ कि एमिली की पीड़ित आत्मा को मुक्त करने का एकमात्र तरीका उसके दर्द का सामना करना और अतीत की गलतियों को सुधारना है।

कांपते हाथों से, उसने कमरे के चारों ओर मोमबत्तियाँ जलाईं, खुद को टिमटिमाती लपटों के घेरे में घेर लिया। तापमान बढ़ गया, और छाया से एक भूतिया आकृति उभरी - एमिली की आत्मा। जैसे ही वह एलेक्स पर अपना क्रोध प्रकट करने की तैयारी कर रही थी, उसकी आँखें क्रोध और दुःख से चमक उठीं।

लेकिन भागने के बजाय, एलेक्स ने सहानुभूति और दुःख के शब्द बोले, उसकी पीड़ा को स्वीकार किया और उसे शांति पाने में मदद करने का वादा किया। धीरे-धीरे, एमिली का गुस्सा कम हो गया और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने अपनी पीड़ा के पीछे की सच्ची कहानी और जीवन में अपने द्वारा सहे गए अन्याय का खुलासा किया।

नई समझ के साथ, एलेक्स ने एमिली की कहानी को दुनिया के सामने प्रकट करने की कसम खाई, यह सुनिश्चित करते हुए कि उसकी स्मृति का सम्मान किया जाएगा और उसके उत्पीड़कों को उजागर किया जाएगा। जैसे ही भोर की पहली किरणें जीर्ण-शीर्ण खिड़कियों से बाहर निकलीं, एमिली की आत्मा को अंततः सांत्वना मिली और वह ऊपर चली गई, और अपने पीछे एक ऐसा कमरा छोड़ गई जो अब शापित नहीं होगा।

कमरा 999 खाली रहा, जो अतीत की एक गंभीर याद है। लेकिन शहर की किंवदंतियाँ धीरे-धीरे ख़त्म हो गईं, उनकी जगह करुणा और मुक्ति की कहानी ने ले ली। और आज तक, क्रिमसन मनोर खड़ा है, इसके रहस्य ढहती दीवारों के पीछे छिपे हुए हैं, और एक और जिज्ञासु आत्मा का इंतजार कर रहे हैं जो इसके भूतिया अतीत को उजागर करे।

भूतिया मंदिर का रहस्य

पूर्वी भारत के एक प्राचीन गांव में, एक पुराने और भूतिया मंदिर का रहस्यमयी इतिहास है। यह कहानी उसी मंदिर के आसपास घूमती है जो दिखने में भला ही सामान्य था, लेकिन भीतर से उसमें कुछ अलग ही चीज़ें घट रही थीं।

इस कहानी के मुख्य किरदार हैं रजनी, वीर, और सिया। रजनी एक बुद्धिमान और बेवजह डरपोक लड़की है, जिसकी एक विशेष खोज की प्रेरणा उसे भूत प्रेतों से जुड़ी एक पुरानी किताब से मिलती है। वह अपने दोस्त वीर और सिया के साथ भूतिया मंदिर के पीछे के रहस्य को सुलझाने का साहस करती है।

मंदिर में घुसते ही तीखी ठंड, भयानक आवाज़ें और अजीब सी घटनाएं उन तीनों को डराती हैं, लेकिन रजनी के दृढ निश्चय और वीर के साहस के साथ वे आगे बढ़ते हैं। मंदिर के अंदर एक छिपी हुई भूतिया ताकत का सामना करते हुए उन्हें अनदेखे खजाने, अतीत के रहस्य, और प्रेतों की दुनिया का सामना करना पड़ता है।

कहानी में सफलता प्राप्त करने के लिए, उन्हें अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक दूसरे की मदद करने की ज़रूरत होती है। वे धीरे-धीरे भूतिया ताकत के रहस्य का पता लगाते हैं और उसे नियंत्रित करने के लिए एक संयुक्त योजना बनाते हैं।

जबकि रजनी, वीर और सिया अपने रहस्यमय और रोमांचक परीक्षणों से गुजरते हैं, उन्हें स्वयं में भरोसा करना सीखना पड़ता है और यह भी पता चलता है कि कभी-कभी भूत प्रेतों के पीछे के रहस्यमय रूप से हमारे अपने अंदर के भय और डर को जीतना ज़रूरी होता है।

भूतिया मंदिर का रहस्य एक अत्यंत रोमांचक और सफलता की कहानी है, जो दर्शकों को भूत प्रेतों और उनके रहस्यमय दुनिया की रोमांचक दुनिया में खींचती है। कहानी उच्च स्तर के साहित्यिक मूल्य और रहस्यपूर्ण प्रसंगों के साथ, पाठकों का मन मोह लेती है और उन्हें अपने अंदर के साहस को खोजने के लिए प्रेरित करती है।

भूतिया आवास

पूर्वी राजस्थान के एक छोटे से गांव में एक भूतिया आवास था। यह किले के रूप में बना था और इसकी वजह से उस इलाके में लोग नहीं रहना चाहते थे। इसके चारों ओर बनाए गए कई किस्से होते थे जो कहते थे कि वहां भूत प्रेत रहते हैं। लोग इसे एक खौफनाक जगह मानते थे।

इस कहानी के मुख्य किरदार हैं रोहित और आकांक्षा। ये दोनों ही जवान थे और उनके उत्साही भविष्य की परवाह नहीं थी। रोहित एक संवेदनशील और खुले दिल वाले लड़के थे, जबकि आकांक्षा अपने सपनों को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास करने वाली एक दृढ़-निश्चयी लड़की थी।

एक दिन, उन्होंने सुना कि उनके गांव में एक नए भूतिया आवास का खुलने वाला है। लोग कह रहे थे कि उस आवास में भूत-प्रेत रहते हैं और वहां कुछ अनोखी घटनाएं घट रही हैं। इस खबर ने रोहित और आकांक्षा की रूह को छू लिया और उन्हें उस आवास का पता लगाने में दिन रात लग गए।

अंततः, रोहित और आकांक्षा ने एक पुराने पुस्तकालय में एक पुरानी किताब मिली, जिसमें उस भूतिया आवास के बारे में कई किस्से लिखे थे। उन्होंने खुद को उसी पुस्तक में डूबा दिया और उसके विचारों में खो गए।

किस्से कहते थे कि लंबे समय पहले, उस आवास में एक राजा और रानी रहते थे। राजा बड़ा अधुरा महसूस कर रहा था और उसे लगता था कि उसके राज्य को कोई शैतानी शक्ति घेर रही है। एक दिन, एक विद्वान महर्षि आकार्षण के लिए उसके दरबार में आए। महर्षि ने कहा कि उसके राज्य में शैतानी शक्तियों का वास है और उन्हें दूर करने के लिए वह उस भूतिया आवास बनवाए।

राजा ने महर्षि की सलाह मानी और वह आवास बनवा दिया। फिर से उसे आवास में रहने का आनंद मिला और उसके राज्य में खुशियां फिर से विचरण करने लगी।

रोहित और आकांक्षा ने किस्से पढ़ कर आवास की सच्चाई समझी और यह तय किया कि वे भी उस आवास को खोजेंगे और उसके रहस्य को सुलझाएंगे।

दोनों ने मिलकर कई रोचक चीजें पता कीं, भूत प्रेतों से जुड़े कई रहस्य खुले और कुछ अनोखे अनुभव हुए। कहानी में भूतिया आवास के रहस्य के पीछे का सच समझ में आया और रोहित-आकांक्षा ने उसे खत्म कर दिया।

इस कहानी के अंत में, रोहित और आकांक्षा ने दिखाया कि वे भय को मात कर सकते हैं, और अगर उनके दिल में सही इरादे हों तो किसी भी भय का सामना करना संभव है। इस कहानी से सिख मिलती है कि भूत-प्रेतों का असली स्वरूप हमारे अंदर के भय से जुड़ा होता है, जिसे हम सामर्थ्यशाली बनकर पार कर सकते हैं।

ताजमहल का भूतिया राजकुमारी

एक बार की बात है, एक छोटे से गाँव में रहने वाले एक लड़के का नाम राहुल था। राहुल बचपन से ही अजीब और अनोखे चीजों का दीवाना था। वह रोजाना अपने दोस्तों को भूतिया कहानियों से डराने में लगा रहता था। लेकिन खुद भी डरना पसंद करता था। रात के समय जब उसके घर में अंधेरा छा जाता था, तो उसकी रूह कंप जाती थी।

एक दिन, राहुल और उसके दोस्त गोलू और मोलू ने एक वन्डरिंग वुड्स में जाने का प्लान बनाया। वो वन्डरिंग वुड्स कहते थे क्योंकि ये जगह अपने रहस्यमयी और भयानक घटनाओं के लिए प्रसिद्ध थी। जब वे जंगल में पहुंचे, तो वहां की गहरी शोक से राहुल का भय और भी बढ़ गया।

जंगल के भीतर राहुल, गोलू और मोलू ने एक पुरानी खाली हुई हवेली देखी। वे खुद बचपन से भूतिया हवेलियों की कहानियों सुनते आए थे, इसलिए उन्हें वहां जाने में कोई दिक्कत नहीं हुई। धीरे-धीरे, उन्होंने हवेली के अंदर घुसा लिया।

हवेली के अंदर घूमते हुए, वे अपनी जाँच करने लगे। वहां बरसात की आवाज़ थी, और सीने की ठंडक के बावजूद उन्हें एक अजीब सी गर्माहट महसूस हो रही थी। धीरे-धीरे, वे भयभीत होने लगे और वन्डरिंग वुड्स में वापस जाने की सोचने लगे। तभी एक छिपी हुई कमरे से एक भूत निकला और उन्हें देखकर रोने लगा।

राहुल, गोलू और मोलू की आंखें फटी रह गई। वे डर के मारे भागने लगे और हवेली से बाहर निकल आए। जब वे वन्डरिंग वुड्स से बाहर निकले, तो राहुल ने एक नोटिस बोर्ड पर एक सुस्पष्टिकरण पाया।

नोटिस बोर्ड पर लिखा था, "हवेली के अंदर न जाएं, यहां रहने वाले किसी को ख़तरा होता है। यहां कुछ अजीब और रहस्यमयी बातें होती हैं, जिन्हें समझना आपके बस की बात नहीं।"

राहुल, गोलू और मोलू ने वहां से फिर वन्डरिंग वुड्स के बाहर वापसी की और उन्होंने खुद को वहीं अपने गाँव के रसोईघर में पहुँचते देखा, जहां उनके माता-पिता रात का खाना बना रहे थे।

यह रही एक डरावनी और भयानक हॉरर कहानी। जीवन में हमें विचारशील रहना चाहिए क्योंकि अक्सर अनजाने में हमारे सामने कुछ ऐसा आ सकता है जिससे हमें डर लग सकता है। लेकिन हर डरावनी कहानी के बारे में एक बात याद रखना जरूरी है - यह सिर्फ कहानी होती है और हकीकत में ऐसी चीजें नहीं होतीं।

दिल्ली के नजदीक आगरा शहर में विश्वप्रसिद्ध ताजमहल है, जिसे भारत की मुग़ल शासक शाहजहाँ ने अपनी पत्नी मुमताज़ महल की याद में बनवाया था। ताजमहल के सुंदरता को देखकर हर किसी को मोह लेने वाली एक कहानी गूंजती रहती है, लेकिन इस खूबसूरत इमारत के पीछे छिपी एक भयानक रहस्यमयी कहानी भी है।


कई लोगों के अनुसार, रात को जब ताजमहल बिलकुल अंधेरे में ढल जाता है, तो वहां एक प्रेतात्मा घूमती है - राजकुमारी मुमताज़, जिसकी मौत हो गई थी जब वह सिर्फ १९ वर्ष की थी। इसे देखने की बात ज्यादातर लोगों ने रिपोर्ट किया है, जिन्होंने रात को ताजमहल में रहने का अनुभव किया है।


एक बार, एक जुनूनी पत्रकार, विक्रम नाम का, ताजमहल में एक रिसर्च करने का निर्णय लिया। वह रात भर वहां रहने को तैयार था और उसने अपने आस-पास के सभी उपकरणों को साथ लिया था - वीडियो कैमरा, फ़ोटो कैमरा, वॉयस रिकॉर्डर, इलेक्ट्रॉनिक थर्मामीटर आदि।


जब रात को ताजमहल खुला था, विक्रम अकेले ही इसे खोजने के लिए अंदर घुस गया। उसके आगमन के बाद, वह अपने कैमरे से ताजमहल की खूबसूरत चित्रें क्लिक करने लगा। रात के ढलते समय, उसने वॉयस रिकॉर्डर से सिर्फ शांति की आवाज़ रिकॉर्ड की और वीडियो कैमरे के लिए भी कुछ वीडियो शॉट लिए।


धीरे-धीरे विक्रम को नींद आने लगी और वह अपना सूटकेस पकड़कर एक पलंग पर लेट गया। रात बिताने के लिए, वह ताजमहल के बगीचे में एक सुरंग में चला गया था और शांति के साथ खोया हुआ था।


कुछ समय बाद जब वह वापस ताजमहल लौटा, तो वह अपने सूटकेस से उतरकर देखा कि वहां एक हार्ड ड्राइव पड़ा हुआ था। विक्रम हार्ड ड्राइव को चेक करने के लिए उसे अपने कंप्यूटर से जोड़ा और उसमें एक वीडियो फ़ाइल मिली।


जब विक्रम वीडियो देखने लगा, तो उसे बड़ी ही चौंक पड़ी। वीडियो में उसके बिस्तर पर उसकी खुद की तस्वीर दिख रही थी, जिसमें वह सो रहा था, लेकिन वीडियो का तारीक दिन उसी रात का था। वह हिला नहीं पा रहा था और अचानक उसने समझ लिया कि ताजमहल में वह राजकुमारी मुमताज़ के साथ नहीं अकेले था, बल्कि कोई और भी उसके साथ था।


वीडियो के आखिरी पलों में, उसने देखा कि एक अंधेरे सी आँख उसे देख रही थी, जिसके बाद उसकी तस्वीर बिलकुल ही फ़ेड हो गई।


विक्रम को बहुत डर लगा, और वह फ़ोन पर एक राजकुमारी को बताने के लिए तैयार हो गया। राजकुमारी ने उससे कहा कि ताजमहल में कुछ अत्याचार किया गया था और उसे अंधेरे से बचने की कोशिश कर रही थी। राजकुमारी के मारने के बाद, उसकी आत्मा ताजमहल में आँखें खोल रही हैं और उसे इस संसार से आज़ादी पाने की इच्छा है। वह बताने के लिए आई है कि उसके मौत की ज़िम्मेदार उसका एक प्रेमी है, जिसका वह साथ छोड़ने को तैयार नहीं था, और उसी ने उसकी हत्या की थी।


विक्रम को राजकुमारी के विचारों का सामना करना पड़ा, और उसने उसे शांति प्रदान की और उसे यह आश्वासन दिया कि वह राजकुमारी की मौत का रहस्य खुलने में मदद करेगा।


इस घटना के बाद से, विक्रम ने ताजमहल के भूतिया राजकुमारी के रहस्यमयी विचारों को दुनिया के सामने लाने से इनकार कर दिया। लेकिन उसकी रात की वह अनोखी अनुभूति आज भी लोगों को दिलचस्पी और आकर्षित करती है।

चुड़ैल डाकिन की कहानी


चुड़ैल और डाकिन की कहानी भारतीय लोककथाओं और जिलों में से एक है। यह कहानी अलग-अलग सिद्धांतों में लोगों के बीच प्रचलित है और विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में अलग-अलग सिद्धांतों के साथ प्रसिद्ध है। यहां एक संक्षिप्त में इस कहानी को प्रस्तुत किया गया है:

कहानी का प्रसंग एक छोटे से गाँव में होता है, जहाँ एक भूतिया जंगल होता है। इस जंगल के नजदीक एक भूतिया वृक्ष है, जहां स्थानीय लोग भयंकर शक्तियों से जुड़े हुए हैं। जंगल के आस-पास के लोग उस जंगल को कटने से बचाकर रखते हैं, क्योंकि उनके साथ डाकिन और चुड़ैल के जुड़े कई डरावने किस्से सुनने को मिलते हैं।

डाकिन एक राक्षसी होती है, जो रात के समय घूमते हुए बच्चे और मुर्ख लोग अपनी शक्तियों के साथ मिलकर अपना काम पूरा करते हैं। चुड़ैल भी एक प्रकार की भूतिनी होती है, जो अपने सुंदर रूप से लोगों को आकर्षित करती है और फिर उन्हें अपनी शक्तियों के जाल में फंसाकर खेलती है।

एक दिन, एक बहादुर और बुद्धिमान युवा जंगल में चला गया। उसने देखा कि मैकिन और विच वहां अपनी शक्तियों के साथ खेल रहे हैं। वह उन्हें परेशान करता है और निराश होकर देखता रहता है और दिन भर खेल के बाद वे अक्सर एक पेड़ के नीचे आराम करते हैं।

युवक ने अपनी बुद्धि से सोचा कि अच्छा तो मौका है इन दोनों को परास्त करने का। उसने एक शक्तिशाली वज्र बनाने का निर्णय लिया और उसके दोनों पेड़ों के नीचे रख दिया। रात को जब मैकिन और विच वहाँ सर्पें, तो उन्होंने वज्र देखा और अचंभित हो गए। जैसे ही वे वज्र को छूते हैं, तो उन्हें वज्र की शक्ति से नुकसान होता है। युवा उन्हें पकड़ लेते हैं और उनके वज्र को वापस ले जाते हैं।

डाकिन और चुड़ैल ने जब देखा कि वे हार गए हैं, तो उन्होंने वचन दिया कि वे अब कभी इस जंगल में रहेंगे

इस

चुड़ैल (चुडैल) और डाकिन (डाकिनी) भारतीय लोककथाएँ और रूपकों में पाए जाने वाले प्राकृतिक अनुभव हैं। इन दोनों में शामिल हैं, जिनमें लोगों ने सदियों से लोककथाओं, चुम्बनों और किताबों के माध्यम से आगे की कहानियां लिखी हैं।

विच, भारतीय लोककथाओं में एक प्रसिद्ध प्रेतात्मा है, जो अपने भयानक रूप और चाल-ढाल से लोगों का फ़्लोरिडा अनुभव कराती है। इन ग्रंथों में अलग-अलग सिद्धांतों के बारे में बताया गया है, लेकिन ज्यादातर ग्रंथों में उन्हें मरे हुए लोगों की आत्मा या किसी शत्रु के रूप में दर्शाया गया है। जादूगरनी के बारे में कहा जाता है कि वे रात के समय आत्मा के रूप में घूमती हैं और उन्हें अपने शिकार द्वारा आकर्षित करके भयानक रूप में मारती हैं।

डाकिन भी एक प्रकार का भयानक प्रेत होता है जो रात के समय घूमता है। डाकिन के रूप में अलग-अलग पृष्ठ भी बदलते रहते हैं। कुछ स्थानों पर डाकिन को चुड़ैल का समान भंडार दिखाया गया है जबकि कुछ स्थानों पर उन्हें विशेष रूप से भयानक शक्तियों से युक्त दिखाया गया है।

बुराई और डाकिन के किस्से आम तौर पर रात के समय कही जाने वाली कहानियों में सुनाए जाते हैं और लोग उन्हें एक अच्छे और नेक संदर्भ में अच्छाई के प्रतीक और बुराई के प्रतीक के रूप में प्रयोग करते हैं। यह कहानियाँ बच्चों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पढ़ाने का उद्देश्य यह है कि अच्छा कर्म करना हमेशा सही होता है, जबकि बुराई का मार्ग नहीं होता है।

कृपया ध्यान दें कि ये सभी केवल लोककथाएँ और किस्से हैं, जो लोगों के बीच मौजूद हैं, पारंपरिक से संबंधित हैं और वास्तविकता से भिन्न हो सकते हैं। इनके पीछे भावी उत्पत्ति या वैज्ञानिक सत्यता की कोई मान्यता नहीं है।

शीर्षक: हॉथोर्न हाउस में भूतिया



एक बार एक छोटे, भूले हुए शहर के बाहरी इलाके में स्थित, हॉथोर्न हाउस अतीत के लिए एक वसीयतनामा के रूप में खड़ा था। एक उभरती हुई विक्टोरियन हवेली, इसके हॉल रहस्य और अंधेरे में डूबे इतिहास की फुसफुसाहट को दर्शाते हैं। इन वर्षों में, इसके सताए जाने की अनगिनत कहानियाँ शहरवासियों के बीच फैल गईं, जिससे एक भयावह डर पैदा हो गया जिसने उन्हें इसकी खस्ताहाल दीवारों से दूर रखा।

एक दुर्भाग्यपूर्ण शरद ऋतु में, एमिली नाम की एक जिज्ञासु युवती शहर में आई। हॉथोर्न हाउस से जुड़ी कहानियों से आकर्षित होकर, वह इसके रहस्यों की खोज के आकर्षण का विरोध नहीं कर सकी। एक टॉर्च और अपनी साहसिक भावना से लैस, वह चांदनी रात में परित्यक्त हवेली की ओर बढ़ी।

जैसे ही एमिली हवेली के पास पहुंची, हवा बर्फीली हो गई और एक भयानक हवा के झोंके से पेड़ों में सरसराहट होने लगी। जैसे ही उसने चरमराते दरवाज़ों को धक्का देकर खोला और ऊंचे बगीचे में कदम रखा, उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। घर उसके सामने एक भूत की तरह मंडरा रहा था, इसकी खिड़कियाँ अँधेरी और पूर्वसूचक थीं।

प्रत्येक सतर्क कदम के साथ, एमिली के दिमाग में भूतिया आभास और गूँजती चीखों की छवियाँ उभरने लगीं। उसके डर के बावजूद, एक अज्ञात शक्ति ने उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। वह टूटी हुई पत्थर की सीढ़ियों पर चढ़ गई, और भव्य प्रवेश द्वार जोर से खुला, उसे अंदर आने का इशारा किया।

हवेली का आंतरिक भाग धूल भरे गलियारों और भूले हुए कमरों की भूलभुलैया था। एमिली की टॉर्च ने फीके वॉलपेपर पर भयानक छाया डाली, जिससे विचित्र आकृतियों में जान आ गई जो मंद रोशनी में नाचती हुई प्रतीत हो रही थीं। उसके वजन के कारण फर्श की तख्तियां चरमराने लगीं, जिससे माहौल और तनावपूर्ण हो गया।

जैसे ही उसने आगे खोजबीन की, उसकी नज़र एक पुरानी डायरी पर पड़ी, जिसके पन्ने उम्र के साथ पीले हो गए थे। डायरी हवेली की आखिरी निवासी अमेलिया हॉथोर्न की थी। उनके लेखन में एक पीड़ादायक जीवन और एक दुखद प्रेम संबंध के बारे में बताया गया जिसका अंत विश्वासघात में हुआ। ऐसा लग रहा था कि अमेलिया की पीड़ा दीवारों के भीतर बनी हुई है, और एमिली उसकी उपस्थिति को लगभग महसूस कर सकती थी।

जैसे-जैसे एमिली हवेली के रहस्यों में गहराई से उतरती गई, समय ने अपना अर्थ खो दिया। अनदेखे हाथ उसकी त्वचा से टकराए, और हॉल में हल्की-हल्की फुसफुसाहटें गूँज उठीं। फिर भी, वह निश्चिन्त थी, सत्य को उजागर करने की अतृप्त जिज्ञासा से प्रेरित थी।

घर के सबसे अंधेरे कोने में, एमिली को दशकों से दुनिया से बंद एक छिपा हुआ कक्ष मिला। अंदर, उसे बेहद जीवंत चित्रों का एक संग्रह मिला। प्रजा की निगाहें उसका पीछा कर रही थीं, उनकी निगाहें पीड़ा और निराशा से भरी थीं। कमरे के केंद्र में एक आदमी का आदमकद चित्र था - अमेलिया का खोया हुआ प्यार।

अचानक, पेंटिंग्स जीवंत हो उठीं, उनके वर्णक्रमीय रूप उनके फ्रेम से बाहर निकल रहे थे। एमिली हांफने लगी जब उसने खुद को भूतिया दर्शकों से घिरा हुआ पाया। वे अतीत की पीड़ित आत्माएं थीं, जो अपने साथ हुए अन्याय का प्रतिशोध चाह रही थीं।

घूमते भूतों के बीच अमेलिया की आकृति उभरी। उसने एमिली को खोखली आँखों से देखा और अपनी शाश्वत पीड़ा से मुक्ति की गुहार लगाई। एमिली का दिल हवेली की प्रेतवाधित दीवारों के भीतर फंसी आत्माओं के लिए टूट गया, जो एक दुखद भाग्य का शिकार थीं जिसने उन्हें जीवित रहने के दायरे में कैद कर रखा था।

प्रताड़ित आत्माओं को शांति दिलाने के लिए दृढ़ संकल्पित एमिली ने हॉथोर्न हाउस के काले इतिहास की पहेली को जोड़ना शुरू किया। उसने पीढ़ियों तक फैले धोखे, विश्वासघात और प्रतिशोध के जाल का पर्दाफाश किया। हवेली खोए हुए और प्रतिशोधी लोगों के लिए एक प्रकाशस्तंभ बन गई थी, जो उन्हें अपने द्वेषपूर्ण आलिंगन में खींच रही थी।

साहस और दृढ़ विश्वास के साथ, एमिली ने पीड़ा के चक्र को तोड़ने की कसम खाई। उसने चीजों को सही करने की उम्मीद में, हवेली की दुखद कहानी में शामिल लोगों के वंशजों की तलाश की। जैसे-जैसे उसने सच्चाई को उजागर किया, भयावह अभिव्यक्तियाँ तेज हो गईं, जो उसके संकल्प की परीक्षा ले रही थीं।

जैसे-जैसे दिन रात में बदलते गए, एमिली का विवेक खतरे में पड़ गया। आत्माओं ने उसे ताना मारा, अपनी कड़वाहट और क्रोध से उसे भस्म करने की कोशिश की। लेकिन वह आगे बढ़ती रही, यह जानते हुए कि उसका मिशन मुक्ति और मोक्ष में से एक था।

ऑल हैलोज़ ईव पर आधी रात के समय, एमिली ने अंततः उस दुष्ट शक्ति का सामना किया जिसने आत्माओं को हवेली से बांध दिया था। एक भयानक संघर्ष में, उसे अंधेरे के अवतार का सामना करना पड़ा - उस आदमी की आत्मा जिसने इतने साल पहले अमेलिया को धोखा दिया था।

इच्छाओं की लड़ाई में, एमिली ने प्रेम और क्षमा के साथ द्वेषपूर्ण आत्मा का सामना किया, और उस अभिशाप को तोड़ दिया जिसने उसे और दूसरों को हवेली से बांध दिया था। जैसे ही भोर की रोशनी टूटी खिड़कियों से छनकर आई, आत्माओं को शांति मिली और वे दूर चली गईं, और हॉथोर्न हाउस में एक बार फिर सन्नाटा छा गया।

एमिली प्रेतवाधित हवेली से निकली, अपने अनुभव से हमेशा के लिए बदल गयी। हॉथोर्न हाउस के प्रति शहर का डर धीरे-धीरे कम हो गया क्योंकि कहानियाँ आतंक की कहानियों से मुक्ति और आशा की कहानियों में बदल गईं। और यद्यपि हवेली अतीत का अवशेष बनी रही, इसके भयावह दिन खत्म हो गए थे।

लेकिन कहीं न कहीं, उन भयानक रातों से गुजरे लोगों की दूर की यादों में, अंधेरे का सामना करने की हिम्मत करने वाली बहादुर आत्मा एमिली की कहानी जीवित रहेगी - एक अनुस्मारक कि सबसे भयावह स्थानों में भी, प्रकाश और करुणा हो सकती है अतीत की छाया पर विजय.

क्या सरीर कि तलाश में वो साया भटक रहा है

  


हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां हर मोड़ पर इंसानों के भीतर डर और सिहरन पैदा करने के लिए आत्माएं और अन्य शैतानी ताकतें अपना रौब दिखाती रहती हैं. अब आप भले ही इस तथ्य पर यकीन ना करें लेकिन आपकी हर हरकत, हर कदम पर बुरी व अच्छी आत्माओं की नजर रहती है. यह आत्माएं आपको एक पल के लिए भी तन्हा नहीं छोड़तीं, हां कई बार भीड़भाड़ से बचते हुए वह आपको अकेलेपन में ही अपने होने का एहसास करवाती हैं. ऐसी ही एक घटना से हम आज आपको रुबरू करवाने जा रहे हैं जो कोई कहानी नहीं बल्कि एक आम इंसान के साथ घटित एक खौफनाक घटना है.


आज से कुछ 5-10 साल पुरानी है. अशोक नाम का एक व्यक्ति जिसका गांव पूर्वी उत्तर-प्रदेश के एक कस्बाई इलाके में था. वैसे तो वो दिल्ली में नौकरी करता था लेकिन घर आए हुए काफी समय बीत चुका था इसीलिए छुट्टी लेकर वह घर आया हुआ था. यह इलाका बेहद सुनसान और घनी झाड़ियों के बीच बसा हुआ था और इन घनी झाड़ियों की बीच शाम के समय अकसर सन्नाटा ही पसरा रहता था. अशोक को बचपन से ही छत पर सोने की आदत थी और बड़े होने के बाद जब भी वह गांव जाता तो अपने घर की खुली छत पर ही सोता था. लेकिन एक रात छत पर सोना ही उसके लिए महंगा साबित हुआ क्योंकि यह वो रात थी जब उसका सामना एक ऐसे साये से हुआ जो नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से उसके पास तो आया लेकिन अशोक की सूझबूझ की वजह से वह उसका बाल भी बांका नहीं कर सका.

रात का करीब एक बजा था कि अचानक किसी आवाज ने अशोक की नींद खोल दी. वह अपनी चारपाई से उठ कर छत की रेलिंग के पास जाकर आसपास देखने लगा. उसे अपने घर से थोड़ी ही दूर पर किसी साये को इधर-उधर घूमते हुए देखा, छोटा सा कस्बाई इलाका था उसे लगा शायद कोई अपने घर से बाहर आया होगा. वह वापिस जाकर चारपाई पर लेट गया. उसे फिर कुछ आवाज सुनाई दी लेकिन इस बार आवाज थोड़ी ज्यादा पास से आ रही थी.
वह फिर उठा और छत से नीचे देखने लगा. उसे अपने घर के पास ही एक साया दिखाई दिया लेकिन खौफनाक बात यह थी कि वह सिर्फ साया था उसका शरीर नहीं था. इतने में उसे सीढ़ियों पर किसी के बहुत ही तेजी के साथ चढ़ने की आवाज सुनाई दी. 1 मिनट से भी कम समय में वह साया उसकी नजरों के सामने खड़ा था. उसकी शक्ल, हाथ-पैर कुछ भी नहीं था, अगर कुछ था तो वह सिर्फ एक सफेद साया जो धीरे-धीरे अशोक की तरफ बढ़ता जा रहा था.

कहते हैं बुराई को काटने के लिए अच्छाई का ही सहारा लिया जाता है इसीलिए उस साये से खुद को बचाने के लिए उस समय अशोक ने कवच कीलक अर्गला मंत्र का जाप करना शुरू कर दिया. वह लगातार 5 मिनट तक यह जाप करता रहा और वह साया उनके पास आता रहा. अचानक ही वह साया अंतरध्यान हो गया. वह हवा था और एक दम से हवा में बहकर गायब हो गया. वह कहां गया, कहां से आया था कुछ पता नहीं चला लेकिन कुछ समय जब तक वह साया अशोक के सामने रहा उन चंद लम्हों ने अशोक के हाथ-पांव फुला दिए थे.

पाकिस्तान के कुछ प्रेतबाधित संस्थान

 पाकिस्तान में इस्लामाबाद से 296 किमी और मिंवाली से 50 किमी की दूरी पर स्थित कलाबाघ बाँध और नमक की मिल को पाकिस्तान के सर्वाधिक प्रेतबाधित स्थानों में माना जाता है | यहा के लोगो का मानना है


कि यहाँ मोटे शरीर वाली, नाटी और लम्बे बालो वाली एक महिला वहा से गुजरने वाले लोगो पर हमला कर देती है


इसी तरह कराची के 39 ब्लाक में रात को 3 बजे के करीब सफ़ेद साड़ी पहने औरत एक मिनट के लिए दिखती है और फिर गायब हो जाती है ऐसा माना जाता है इसी समय पर उस औरत को अगुआ कर क़त्ल कर दिया गया था | कराची के ही लिआरी में भी इसी तरह एक आदमी को जख्मी देखा जाता है जो वहा पहुचते ही गायब हो जाता है

लाहौर में भी डिफेन्स ब्लाक में सफ़ेद साड़ी में लडकी की आत्मा को देखा जाता है और कुछ लोग मानते है कि वह के z ब्लाक में कुछ घर प्रेतबाधित है कई लोगो ने वहा रहने की कोशिश की लेकिन वहा होने वाली परनोर्मल एक्टिविटी से सभी लोगो ने उस जगह को खाली कर दिया

मिलिए कावेरी भुत ओर उसके परिवार से

 


1930 की बात है। एक शाम तीन बजे हम मानकुलम विश्राम घर पहुंचे। मेरे साथ जाफना केन्‍द्रीय कालेज के मेरे अध्‍यापक साथी एस0 जी0 मान और सैमुअल जैकब थे। हमारी योजना जंगल में शिकार करने की थी। हमारे गाइड चिनइया हमें जंगल के बारे में ता रहा था। चिनइया के अनुसार जंगल का ऐसा सबसे अच्‍छा स्‍थान जंगल के बीच पानी का एक छोटा तालाब था, जोकि नानकुलम से तीन मील दूर स्थित उलूमादू नाम की 'जंगली बस्‍ती' से लगभग एक मील की दूरी पर था।

लेकिन जब वहां जाने की बात आई, तो चिनइया बोला, ''हम वहां नहीं जा सके। चाहे यह सच है कि वहां बहुत से जानवर हैं, लेकिन हम उनमें से एक को भी नहीं मार सकते क्‍योंकि उस स्‍थान की रक्षा 'कादेरी' नाम का भूत कर रहा है। जो भी व्‍यक्ति उस स्‍थान का उल्‍लंघन करता है, उसकी मृत्‍यु हो जाती है।'' चिनईया उस वक्‍त अपनी रौ में था। वह बोलता जा रहा था, ''पीपल के दो वृक्ष कादरी और उसकी पत्‍नी का निवास स्‍थान हैं। उनके बच्‍चे भी पास के वृक्षों पर रहते हैं।'' 


काफी मनाने के बाद चिनइया हमें वह जगह दूर से दिखाने के लिए राजी हो गया। लेकिन इसके लिए उसने दो शर्ते रखीं। पहली यह कि हम बंदूकें लेकर वहां नहीं जाएंगे, दूसरी यह कि वहां जाने से पहले हम लोगों को एक टोटका करना होगा। हमारे पास भूतों के परिवार को देखने के लिए और उसका कहना मानना ही पड़ा। 

हम लोख खाने खाने के पश्‍चात रात्रि में 9 बजे चल पड़े। चिनइया ने अपने हाथों से हमारी कलाइयों पर हल्‍दी के पत्‍ते बांधे। जंगल में दाखिल होने से पहले उसने एक बार फिर  देखा कि हल्‍दी के पत्‍ते कलाईयों पर मौजूद हैं या नहीं। 

अंधेरे सुनसान और जोकों से भरे हुए जंगल में से एक मील पैदल चलने के बाद हम खुले स्‍थान पर पहुंचे। हमें वहां ठहरने के लिए और लपटें छोड़ रहे उन वृक्षों की ओर देखने के लिए कहा गया, जोकि सौ गज की दूरी पर चमक रहे थे। 


चिनईया ने जो कुछ कहा था, वह बिलकुल ठीक था। वहां लगभग तीस वृक्ष थे, जिनके तने चिंगारियों की तरह चमक रहे थे। मैंने दुरबीन से देखा और जो कुछ मैंने देखा वह इतना सुंदर नजारा था, जिसको मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकता। सभी वृक्षों में से दो वृक्ष इतने चमकदार थे कि उनकी बिना पत्‍तों वाली टहनियां भी साफ देखी जा सकती थीं। चिनइया ने बताया कि वे ही दो वृक्ष हैं जिनके ऊपर कादेरी भूत का डेरा है। जैसे-जैसे वर्ष बीत रहे हैं, उनके बच्‍चे और बढ़ रहे हैं। वह दिन के समय भी किसी को उन वृक्षों को पास नहीं जाने देते।


मैं पास जाकर साफ और असली नजारा देखना चाहता था परंतु चिनइया और मेरे साथियों ने एक कदम भी आगे नहीं जाने दिया। हम वापिस चल पड़े। लेकिन मन ही मन मैंने निश्‍चय कर लिया था कि मैं दिन में आकर भूतों के इन परिवारों से भेंट अवश्‍य करूंगा। 

सुबह मैं अपने साथियों के विरोध के बावजूद उस जगह पर जा पहुंचा। वहां दो पुराने वृक्ष थे, जिनमें से एक पूरी तरह और दूसरे का कुछ भाग सूखा हुआ था। दक्षिण की ओर बहुत से वृक्ष सूखे हुए थे। परंतु दोनों सूखे वृक्षों में पीला रंग इनसे भी ज्‍यादा था। मैंने चाकू की सहायता से वृक्ष का कुछ छिलका और लकड़ी काट ली और रेस्‍ट हाउस वापस आ गया। 

अगले दिन उस लकड़ी और छिलके को मैं जाफना कालेज की वनस्‍पति विज्ञान की प्रयोगशाला में ले गया। सूक्ष्‍मदर्शी द्वारा देखने से मैंने पता लगाया कि पीपल के छिलके पर पीला रंग एक विशेष प्रकार की फंगस के कारण पैदा होने लगा था। यह किसी भी प्रकार से कोई अजीब बात नहीं थी, क्‍योंकि संसार में बहुत से ऐसे वृक्ष हैं, जिनके ऊपर फंगस पैदा होने के कारण प्रकाश पैदा होता है। छिलके की बाहरी सतह फंगस के पैदा होने के लिए बहुत ही उपयुक्‍त स्‍थान होता है। 

प्रत्‍येक किस्‍म की फंगस में से रोशनी उत्‍पन्‍न नहीं होती। रोशनी पैदा करने वाली विशेष किस्‍में चाहे प्रयोगशाला में हो, चाहे किसी वृक्ष पर, वे रात को रोशनी पैदा करती हैं इसका कादेरी या किसी और भूत-प्रेत के साथ कोई सम्‍बंध नहीं होता। 


इस फंगस की तरह ऐसे बहुत से वृक्ष और जानवर हैं जो रात के समय रोशनी देते हैं। इनको प्रकाश उत्‍पन्‍न करने वाले जीव और वृक्ष अधिकतर समुद्र में ही रहते हैं, इसलिए अधिकतर लोग इनसे अनभिज्ञ हैं। पृथ्‍वी पर रोशनी पैदा करने वाले जीवों में से सबसे आम मिलने वाला जीव जुगनू हैं। कुछ और जीव भी घने जंगलों और अंधेरी गुफाओं में देखे जा सकते हैं। जुगनू एक भंवरा है, कीट नहीं। सिर्फ नर जुगनू ही उड़ सकता है। मादा जुगनू पृथ्‍वी से और वृक्षों से चिपकी रहती है। नर और मादा प्रकाश द्वारा एक दूसरे को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। 

बहुत से बैक्‍टीरिया भी रोशनी देते हैं। गल रहे प्रोटीन जैसे मछली और मांस इत्‍यादि में ऐसे बैक्‍टीरिया उत्‍पन्‍न हो जाते हैं, जो रात के समय प्रकाश पैदा करते हैं। 

न्‍यूजीलैण्‍ड में कुछ गुफाओं के भीतरी भागों में दीवारों के ऊपर इस प्रकार के बैक्‍टीरिया बड़ी मात्रा में पैदा होने के कारण रोशनी उत्‍पन्‍न्‍ हो जाती है, जिसे हम देख सकते हैं। कुछ कीटों के सिरों के ऊपर रोशनी के स्‍थान होते हैं। वे रात के समय जब चलते हैं तो इस तरह दिखाई पड़ते हैं जैसे कारें अपनी लाईटें जला कर धीरे धीरे चल रही हों। 


भू-मध्‍य सागर में एक ऐसा जीव होता है, जिसके रहते हुए हिल रहा पानी ऐसे प्रतीत होता है जैसे चमक रहा हो। इस जीव को नौकटीलिऊका कहते हैं। समुद्रों के तटों पर यह जीव अधिक मात्रा में एकत्र होने के कारण ऐसे दिखाई देता है, जैसे आग लगी हो। जिस प्रकार जंगली लोगों को प्रकाश पैदा करने वाले वृक्षों पर भूत प्रेतों का डेरा दिखाई देता है, ठीक उसी प्रकार ही समुद्री मल्‍लाह और मछुआरे भी पानी में से उत्‍पन्‍न हो रहे प्रकाश का कारण भूत-प्रेतों को ही समझते हैं। 


प्रकाश उत्‍पन्‍न करने वाले जीवों की तरह ही कुछ शंख, घोंघे, सीपी और कौडि़यां इत्‍यादि भी ऐसे होते हैं कि अगर उनको हिलाया जाए तो वे अंधेरे में चमकने लगते हैं। रैफईल डैबोई ने इस रोशनी पैदा करने वाले विषय पर अनुसंधान किया है। उसने प्रमाणित किया है कि यह चमक और रोशनी लुसीफैरीन नाम के पदार्थ के कारण होती है। 

कुछ फंगस और बैक्‍टीरिया तो निरंतर रोशनी पैदा करते रहते हैं। परंतु कुछ जीवों में इसका सम्‍बंध दिमाग से होता है और यह निरंतर रोशनी पैदा नहीं करते। प्रकाश और चमक, ताप की उपज के बगैर ही पैदा होते हैं। चमक के रंग तरह-तरह के और घटने बढने वाले होते हैं। ऐसे प्रकाश का रंग आमतौर पर हरा, नीला, पीला और लाल होता है। गहरे समुद्रों की कुछ मछलियों में चमक को बढ़ाने और कम करने की शक्ति होती है। 

उलूमादू जंगल के पालू वृक्ष जल नहीं रहे थे, ये चमक फंगस के कारण उन वृक्षों से पैदा हो रही थी। शायद, यह चमक पहले सूखे वृक्षों से पैदा हुई होगी और बाद में इन वृक्षों से ये पास वाले वृक्षों पर फैलती चली गयीं। इसी कारण्‍ा गावं वालों ने सोचा कि कादेरी प्रेत के परिवार के सदस्‍यों की गिनती हर वर्ष बढ रही है। 

मनुष्‍य जाति की यह एक मानसिक कमजोरी है कि जिस घटना का कारण नहीं जान सकते, उसे भूत-प्रेतों या किसी और चमत्‍कार से जोड़ देते हैं। इस अंधविश्‍वास के फलस्‍वरूप कई अजीब घटनाओं की मनगढ़ंत कहानियां दूर-दूर तक फैल जाती हैं।

900 साल पुराना एक मन्दिर जहां रात ढलते हर इंसान बन जाता है पत्थर

 


मित्रो आज हम फिर से राजस्थान की एक ओर रहस्यमय जगह में बारे में बताने जा रहे है जिससे लोग आज भी अन्जान है | Roadies XI के एक एपिसोड में हमने इस मंदिर के बारे में सुना तो हमने इस मंदिर के बारे में अलग अलग माध्यमो से गहन अध्यन किया | इस मंदिर के बारे में ऐसा माना जाता है कि शाम ढलते ही इस मंदिर के लोग आस पास भी नहीं भटकते है क्यूंकि स्थानीय लोगो का ऐसा मानना है कि रात ढलते ही जो भी इंसान यहा रुक जाता है वो पत्थर की मूर्त में तब्दील हो जाता है | इस बात में कितनी सच्चाई इसके बारे में स्थानीय लोग या आप खुद जाकर पता लगा सकते है | इस मंदिर के इस रहस्य के बारे में जानने से पहले हम आपको इसका थोडा इसका इतिहास बताते है | किराड़ू मंदिर राजस्थान के बाड़मेर जिले के हाथमा गाँव स्थित है जिसे 11वी शताब्दी में बनाया गया था | यह मंदिर इतना सुंदर बना है कि इतिहासकार इस मंदिर को राजस्थान का खजुराहो कहते है लेकिन 900 वर्ष से वीरान इस मंदिर की तरफ अभी तक इतने लोगो का ध्यान नहीं गया जिसके कारण ये मंदिर गुमनामियो के अंधकार में छिपा हुआ है | इस मंदिर में रही पाच बड़े मंदिरों की श्रुंखला भूकम्प से द्वस्त हो गयी थी | यहा पर दो मंदिर है जिसमे से एक शिव जी और दूसरा विष्णु जी का है | इस मंदिर पर बनी पत्थर की कलाकृतिया आपको प्राचीन समय की याद दिला देती है | तो मित्रो इस मंदिर के इतिहास के बाद इस मंदिर से जुड़े रहस्य से आपको रूबरू करवाते है स्थानीय लोगो के अनुसार आज से 900 साल पहले किराडू में परमार वंश का राज था | उस समय एक दिन एक साधू अपने कुछ शिष्यों के साथ यहा पर रहने को आये | यहा पर कुछ दिन रहने के बाद उन्होंने आगे ओर घुमने का निश्चय किया | एक दिन वो बिना शिष्यों को बताये एक रात यहा से निकल पड़े | उनके जाने के कुछ दिनों बाद वो सारे शिष्य बीमारी से ग्रसित हो गए | गाँव के किसी भी इंसान ने उनकी मदद नहीं की | केवल एक कुम्हारिन ने निस्वार्थ भाव से उनकी सेवा की जिससे उनका स्वास्थ्य ठीक हुआ | साधू घूमते घामते फिर से उसी जगह पहुचे तो उन्होंने अपने शिष्यों की कमजोर हालत को देखकर बहुत गुस्सा आया | उन्होंने गांववालों से कहा कि जिस जगह पर इन्सान के लिए दया नहीं वहा मानवजाति का विनाश है और ये कहकर उन्होंने पुरे गांववालों को पत्थर बनने का श्राप दे दिया | शिष्यों की सेवा करने वाली कुम्हारिन को इससे अछुता रखा और शाम ढलने से पहले बिना पीछे मुड़े गाँव से चले जाने को कहा | लेकिन उस महिला ने गलती से पीछे देख लिया और वो भी पत्थर की मूर्त बन गयी | नजदीक के गाँव में आज भी उस कुम्हारिन की मूर्त आज भी है |इस श्राप के बाद सूर्यास्त के बाद यहा कोई नहीं रुकता और जो रहता है वो पत्थर बन जाता है | हालंकि ASI ने इस जगह को अभी तक कोई प्रमाण देकर सरक्षित नहीं किया हो | इस विज्ञान के युग में आप इन बातो पर कितने प्रतिशत विश्वास करते है हमें ये तो पता नहीं है लेकिन प्राचीन समय में रहस्यमयी साधुओ द्वारा दिए श्रापो से भगवान भी अछूते नहीं रहे तो इन्सान की क्या मजाल है | इसलिए प्राचीन समय में लोग हमेशा साधू महात्माओ को खुश रखने की कोशिश करते थे | लेकिन वर्तमान में ना साधुओ का अस्तित्व है और ना ही इतनी आस्था शेष रही | बच गए बस ये खंडहर जो उनकी कहानी बयाँ करते है |

आत्मा का मार्ग

 आत्मा की यात्रा का मार्ग पुराणों में आत्मा की यात्रा के तीन मार्ग माने गए हैं। जब भी कोई मनुष्य मरता है और आत्मा शरीर को त्याग कर उत्तर कार्यों के बाद यात्रा प्रारंभ करती है तो उसे तीन मार्ग मिलते हैं।


उसके कर्मों के अनुसार उसे कोई एक मार्ग यात्रा के लिए दिया जाता है।


ये तीन मार्ग है अर्चि मार्ग, धूम मार्ग और उत्पत्ति-विनाश मार्ग। अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और

देवलोक की यात्रा के लिए है। धूममार्ग पितृलोक की यात्रा के लिए है और उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है।

घुटन

 ये बात काफी पुरानी है शायद १९९१ से १९९२ के लगभग की घटना है, हमारे पड़ोस में एक किरायेदार रहा करते थे, उनकी सर्विस टू व्हीलर कंपनी में एक मैकेनिक की थी उनकी प्रवृति नास्तिक थी, और उनकी पत्नी और बच्चे काफी धार्मिक थे उनके बीच में हमेशा इसी बात को लेकर झगड़ा होता था कि जब भी कोंई धार्मिक समारोह होता जैसे कोंई साधू संत का प्रवचन होना हो या कोंई झांकी को, या फिर पड़ोस में किसी के भी यहाँ भजन मंडली का कार्यक्रम हो तो उनकी पत्नी किसी भी समारोह में पुण्य कमाने का अवसर नहीं खोना चाहती थी इसीलिए वो जब भी किसी का बुलावा आता या कोंई ऊँचे साधु -संतो का प्रवचन होता वो तुरंत वहाँ जाने के लिए तैयार हो जाती थी यही बात उनके पति को अच्छी नहीं लगती थी, क्योंकि उनके इस तरह के बुलावो में जाने से उनके दैनिक कार्यो में व्यवधान पड़ता था | 

मित्रो बात भी सही थी क्योंकि पहली जिम्मेदारी हमारे घर की होती है बाद में अन्य कार्यों कि ,लेकिन दोस्तों उनके पति हमेशा से नास्तिक नहीं थे, क्योंकि जब भी वो किसी देव स्थान से गुजरते अपना सिर जरूर झुकाते थे इसी से हमने ये बात नोटिस कर ली ये अन्दर से धार्मिक तो जरुर है ,लेकिन इनके नास्तिक होने का काफी श्रेय इनकी पत्नी को जाता है , क्योंकि इंसान के कर्म और भाग्य दोनों एक साथ चलते है,आप चाहे कितनी भी अच्छी क़िस्मत लिखा के क्यों न लाये हो फल तो कर्म के अनुसार ही मिलेगा…  

इनकी पत्नी को घर के मकान की बहुत लालसा रहती थी,और भाग्य ने साथ दिया तो उनके ,होम लोन की दिक्कते दूर हो गई, और उन्होंने अच्छा सा मकान खरीद लिया| दोस्तों , अब यहाँ से बात शुरू होती है ,उनकी पत्नी के कारण उन अंकल को पूजा,पाठ, और हवन शांति, गृह प्रवेश को बिलकुल सिरे से नकार दिया और घर मे शिफ्ट हो गए, उस घर में जाते ही सबसे पहले तो उन अंकल को भगवान की तस्वीरे लगाते ही ,किल से गहरा जख्म हो गया और खून की धार जमीन पर गिर गई , उनको सात टाँके आये , घर में शिफ्ट होने के बाद वो कुछ समय के लिए कही बाहर चले गए , वापस आये तो उनके साथ अजीब -२ बाते होने लगी , उनको रात में कभी-२ ऐसा महसूस होता की कोंई उनके पास से होकर सिडियो की तरफ जा रहा है , तो कभी-२ उनकों नींद में ऐसा लगता की किसी की आने की झपकी पड़ी हो| 

अब इस तरह उनको २-३ महीने हो गए , फिर एक दिन और एक बात हुई उन अंकल की तबीयत खराब हो गयी सब जांचेहो गई लेकिन कोंई समस्या नहीं आई , लेकिन वो अंकल अपनी पत्नी से कहते की मुझे बहुत घुटन महसूस हो रही है, और मन भी खराब हो रहा है , वो अपनी पत्नी से बोलते पता नहीं मुझे बार -२ ऐसा लग रहा है की बहुत जी भरकर ,रोऊ……….. दोस्तों यहाँ आपको ऐसा लग रहा होगा ये क्या बात हुई कोंई अपने आप क्यों रोयेगा,, लेकिन दोस्तों जो मैंने सुना वही बता रहा हूँ ,, आगे चलते है दोस्तों… उसके बाद वो अपनी पत्नी से बोले की पता नहीं पर मुझे लग रहा है की मैं अनाथ हो गया हूँ और सब मुझे छोड़कर चले गए… इसलिए मुझे रोने की इच्छा हो रही है उनकी पत्नी बोली ये क्या बोल रहे हो कहाँ सब चले गए ऐसी बाते क्यों कर रहे हो , 

दोस्तों , समय निकलता रहा , धीरे-धीरे परिवार में सभी सदस्य उदास-२ से और चुप रहने लगे कोंई किसी से ज्यादा बात नहीं करता था , उनके घर पर कोंई भी उनसे मिलने के लिए जाता तो यही कहता उनके यहाँ तो जाते ही ऐसा महसूस होता है जैसे कोंई मर गया हो और उसको जलाने कि तैयारी में गए हो, 

और घुटन सी भी और रोने जैसी हालत हो जाती है , इसलिए हम तो वहाँ ज्यादा नहीं जाते है आजकल….. दोस्तों हम, कहते हैं न की अच्छे कर्मो का फल हमेशा मिलता है हम तो शायद ये उनकी पत्नी के अच्छे कर्मो का ही फल मानते है की एक दिन एक सारंगी बजाने वाला जिसको हम लोग (कमली) भी कहते है उधर से गुजर रहा था, तो उनके बच्चे बाहर ही बैठे थे , अचानक वो दरवाजे के पास आकर रुका और बच्चे को थोड़ी देर देखने के बाद कहा बेटा तुम्हारी मम्मी को बुलाओ , बच्चा अन्दर जाकर बोला मम्मी कोंई मांगने वाला आया है आपको बुलाने के लिए कह रहा है….

उस बच्चे की मम्मी को देखकर सारंगी वाला बोला , बेटा तुम्हारे बच्चे का ध्यान रखना ,इसके साथ कोंई दुर्घटना होने वाली है, वो बोली क्या दुर्घटना वाली है,,वो बोला तुम उसे रोक नहीं सकते जो होना वो तो होकर रहेगा हम उसे नहीं रोक सकते है , पर जितना जल्दी हो सके इस मकान को छोड़ दो…. या फिर इस घर में गायत्री पाठ और दुर्गा सप्तशती का ९ दिन तक अखंड पाठ करा लेना नहीं तो तुम यहाँ चैन से नहीं रह पाओगे और कुछ भी हो सकता है , वो सारंगी वाला चला गया,, उसके थोड़ी देर बाद बच्चे की माँ ने उसे किराने की दुकान से कुछ लाने के लिए भेजा, जो रोड के उस पार थी तो वो बच्चा जब सामान लेकर आ रहा था तो उसको किसी स्कूटर वाले ने टक्कर लगा दी ,

इतिफाक से बच्चे को भी सात टाँके आये| अब जब से वो सारंगी वाला बोल कर गया तब से वो घर में दहशत सी फ़ैल गई, फिर उन आंटी ने वहाँ गायत्री पाठ और सप्तशती चंडी का पाठ कराने की सोच ली लेकिन जब भी इसका नाम लेते तो उनके पति फिर से इन सभी चीजों को नकारते रहते , उनकी पत्नी की स्तिथि ऐसी हो गई जैसे एक तरफ कुंवा एक तरफ खाई और बीच में शेर……. एक तरह से देखा जाए तो जब भी इस घर के शुद्धिकरण की बात आती तो हमेशा नकारात्मक सोच ही उभर के आती थी, 

एक दिन उन अंकल के कोंई रिश्तेदार वह मिलने आये जो भजन किर्तन में व्यस्त रहते थे, उन्होंने भी जब वो जाने लगे तो वो बोले तुम ये मकान जल्दी से छोड़ दो नहीं तो कुछ भी हो सकता है मुझे यहाँ कुछ अच्छा नहीं लग रहा है…. फिर काफी जनों की राय लेने के बाद उनको वो घर छोड़ना ही पड़ा ,, फिर कुछ महीनों बाद वो आंटी एक बुजूर्ग महिला से बाते कर रही थी तो बातों-बातों में उस मकान की जिक्र चला तो उन बुजूर्ग महिला ने बताया की यहाँ पर एक लड़की छत से गिर गई थी,, और जब दूसरा परिवार जब रहने आया तो एक दिन घर में करंट फैलने से साथ ,सात लोग एक साथ मर गए थे… 

ये घटना उन बुजुर्ग महिला के शादी के समय के आस-पास की घटना थी…….. तो दोस्तों इस पूरे घटनाक्रम में सात के आंकड़े का माजरा समझ के भी नहीं समझ नही आया ,, लेकिन इस किस्से में एक बात तो सही है की बिना मुहूर्त और पूजा-पाठ के कोंई महत्वपूर्ण काम करने से क्या-२ अनहोनी हो सकती है………


आख़िर कौन था वह??

 आधुनिक समय में भूत-प्रेत अंधविश्वास के प्रतीक के रूप में देखे जाते हैं पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो भूत-प्रेतों के अस्तित्व को नकार नहीं सकते। कुछ लोग (पढ़े-लिखे) जिन्हें भूत-प्रेत पर पूरा विश्वास होता है वे भी इन आत्माओं के अस्तित्व को नकार जाते हैं क्योंकि उनको पता है कि अगर वे किसी से इन बातों का जिक्र किए तो सामने वाला भी (चाहें भले इन बातों को मानता हो पर वह) यही बोलेगा, "पढ़े-लिखे होने के बाद भी, आप ये कैसी बातें कर रहे हैं?" और इस प्रश्न का उत्तर देने और लोगों के सामने अपने को गँवारू समझे जाने से बचने के लिए लोग इन बातों का जिक्र करने से बचते हैं।

मैं आज यहाँ दो वृत्तांत का वर्णन करूँगा जिसको सुनने-पढ़ने के बाद आपको क्या लगता है अवश्य बताएं। खैर मैं भी तो भूत-प्रेत को नहीं मानता पर कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं कि भूत-प्रेत के अस्तित्व को नकारना बनावटी लगता है।
बात कोई 15-16 साल पहले की है। मैं जिस जगह पर काम करता था वहीं पास में एक फ्लैट किराए पर लिया था। इस फ्लैट में मैं अकेले रहता था हाँ पर कभी-कभी कोई मित्र-संबंधी आदि भी आते रहते थे। इस फ्लैट में एक बड़ा-सा हाल था और इसी हाल से संबंध एक बाथरूम और रसोईघर। एक छोटे से परिवार के लिए यह फ्लैट बहुत ही अच्छा था और सबसे खास बात इस फ्लैट कि यह थी कि यह पूरी तरह से खुला-खुला था। मैं आपको बता दूँ कि इस फ्लैट का हाल बहुत बड़ा था और इसके पिछले छोर पर सीसे जड़ित दरवाजे लगे थे जिसे आप आसानी से खोल सकते थे। पर मैं इस हाल के पिछले भाग को बहुत कम ही खोलता था क्योंकि कभी-कभी भूलबस अगर यह खुला रह गया तो बंदर आदि आसानी से घर में आ जाते थे और बहुत सारा सामान इधर-उधर कर देते है। आप सोच रहे होंगे कि बंदर आदि कहाँ से आते होंगे तो मैं आप लोगों को बताना भूल गया कि यह हमारी बिल्डिंग एकदम से एक सुनसान किनारे पर थी और इसके अगल-बगल में बहुत सारे पेड़-पौधे, जंगली झाड़ियाँ आदि थीं। अपने फ्लैट में से नीचे झाँकने पर साँप आदि जानवरों के दर्शन आम बात थी।

एक दिन साम के समय मेरे गाँव का ही एक लड़का जो उसी शहर में किसी दूसरी कंपनी में काम करता था, मुझसे मिलने आया। मैंने उससे कहा कि आज तुम यहीं रूक जाओ और सुबह यहीं से ड्यूटी चले जाना। पर वह बोला कि मेरी ड्यूटी सुबह 7 बजे से होती है इसलिए मुझे 5 बजे जगना पड़ेगा और आप तो 7-8 बजे तक सोए रहते हैं तो कहीं मैं भी सोया रह गया तो मेरी ड्यूटी नहीं हो पाएगी। इस पर मैंने कहा कि कोई बात नहीं। एक काम करते हैं, चार बजे सुबह का एलार्म लगा देते हैं और तूँ जल्दी से जगकर अपने लिए टिफिन भी बना लेना पर हाँ एक काम करना मुझे मत जगाना। इसके बाद वह रहने को तैयार हो गया।
रात को खा-पीकर लगभग 11.30 तक हम लोग सो गए। हम दोनों हाल में ही सोए थे। मैं खाट पर सोया था और वह लड़का लगभग मेरे से 2 मीटर की दूरी पर चट्टाई बिछाकर नीचे ही सोया था। एक बात और रात को सोते समय भी मैं हाल में जीरो वाट का बल्ल जलाकर रखता था।
अचानक लगभग रात के दो बजे मेरी नींद खुली। यहाँ मैं आप लोगों को बता दूँ कि वास्तव में मेरी नींद खुल गयी थी पर मैं लेटे-लेटे ही मेरी नजर किचन के दरवाजे की ओर चली गई, मैं क्या देखता हूँ कि एक व्यक्ति किचन का दरवाजा खोलकर अंदर गया और मैं कुछ बोलूँ उससे पहले ही फिर से किचन का दरवाजा धीरे-धीरे बंद हो गया। मुझे इसमें कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि मुझे पता था कि गाँववाला लड़का ड्यूटी के लिए लेट न हो इस चक्कर में जल्दी जग गया होगा। बिना गाँववाले बच्चे की ओर देखे ही ये सब बातें मेरे दिमाग में उठ रही थीं। पर अरे यह क्या फिर से अचानक किचन का दरवाजा खुला और उसमें से एक आदमी निकलकर बाथरूम में घुसा और फिर से बाथरूम का दरवाजा बंद हो गया। अब तो मुझे थोड़ा गुस्सा भी आया और चूँकि वह गाँव का लड़का रिश्ते में मेरा लड़का लगता है इसलिए मैंने घड़ी देखी और उसके बिस्तर की ओर देखकर गाली देते हुए बोला कि बेटे अभी तो 3 भी नहीं बजा है और तूँ जगकर खटर-पटर शुरू कर दिया। अरे यह क्या इतना कहते ही अचानक मेरे दिमाग में यह बात आई कि मैं इसे क्यों बोल रहा हूँ यह तो सोया है।
अब तो मैं फटाक से खाट से उठा और दौड़कर उस बच्चे को जगाया, वह आँख मलते हुए उठा पर मैं उसको कुछ बताए बिना सिर्फ इतना ही पूछा कि क्या तूँ 2-3 मिनट पहले जगा था तो वह बोला नहीं तो और वह फिर से सो गया। अब मेरे समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था, मैंने हाल में लगे ट्यूब को भी जला दिया था अब पूरे हाल में पूरा प्रकाश था और मेरी नजरें अब कभी बाथरूम के दरवाजे पर तो कभी किचन के दरवाजे पर थीं पर किचन और बाथरूम के दरवाजे अब पूरी तरह से बंद थे अब मैं हिम्मत करके उठा और धीरे से जाकर बाथरूम का दरवाजा खोला। बाथरूम छोटा था और उसमें कोई नहीं दिखा इसके बाद मैं किचन का दरवाजा खोला और उसमें भी लगे बल्ब को जला दिया पर वहाँ भी कोई नहीं था अब मैं क्या करूँ। नींद भी एकदम से उड़ चुकी थी।

इस घटना का जिक्र मैंने किसी से नहीं किया। मुझे लगा यह मेरा वहम था और अगर किसी को बताऊँगा तो कोई मेरे रूम में भी शायद आने में डरने लगे।

सुबह-सुबह जब मैं अपने रूम पर पहुँचा तो वे दोनों लोग तैयार होकर बैठे थे और मेरा ही इंतजार कर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि वे बहुत ही डरे हुए और उदास हों। मेरे आते ही वे लोग बोल पड़े कि अब हम लोग जा रहें हैं। मैंने उन लोगों से पूछा कि फ्लाइट तो कल है तो आज की रात आप लोग कहाँ ठहरेंगे। उनमें से एक ने बोला रोड पर सो लेंगे पर इस कमरे में नहीं। अरे अब अचानक मुझे 1 महीना पहले घटित घटना याद आ गई। मैंने सोचा तो क्या इन लोगों ने भी इस फ्लैट में किसी अजनबी (आत्मा) को देखा?

मैंने उन लोगों से पूछा कि आखिर बात क्या हुई तो उनमें से एक ने कहा कि रात को कोई व्यक्ति आकर मुझे जगाया और बोला कि कंपनी में चलते हैं। मेरा पर्स वहीं छूट गया है। फिर मैं थोड़ा डर गया और इसको भी जगा दिया। इसने भी उस व्यक्ति को देखा वह देखने में एकदम सीधा-साधा लग रहा था और शालीन भी। हम लोग एकदम डर गए थे क्योंकि हमें वह व्यक्ति इसके बाद किचन में जाता हुआ दिखाई दिया था और उसके बाद फिर कभी किचन से बाहर नहीं निकला और हमलोगों का डर के मारे बुरा हाल था। हमलोग रातभर बैठकर हनुमान का नाम जपते रहे और उस किचन के दरवाजे की ओर टकटकी लगाकर देखते रहे पर सुबह हो गई है और वह आदमी अभी तक किचन से बाहर नहीं निकला है।
अब तो मैं भी थोड़ा डर गया और उन दोनों को साथ लेकर तेजी से किचन का दरवाजा खोला पर किचन में तो कोई नहीं था। हाँ पर किचन में गौर से छानबीन करने के बाद हमने पाया कि कुछ तो गड़बड़ है। जी हाँ.... दरअसल फ्रिज खोलने के बाद हमने देखा कि फ्रीज में लगभग जो 1 किलो टमाटर रखे हुए थे वे गायब थे और टमाटर के कुछ बीज, रस आदि वहीं नीचे गिरे हुए थे और इसके साथ ही किचन में एक अजीब गंध फैली हुई थी।

खैर पता नहीं यह हम लोगों को वहम था या वास्तव में कोई आत्मा हमारे रूम में आई थी। मैंने इससे छुटकारा पाने के लिए उस फ्लैट को ही चेंज कर दिया और दूसरे बिल्डिंग में आकर रहने लगे।

बुरी आत्मा का सामना किससे होता है

 जो लोग पापी और अधर्मी हैं जिन्होंने जीवनभर शराब, मांस और स्त्रीगमन के अलावा कुछ नहीं किया, जिन्होंने धर्म का अपमान ‍किया और जिन्होंने कभी भी धर्म के लिए पुण्य का कोई कार्य नहीं किया वे मरने के बाद स्वत: ही दक्षिण दिशा की ओर खींच लिए जाते हैं। ऐसे पापियों को सबसे पहले तप्त लौहद्वार तथा पूय, शोणित एवं क्रूर पशुओं से पूर्ण वैतरणी नदी पार करना होती है। 

नदी पार करने के बाद दक्षिण द्वार से भीतर आने पर वे अत्यंत विस्तीर्ण सरोवरों के समान नेत्र वाले, धूम्र वर्ण, प्रलय-मेघ के समान गर्जन करने वाले, ज्वालामय रोमधारी, बड़े तीक्ष्ण प्रज्वलित दंतयुक्त, संडसी जैसे नखों वाले, चर्म वस्त्रधारी, कुटिल-भृकुटि भयंकरतम वेश में यमराज को देखते हैं। वहां घोरतर पशु तथा यमदूत उपस्थित मिलते हैं। 

यमराज हमसे सदा शुभ कर्म की आशा करते हैं लेकिन जब कोई ऐसा नहीं कर पाता है तो भयानक दंड द्वारा जीव को शुद्ध करना ही इनके लोक का मुख्य कार्य है। ऐसी आत्माओं को यमराज नरक में भेज देते हैं।

यह प्रेत जिसने कई सोखाआओ को पीटा

 भूत-प्रेतों की लीला भी अपरम्पार होती है। कभी-कभी ये बहुत ही सज्जनता से पेश आते हैं तो कभी-कभी इनका उग्र रूप अच्छे-अच्छों की धोती गीली कर देता है। भूत-प्रेतों में बहुत कम ऐसे होते हैं जो आसानी से काबू में आ जाएँ नहीं तो अधिकतर सोखाओं-पंडितों को पानी पिलाकर रख देते हैं, उनकी नानी की याद दिला देते हैं।


आज की कहानी एक ऐसे प्रेत की है जिसको कोई भी सोखा-पंडित अपने काबू में नहीं कर पाए और ना ही वह प्रेत किसी देवी-देवता से ही डरता था। क्या वह प्रेत ही था या कोई और??? आइए जानने की कोशिश करते हैं। हमारी भी इस प्रेत को जानने की उत्कंठा अतितीव्र हो गई थी जब हमने पहली बार ही इसके बारे में सुना। दरअसल लोगों से पता चला कि इस प्रेत ने बहुत सारे सोखाओं-पंडितों को घिसरा-घिसराकर मारा और इतना ही नहीं जब इसे किसी देवी या देवता के स्थान पर लेकर जाया गया तो इसने उस देवी या देवता की भी खुलकर खिल्ली उड़ाई और उन्हें चुनौती दे डाली कि पहले पहचान, मैं कौन??? और शायद इस कौन का उत्तर किसी के पास नहीं था चाहें वह सोखा हो या किसी देवी या देवता का बहुत बड़ा भक्त या पुजारी।
अभी से आप मत सोंचिए की यह कौन था जिसका पता बड़े-बड़े सोखा और पंडित तक नहीं लगा पाए? क्या इस कहानी को पढ़ने के बाद भी इस रहस्य से परदा नहीं उठेगा? इस रहस्यमयी प्रेत के 'पहचान मैं कौन' पर से परदा उठेगा और यह परदा शायद वह प्रेत ही उठाएगा क्योंकि उससे अच्छा उसको कौन समझ सकता है। बस थोड़ा इंतजार कीजिए और कहानी को आगे तो बढ़ने दीजिए।

यह कहानी हमारे गाँव-जवार की नहीं है। ये कहानी है हमारे जिले से सटे कुशीनगर जिले के एक गाँव की। यह गाँव पडरौना के पास है। अब आप सोंच रहे होंगे कि यह कहानी जब मेरे जिले की नहीं है तो फिर मैं इसे कैसे सुना रहा हूँ। मान्यवर इस गाँव में मेरी रिस्तेदारी पड़ती है अस्तु इस कहानी को मैं भी अच्छी तरह से बयाँ कर सकता हूँ।

भूत-प्रेतों की तरह से इस कहानी को रहस्यमयी न बनाते हुए मैं सीधे अपनी बात पर आ जाता हूँ। इस गाँव में एक पंडीजी हैं जो बहुत ही सुशील, सभ्य और नेक इंसान हैं। यह कहानी घटिट होने से पहले तक ये पंडीजी एक बड़े माने-जाने ठीकेदार हुआ करते थे और ठीके के काम से अधिकतर घर से दूर ही रहा करते थे। हप्ते या पंद्रह दिन में इनका घर पर आना-जाना होता था। ये ठीका लेकर सड़क आदि बनवाने का काम करते थे। इनके घर के सभी लोग भी बड़े ही सुशिक्षित एवं सज्जन प्रकृति के आदमी हैं। इनकी पत्नी तो साधु स्वभाव की हैं और एक कुशल गृहिणी होने के साथ ही साथ बहुत ही धर्मनिष्ठ हैं।
एकबार की बात है कि पंडीजी ठीके के काम से बाहर गए हुए थे पर दो दिन के बाद ही उनको दो लोग उनके घर पर पहुँचाने आए। पंडीजी के घरवालों को उन दो व्यक्तियों ने बताया कि पता नहीं क्यों कल से ही पंडीजी कुछ अजीब हरकत कर रहे हैं। जैसे कल रात को सात मजदूरों ने अपने लिए खाना बनाया था और ये जिद करके उनलोगों के साथ ही खाना खाने बैठे पर मजदूरों ने कहा कि पंडीजी पहले आप खा लें फिर हम खाएँगे। और इसके बाद जब ये खाना खाने बैठे तो सातों मजदूरो का खाना अकेले खा गए और तो और ये खाना भी आदमी जैसा नहीं निशाचरों जैसा खा रहे थे। उसके बाद दो मजदूर तो डरकर वहाँ से भाग ही गए। फिर हम लोगों को पता चला। उसके बाद हम लोग भी वहाँ पहुँचे और इनको किसी तरह सुलाए और सुबह होते ही इनको पहुँचाने के लिए निकल पड़े।
इसके बाद वे दोनों व्यक्ति चले गए और पंडीजी भी आराम से अपनी कोठरी में चले गए। कुछ देर के बाद पंडीजी लुँगी लपेटे घर से बाहर आए और घरवालों के मना करने के बावजूद भी खेतों की ओर निकल गए। घर का एक व्यक्ति भी (इनके छोटे भाई) चुपके से इनके पीछे-पीछे हो लिया। जब पंडीजी गाँव से बाहर निकले तो अपने ही आम के बगीचे में चले गए। आम के बगीचे में पहुँचकर कुछ समय तो पंडीजी टहलते रहे पर पता नहीं अचानक उनको क्या हुआ कि आम की नीचे झुलती हुई मोटी-मोटी डालियों को ऐसे टोड़ने लगे जैसे हनुमान का बल उनमें आ गया हो। डालियों के टूटने की आवाज सुनकर इनके छोटे भाई दौड़कर बगीचे में पहुँचे और इनको ऐसा करने से रोकने लगे। जब इनके छोटे भाई ने बहुत ही मान-मनौवल की तब पंडीजी थोड़ा शांत हुए और घर पर वापस आ गए।
इस घटना के बाद तो पंडीजी के पूरे परिवार के साथ ही साथ इनका पूरा गाँव भी संशय में जीने लगा। एक दिन फिर क्या हुआ की पंडीजी अपनी ही कोठरी में बैठकर अपने बच्चे को पढ़ा रहे थे और इनकी पत्नी वहीं बैठकर रामायण पढ़ रही थीं तभी इनकी पत्नी क्या देखती हैं कि पंडीजी की शरीर फूलती जा रही है और चेहरा भी क्रोध से लाल होता जा रहा है। अभी पंडीजी की पत्नी कुछ समझती तबतक पंडीजी अपने ही बेटे का सिर अपने मुँह में लेकर ऐसा लग रहा था कि जैसे चबा जाएँगे पर इनकी पत्नी डरी नहीं और सभ्य भाषा में बच्चे को छोड़ने की विनती कीं। अचानक पंडीजी बच्चे का सिर मुँह से निकालकर शांत होने लगे और रोते बच्चे का सिर सहलाने लगे।इस घटना के बाद तो पंडीजी के घरवालों की चैन और नींद ही हराम हो गई। वे लोग पूजा-पाठ करवाने के साथ ही साथ कइ सारे डाक्टरों से संपर्क भी किए। यहाँ तक कि उन्हे कई बड़े-बड़े अस्पतालों में दिखाया गया पर डाक्टरों की कोई भी दवा काम नहीं की और इधर एक-दो दिन पर पंडीजी कोई न कोई भयानक कार्य करके सबको सकते में डालते ही रहे। डाक्टरों से दिखाने का सिलसिला लगभग 2 महीने तक चलता रहा पर पंडीजी के हालत में सुधार नाममात्र भी नहीं हुआ।

हाँ पर अब सबके समझ में एक बात आ गई थी और वह यह कि जब भी पंडीजी की शरीर फूलने लगती थी और उनका चेहरा तमतमाने लगता था तो घर वाले उनकी पत्नी को बुला लाते थे और पंडीजी अपनी पत्नी को देखते ही शांत हो जाते थे।
एकदिन पंडीजी की पत्नी पूजा कर रही थीं तभी पंडीजी वहाँ आ गए और अपनी पत्नी से हँसकर पूछे कि तुम पूजा क्यों कर रही हो? पंडीजी की पत्नी ने कहा कि आप अच्छा हो जाएँ , इसलिए। अपनी पत्नी की बात सुनकर पंडीजी ठहाका मार कर हँसने लगे और हँसते-हँसते अचानक बोल पड़े की कितना भी पूजा-पाठ कर लो पर मैं इसे छोड़नेवाला नहीं हूँ अगर मैं इसे छोड़ुँगा तो इसे इस लोक से भेजने के बाद ही। पंडीजी की यह बात सुनकर पंडीजी की पत्नी सहमीं तो जरूर पर उन्होंने हिम्मत करके पूछा आप कौन हैं और मेरे पति ने आपका क्या बिगाड़ा हैं? इसपर पंडीजी ने कहा कि मैं कौन हूँ यह मैं नहीं जानता और इसने मेरा क्या बिगाड़ा है मैं यह भी नहीं बताऊँगा।

पंडीजी की पत्नी ने जब यह बात अपने घरवालों को बताई तो पंडीजी के घरवालों ने उस जवार में जितने सोखा-पंडित हैं उन सबसे संपर्क करना शुरु किया। पहले तो कुछ सोखा-पंडितों ने झाड़-फूँक किया पर कुछ फायदा नहीं हुआ। एकदिन पंडीजी के घरवालों ने पंडीजी को लेकर उसी जवार (क्षेत्र) के एक नामी सोखा के पास पहुँचे। सोखाबाबा कुछ मंत्र बुदबुदाए और पंडीजी की ओर देखते हुए बोले कि तुम चाहें कोई भी हो पर तुम्हें इसे छोड़कर जाना ही होगा नहीं तो मैं तुम्हें जलाकर भस्म कर दूँगा। जब सोखाबाबा ने भस्म करने की बात कही तो पंडीजी का चेहरा तमतमा उठा और वे वहीं उस सोखा को कपड़े की तरह पटक-पटककर लगे मारने। सोखा की सारी शेखी रफूचक्कर हो गई थी और वह गिड़गिड़ाने लगा था। फिर पंडीजी की पत्नी ने बीच-बचाव किया और सोखा की जान बची।
पंडीजी द्वारा सोखा के पिटाई की खबर आग की तरह पूरे जवार क्या कई जिलों में फैल गई। अब तो कोई सोखा या पंडित उस पंडीजी से मिलना तो दूर उनका नाम सुनकर ही काँपने लगता था। इसी दौरान पंडीजी को लेकर एक देवी माँ के स्थान पर पहुँचा गया पर देवी माँ (देवी माँ जिस महिला के ऊपर वास करती थीं उस महिला ने देवी-वास के समय) ने साफ मना कर दिया कि वे ऐसे दुष्ट और असभ्य व्यक्ति के मुँह भी लगना नहीं चाहतीं। पंडीजी उस स्थान पर पहुँचकर मुस्कुरा रहे थे और अपनी पत्नी से बोले की जो देवी मेरे सामने आने से घबरा रही है वह मुझे क्या भगाएगी? देवी माँ ने पंडीजी के घरवालों से कहा कि यह कौन है यह भी पहचानना मुश्किल है। आप लोग इसे लेकर बड़े-बड़े तीर्थ-स्थानों पर जाइए हो सकता है कि यह इस पंडीजी को छोड़ दे।
इसके बाद पंडीजी के घरवाले पंडीजी को लेकर बहुत सारे तीर्थ स्थानों (जैसे मैहर, विंध्याचल, काशी, थावें, कुछ नामी मजार आदि) पर गए पर कुछ भी फायदा नहीं हुआ। यहाँ तक की अब पंडीजी अपने घरवालों के साथ इन तीर्थों पर आसानी से जाते रहे और घूमते रहे। अधिकतर तीर्थ-स्थान घूमाने के बाद भी जब वह प्रेत पंडीजी को नहीं छोड़ा तो पंडीजी के घरवाले घर पर ही प्रतिदिन विधिवत पूजा-पाठ कराने लगे। पंडीजी की पत्नी प्रतिदिन उपवास रखकर दुर्गा सप्तशती का पाठ करने लगीं।
एक दिन पंडीजी अपने घरवालों को अपने पास बुलाए और बोले की आप सभी लोग खेतों में जाकर कम से कम एक-एक पीपल का पेड़ लगा दीजिए। पंडीजी की पत्नी बोल पड़ी कि अगर आपकी यही इच्छा है तो एक-एक क्या हम लोग ग्यारह-ग्यारह पीपल का पेड़ लगाएँगे। इसके बाद पंडीजी के घरवाले पंडीजी को साथ लेकर उसी दिन खेतों में गए और इधर-उधर से खोजखाज कर एक-एक पीपल का पेड़ लगाए और पंडीजी से बोले कि हमलोग बराबर पीपल का पेड़ लगाते रहेंगे।
इस घटना के बाद पंडीजी थोड़ा शांत रहने लगे थे। अब वे अपने घर का छोटा-मोटा काम भी करने लगे थे। एक दिन पंडीजी के बड़े भाई घर के दरवाजे पर लकड़ी फाड़ रहे थे। पंडीजी वहाँ पहुँचकर टाँगी अपने हाथ में ले लिए और देखते ही देखते लकड़ी की तीन मोटी सिल्लियों को फाड़ दिए। शायद इन तीनों सिल्लियों को फाड़ने में उनके भाई महीनों लगाते।
एक दिन लगभग सुबह के चार बजे होंगे कि पंडीजी ने अपनी पत्नी को जगाया और बोल पड़े, "मैं जा रहा हूँ।" पंडीजी की पत्नी बोल पड़ी, "अभी तो रात है और इस रात में आप कहाँ जा रहें हैं?" अपनी पत्नी की यह बात सुनकर पंडीजी हँसे और बोले, "मैं जा रहा हूँ और वह भी अकेले। तेरे सुहाग को तेरे पास छोड़कर। अब मैं तेरे पति को और तुम लोगों को कभी तंग नहीं करूँगा। तूँ जल्दी से अपने पूरे घरवालों को जगवाओ ताकि जाने से पहले मैं उन सबसे भी मिल लूँ।" पंडीजी के इतना कहते ही पंडीजी की पत्नी के आँखों से झर-झर-झर आँसू झरने लगे और वे पंडीजी का पैर पकड़कर खूब तेज रोने लगीं। अब तो पंडीजी के पत्नी के रोने की आवाज सुनकर घर के लोग ऐसे ही भयभीत हो गए और दौड़-भागकर पंडीजी के कमरे में पहुँचे। अरे यह क्या पंडीजी के कमरे का माहौल तो एकदम अच्छा था क्योंकि पंडीजी तो मुस्कुराए जा रहे थे। घरवालों ने पंडीजी की पत्नी को चुप कराया और रोने का कारण पूछा। पंडीजी की पत्नी के बोलने से पहले ही पंडीजी स्वयं बोल पड़े की अब मैं सदा सदा के लिए आपके घर के इस सदस्य (पंडीजी) को छोड़कर जा रहा हूँ। अब आपलोगों को कष्ट देने कभी नहीं आऊँगा।
पंडीजी के इतना कहते ही पंडीजी की पत्नी बोल पड़ी, "आप जो भी हों, मेरी गल्तियों को क्षमा करेंगे, क्या मैं जान सकती हूँ की आप कौन हैं और मेरे पति को क्यों पकड़ रखे थे?" इतना सुनते ही पंडीजी बहुत जोर से हँसे और बोले मैं ब्रह्म-प्रेत (बरम-पिचाश) हूँ। मेरा कोई भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता और तेरे पति ने उसी पीपल के पेड़ को कटवा दिया था जिसपर मैं हजारों वर्षों से रहा करता था। इसने मेरा घर ही उजाड़ दिया था इसलिए मैंने भी इसको बर्बाद करने की ठान ली थी पर तुम लोगों की अच्छाई ने मुझे ऐसा करने से रोक लिया।
इस घटना के बाद से वे ब्रह्म-प्रेत महराजजी उस पंडीजी को छोड़कर सदा-सदा के लिए जा चुके हैं। आज पंडीजी एवं उनका परिवार एकदम खुशहाल और सुख-समृद्ध है। पर ब्रह्म-प्रेत महराज के जाने के बाद भी अगर कुछ बचा है तो उनकी यादें और विशेषकर उन सोखाओं के जेहन में जिनका पाला इस ब्रह्म-प्रेतजी से पड़ा था और जिसके चलते इन सोखाओं ने अपनी सोखागिरा छोड़ दी थी।
एक निवेदन करता हूँ प्रेत बनकर नहीं आदमी बनकर। एक तो पेड़ काटें ही नहीं और अगर मजबूरी में काटना भी पड़ जाए तो एक के बदले दो लगा दीजिए। ताकि मेरा घर बचा रहे और आप लोगों का भी। क्योंकि अगर ऐसे ही पेड़ कटते रहे तो एक दिन प्रकृति असंतुलित हो जाएगी और शायद न आप बचेंगे न आपका घर भी। (एक पेड़ सौ पुत्र समाना, एक तो काटना नहीं और अगर काटना ही हो तो उसके पहले दस-बीस लगाना।)

गृहस्थ भुत

 




हुनेसरजी (नाम बदला हुआ) हमारे जिले के ही रहने वाले थे और शादी-शुदा थे। उनके परिवार में उनके दो छोटे भाई, माता-पिता, पत्नी तथा दो प्यारे बच्चे थे। हुनेसर जी कोलकाता में किसी सेठ के यहाँ ट्रक की ड्राइवरी करते थे। उन्हें ट्रक पर माल लादकर दूर-दूर के शहरों में जाना पड़ता था। वे बहुत ही मेहनती थे और अपना काम पूरी जिम्मेदारी व ईमानदारी से करते थे। उनके कार्यों से उनका सेठ भी बहुत ही खुश था और हर महीने उन्हें अपने साथ लेकर डाकघर जाता था और हजार-बारह सौ उनके घर मनीआर्डर जरूर कराता था। हुनेसरजी की जीवन गाड़ी बहुत ही मजे में चल रही थी। कभी-कभी जब उनको माल लेकर लखनऊ, बनारस आदि आना पड़ता तो वे थोड़ा समय निकालकर घर पर भी आ जाते और घर वालों का हाल-चाल लेने के बाद वापस चले जाते।


एक बार की बात है कि हुनेसरजी रात को करीब दस बजे ट्रक लेकर निकले। उन्हें दिल्ली की ओर जाना था। उनके साथ सामू नामका एक खलाँसी भी था। हुनेसरजी खलाँसी को अपने बेटे जैसा मानते थे और उसे ट्रक चलाना भी सिखाते थे। अब सामू ट्रक चलाने में निपुण भी हो गया था। उस रात सामू ने जिद करके कहा कि आप आराम से सो जाइए तो ट्रक चलाकर मैं ले चलता हूँ। हुनेसरजी ना कहकर ट्रक खुद चलाते हुए निकल पड़े और सामू उनके बगल में बैठा रहा। रात के करीब 1 बजे होंगे और ट्रक एक चौड़ी सड़क पर तेज गति से दौड़ा चला जा रहा था। अचानक हुनेसरजी को पता नहीं क्या हुआ कि वे सड़क किनारे ट्रक रोककर बीड़ी सुलगाकर पीने लगे। बीड़ी पीने के बाद वे सामू से बोले कि मुझे बहुत नींद आ रही है अस्तु मैं सोने जा रहा हूँ। तुम एक काम करो, मजे में (धीरे-धीरे) ट्रक चलाकर ले चलो। सामू तो ट्रक चलाना ही चाहता था, उसने हामी भरकर ट्रक की स्टेरिंग पकड़ ली और धीमी गति से ट्रक को दौड़ाने लगा। लगभग आधे-एक घंटे के बाद जब सामू को लगा कि अब हुनेसरजी गहरी नींद में सो रहे हैं तो उसको मस्ती सूझी। उसने ट्रक की स्पीड बहुत ही तेज कर दी और गुनगुनाते हुए ड्राइबिंग करने लगा। अचानक उसे पीछे से एक और ट्रक आती दिखाई पड़ी। शायद जिसकी स्पीड और भी तेज थी। उसने सोचा कि शायद पीछे से आ रही ट्रक उससे आगे निकलना चाहती है। सामू का भी खून अभी तो एकदम नया था। वह भला ऐसा क्यों होने दे, उसने भी ट्रक का एक्सीलेटर चाँपते हुए ट्रक को और भी तेज दौड़ाने लगा। अरे यह क्या उसने ट्रक की स्पीड इतनी बढ़ा दी कि ट्रक अब उसके काबू से बाहर हो गई। वह कुछ सोंच पाता इससे पहले ही ट्रक सड़क छोड़कर उतर गई और एक पेड़ से टकराकर पूरी तरह से नष्ट हो गई।

इस दुर्घटना में हुनेसरजी तो प्रभु को प्यारे हो गए पर सामू बच गया। उसे कुछ ट्रक चालकों ने पास के अस्पताल में भर्ती कराकर उसके सेठ को सूचना भिजवा दी थी। सामू 4-5 दिन अस्पताल में पड़ा रहा। उसे अपनी गल्ती पर बहुत ही पछतावा हो रहा था। उसकी एक गलती से उसके पिता समान हुनेसरजी को अपनी जान गँवानी पड़ी थी। उसका दिल रो पड़ा था पर अब विधि के विधान के आगे वह कर भी क्या सकता था। उसने तय कर लिया कि अब वह जो भी कमाएगा उसका आधा हुनेसरजी की परिवार को दिया करेगा। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद वह वापस कोलकाता आ गया। अपने सेठ से मिलकर उसने सारी बात बताई और अपनी गलती पर फूट-फूटकर रोने लगा। सेठ ने उसे समझाते हुए कहा कि अब रोने-धोने से कुछ होने वाला नहीं पर हम अभी हुनेसरजी के परिवार वालों को कुछ बताएँगे नहीं और समय-समय पर उसके परिवार की मदद करते रहेंगे, इसके साथ ही उन्होंने सामू से एक ऐसी बात बताई जिसे सुनकर सामू पूरी तरह से डर गया, उसके रोंगटे खड़े हो गए।

दरअसल सेठ ने सामू को बताया कि हुनेसरजी बराबर बताया करते थे कि मालिक जब भी यहाँ से माल लेकर दिल्ली के लिए निकलता हूँ, तो रात को करीब 1-2 बजे एक सुनसान जगह पर ऐसा लगता है कि कोई ट्रक तेजी से पीछे से आ रहा है और हमें ओवरटेक करने की कोशिश कर रहा है। पीछे देखने पर वह ट्रक दिखाई नहीं देता पर ट्रक के मिरर में वह साफ-साफ ओवरटेक करते हुए दिखता है। कई बार तो मैंने अपने ट्रक को किनारे लगाकर उतर कर देखा तो पीछे कोई ट्रक ही नहीं दिखा। तेजी से आता वह ट्रक केवल रात को ही और वह भी मिरर में ही दिखता है। मालिक इस ट्रक के चक्कर में कई ट्रक वालों का एक्सीडेंट हो गया है। समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों होता है? आगे उस सेठ ने कहा कि मैं हुनेसरजी की बातों को सुन तो लेता था पर उसपर ध्यान नहीं देता था। क्योंकि ऐसे कैसे हो सकता है कि कोई ट्रक होकर भी न हो? और वैसे भी मैं भूत-प्रेत में विश्वास नहीं करता पर तुम्हारी बातें सुनने के बाद पता नहीं क्यों अब मुझे हुनेसरजी की बातों पर विश्वास होने लगा है। सेठ जी के इतना कहते ही सामू को काठ मार गया। वह चाहकर भी चीख नहीं सका। तो क्या पीछे से आ रहा ट्रक कोई भूत-प्रेत था? या कोई भूत ट्रक बनकर ट्रक वालों को चकमा देकर दुर्घटना करा देता था?

खैर समय सबके घाव भर देता है। सेठ भी अपने काम में लग गए और सामू भी। 3 महीना बीतने के बाद एक दिन सेठ ने सामू से कहा कि चलो हुनेसरजी के घर चलकर आते हैं। इस बात को छिपाना ठीक नहीं होगा और साथ ही हुनेसरजी के परिवार की कुछ आर्थिक मदद भी कर देंगे। हुनेसरजी थे तो हर महीने उनके परिवार को मनीआर्डर चला जाता था पर पिछले 3 महीने से मनीआर्डर भी नहीं गया और ना ही कोई पत्र आदि। उनके घर के लोग कहीं परेशान न हों? सेठ की बात सुनकर सामू ने कहा कि सेठजी अगले महीने मेरी शादी है। शादी के बाद हम लोग चलेंगे क्योंकि मैंने भी सोच रखा है कि हुनेसरजी के परिवार की मदद करता रहूँगा। इसके बाद सेठ ने कहा कि ठीक है, अगले महीने चलते हैं। मैं चाहता हूँ कि मैं मुनेसरजी के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था भी कर दूँ और साथ ही उनके दोनों भाइयों को यहाँ लाकर कुछ काम-धंधा दिलवा दूँ।

मई का महीना था और दोपहर का समय। कड़ाके की लू चल रही थी। सेठ और सामू पसीने से तर-बतर थे। वे लोग पूछते-पूछते हुनेसरजी के गाँव में आ गए थे। एक आदमी ने हुनेसरजी के घर पर भी उन लोगों को पहुँचा दिया। हुनेसरजी के दरवाजे पर एक नीम का घना पेड़ था, जिसके नीचे चौकी पड़ी हुई थी। सेठ और सामू वहीं बैठ गए। उन लोगों ने हुनेसरजी के परिवार के लिए साड़ी, कपड़ा, मिठाई आदि जो लेकर आए थे, घर में भिजवा दिए। घर से उन्हें पानी (जलपान आदि) पीने के लिए आया। पानी-ओनी पीने के बाद उन दोनों ने हुनेसरजी के पूरे परिवार को यह दुखद घटना सुनाने की सोची। अरे यह कहा, अभी वे लोग कुछ कहने ही वाले थे तभी डाकिए के साइकिल की घंटी ट्रिन-ट्रिन बजती हुई उसी नीम के आगे आकर रुक गई। फिर डाकिए ने हुनेसरजी के पिताजी को जयरम्मी करते हुए मनीआर्डर सौंपा। मनीआर्डर सौंपने के बाद डाकिया चला गया। डाकिए के जाने के बाद हुनेसरजी के पिताजी ने कहा कि जब आप लोग आ ही रहे थे तो फिर हुनेसर को यह पैसे डाक से लगाने की क्या जरूरत थी? आप लोगों से हाथ से ही भिजवा दिया होता।

हुनेसरजी के पिता के मुँह से इतना सुनते ही सेठ और सामू दोनों हक्के-बक्के हो गए। सेठ ने थूक घोंटकर हुनेसर के पिताजी से पूछा कि क्या कहा आपने, हुनेसरजी ने मनी आर्डर भेजा है? सेठ की यह बात सुनते ही हुनेसर के पिताजी ने बिना कुछ बोलते हुए 100 के आठ नोट तथा मनीआर्डर वाला छोटा कागज का टुकड़ा जिसपर पता लिखा था सेठ के आगे बढ़ा दिया। सेठ जल्दी-जल्दी उस कागज के टुकड़े को उलट-पुलट कर देखने लगे। उन्हें कुछ भी विश्वास ही नहीं हो रहा था क्योंकि मनीआर्डर के उस कागज पर जो लिखाई थी वह हुनेसरजी की ही थी और वह पैसा उन्होंने पिछले महीने ही उसी डाकघर से लगाया था जहाँ से सेठ और वे बराबर हर महीने पैसा लगाया करते थे। अब तो सेठ एकदम से घबरा गए थे। साथ ही सामू के चेहरे का रंग भी उड़ गया था। उन दोनों को समझ में नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा है। तभी हुनेसरजी बोल पड़े कि कुछ भी हो पर भगवान ऐसा लड़का सबको दें। हम लोगों की बहुत ही सुध रखता है और हर महीने थोड़ा कम या ज्यादा मनीआर्डर जरूर कर देता है। इतना सुनते ही सामू बोल पड़ा कि काका, क्या पिछले महीने भी हुनेसरजी ने मनीआर्डर किया था? हाँ कहते हुए हुनेसरजी के पिताजी ने कहा कि, अरे भाई, हाँ, हाँ। पिछले महीने तो उसने 12 रुपए भेजे थे। इतना सब सुनने के बाद आप लोग खुद ही सोंच लीजिए कि सेठ और सामू किस परिस्थिति में होंगे।


अचानक सामू अपने आप को रोक न सका और फफक कर रो पड़ा। सेठ से रहा न गया और वे सामू को चुप कराते हुए खुद भी रूआँसू हो गए। हुनेसरजी के परिवार वालों को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अचानक ये दोनों रोने क्यों लगे। अब उस नीम के नीचे गाँव के अन्य लोग भी एकत्र हो गए थे। सेठ ने थोड़ी हिम्मत करके सारी बात कह डाली। यह बात सुनते ही वहाँ खड़े लोगों विशेषकर महिलाओं में रोवन-पीटन शुरु हो गया पर अभी भी हुनेसरजी के घर वाले यह मानने को तैयार नहीं थे कि पिछले 4 महीनों से हुनेसरजी नहीं है। अगर हुनेसरजी नहीं है तो इन चार महीनों में जो 3 बार मनीआर्डर आएँ हैं, वह किसने भेजा है? हैंडराइटिंग तो मुनेसर की ही है। अरे इतना ही नहीं दो महीने पहले उसका एक पत्र भी मिला था जिसमें उसने लिखा था कि बाबूजी कुछ जरूरी काम आ जाने के कारण 1 साल तक मैं घर नहीं आ सकता पर मनीआर्डर बराबर भेजता रहूँगा। काफी कुछ सांत्वना के बाद, हुनेसरजी के दुर्घटना की पुलिस द्वारा ली गई कुछ तस्वीरों और डाक्टर की रिपोर्ट के बाद अंततः हुनेसरजी के घर वाले माने कि अब हुनेसरजी नहीं रहे पर वह भी पूरी तरह से नहीं।

गाँव वालों और कुछ हित-नात के कहने-सुनने के बाद हुनेसरजी की अंतिम क्रिया संपन्न की गई। सारे कर्म विधिवत संपादित किए गए। इसके बाद हुनेसर जी के दोनों भाई सेठ के पास कोलकाता चले गए। सेठ ने उन्हें एक कारखाने में अच्छे वेतन पर नौकरी दिलवा दी। इसके साथ ही सेठ हर महीने हुनेसरजी के परिवार के लिए कुछ पैसे मनीआर्डर करता रहा। खैर जो भी पर अभी भी सामू को यकीं नहीं कि उसका पीछा करने वाला ट्रक कोई भूत चला रहा था और मरने के बाद भी हुनेसरजी अपने परिवार को मनीआर्डर करते रहे। खैर अब हुनेसरजी के परिवार को पूरी तरह यकीं हो गया है कि अब हुनेसरजी इस दुनिया में नहीं हैं, क्योंकि अब उनका पत्र-मनीआर्डर आदि भी नहीं आता और इस घटना को भी तो काफी समय हो गए।



भूतों से बचने के उपाय

 




हिन्दू धर्म में भूतों से बचने के अनेकों उपाय बताए गए हैं। पहला धार्मिक उपाय यह कि गले में ॐ या रुद्राक्ष का लाकेट पहने, सदा हनुमानजी का स्मरण करें। चतुर्थी, तेरस, चौदस और अमावस्य को पवि‍त्रता का पालन करें। शराब न पीएं और न ही मांस का सेवन करें। सिर पर चंदन का तिलक लगाएं। हाथ में मौली (नाड़ा) अवश्य बांधकर रखें। 


घर में रात्रि को भोजन पश्चात सोने से पूर्व चांदी की कटोरी में देवस्थान पर कपूर और लौंग जला दें। इससे आकस्मिक, दैहिक, दैविक एवं भौतिक संकटों से मुक्त मिलती है। 


प्रेत बाधा दूर करने के लिए पुष्य नक्षत्र में धतूरे का पौधा जड़ सहित उखाड़कर उसे ऐसा धरती में दबाएं कि जड़ वाला भाग ऊपर रहे और पूरा पौधा धरती में समा जाए। इस उपाय से घर में प्रेतबाधा नहीं रहती। 

प्रेत बाधा निवारक हनुमत मंत्र- ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ऊँ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत पिशाच-शाकिनी-डाकिनी-यक्षणी-पूतना-मारी-महामारी, यक्ष राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकम्‌ क्षणेन हन हन भंजय भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामारेश्वर रुद्रावतार हुं फट् स्वाहा। इस हनुमान मंत्र का पांच बार जाप करने से भूत कभी भी निकट नहीं आ सकते। 

हनुमान जी के बाद मां कालका के स्मरण मात्र से किसी भी प्रकार की भूतबाधा है तो तत्काल ही हट जाती है। मां काली के कालिका पुराण में कई मंत्रों का उल्लेख मिलता है। 

सरसों के तेल का या शुद्ध घी का दिया जलाकर काजल बना लें। ये काजल लगाने से भूत, प्रेत, पिशाच आदि से रक्षा होती है और बुरी नजर से भी रक्षा होती है। 

चरक संहिता में प्रेत बाधा से पीड़ित रोगी के निदान के उपाय विस्तार से मिलते हैं। ज्योतिष साहित्य के मूल ग्रंथों- प्रश्नमार्ग, वृहत्पराषर, होरा सार, फलदीपिका, मानसागरी आदि में ज्योतिषीय योग हैं जो प्रेत पीड़ा, पितृदोष आदि बाधाओं से मुक्ति का उपाय बताते हैं। अथर्ववेद में दुष्ट आत्माओं को भगाने से संबंधित अनेक उपायों का वर्णन मिलता है।


धूनधर का जंगल कि पुरी कहानी

 भारत में कई भूतिया जंगल हैं, जो अकेलापन और अनपढ़ी ज़िन्दगी का प्रतीक हो सकते हैं। कुछ प्रमुख भुतिया जंगल हैं जैसे कि धूनधर का जंगल (मध्य प्...