आत्मा से प्यार – एक छोटी सी लव स्टोरी
एक ऐसी रहस्यमय झिल,जो पानी से। नहीं नरकंकाल से है भरी
मित्रो भारत के रहस्यमय सफर की इस कड़ी में हम आपको आज ऐसी जगह से रूबरू करवाएंगे जिसके रहस्य को दुनिया भर के वैज्ञानिक नहीं समझ पाए | आज हम आपको हिमालय की सुदूर घाटियों के स्थित रूपकुंड झील के अनसुलझे रहस्य के बारे में आपको बतायेंगे | रूपकुंड झील , उत्तराखंड की हिमालय पहाडियों के बीच स्थित 5000 मीटर गहरी बर्फीली झील है जो कि सर्दियों में जम जाती है और गर्मियों में पिघल जाती है | इस झील तक केवल पर्वतारोही ही आते है | 1942 में यहा पर आये पर्वतारोहियों को 100 से भी ज्यादा नरकंकाल मिले तभी से ये जगह वैज्ञानिको के लिए रहस्य का सबब बना हुआ है | कैसे यहा आये नरकंकाल और किसके है ये नरकंकाल , इस रहस्य को सुलझाते वक्त यहा तीन अलग अलग तथ्य मिले है | पहले तथ्य के अनुसार द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सैनिक जब इस रास्ते से गुजर रहे थे तो घनी बर्फ होने की वजह से उन्हें रास्ता पता करने में बड़ी परेशानी हुई | कई दिनों तक घूमते घूमते हाय्पोथेर्मिया की वजह से इस झील वाली जगह इनकी मौत हो गयी | दूसरा तथ्य ये कहता है कि प्राचीन समय में जसधावल नामक राजा संतान प्राप्ति की खुशी में नंदा देवी दर्शन करने जा रहा था और रास्ते में अचानक ओलावृष्टी के कारण पूरा जत्था उस बर्फ की झील में दफन हो गया |तीसरा तथ्य ये कहता है कि 12 वी शताब्दी में यहा मुहम्मद तुगलक का आक्रमण हुआ था तो कुछ कहानिया जोरावर सिंह और उसके सैनिको पर आधारित है जो इस झील में तिब्बत के युद्ध के दौरान शहीद हो गए थे किस तथ्य में कितनी सच्चाई है कोई नहीं जानता लेकिन आज भी उस झील में इन नरकंकालो को देखा जा सकता है | इतनी अधिक मात्रा में एक वीरान जगह पर नरकंकालो के मिलने से नेशनल जोग्राफिक की टीम भी यहा पर खोज करने आयी थी | आज भी इस जगह पर कई पर्वतारोही इस रहस्य को देखने आते है | 2013 में इंडिया टुडे अखबार में इस झील के रहस्य पर से पर्दाफाश किया और बताया कि वैज्ञानिको की खोज में 9वी शताब्दी में हुई भयंकर ओलावृष्टी में 200 से अधिक इन्सान यहा इस झील में दब गए | अगर आप भी इस झील को देखना चाहते है तो अपने आप को मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार कर लिजिये |
रात होते ही जाग जाते हैं डैथ वैली के पत्थर
भटकती रूह की सच्ची कहानी
भूत-प्रेत के किस्से सुनने में बेहद रोमांचक और दिलचस्प लगते हैं लेकिन क्या हो जब यह किस्से सिर्फ किस्से ना रहकर एक हकीकत की तरह आपके सामने आएं? आज की युवा पीढ़ी भूत और आत्माओं के होने पर विश्वास नहीं करती लेकिन जिस पर आप विश्वास नहीं करते वह असल में है ही नहीं यह तो संभव नहीं है ना. आज हम ऐसे ही भूतहा स्थान से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं एक आत्मा ने किया था.
छत पर रेंगती प्रेतनी
कनाडा के ओनटेरियो के नियाग्रा फॉल्स के पास स्थित इस टनल का नाम सुनते ही लोग कांपने लग जाते हैं. इस टनल का निर्माण सन 1900 में ग्रांड रेलवे लाइंस के ठीक नीचे किया गया था और इस टनल को बनाने का उद्देश्य उस इलाके के पानी के बहाव को पास ही स्थित खेतों की सिंचाई के लिए प्रयोग किया जाना था.
16 भी हि ला कर रख सकती है. टनल का निर्माण हुए काफी वक्त बीत गया था और सब कुछ बहुत आराम से और ठीकठाक चल रहा था.
लेकिन अचानक एक दिन यहां एक दर्दनाक हादसा हुआ जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया. इस टनल के आसपास आबादी बहुत कम थी इसीलिए हर समय यहां पानी भी नहीं बहा करता था. जब पानी बहुत भर जाता था तो उस समय इस टनल का प्रयोग किया जाता था. इस टनल में यूं तो कई हादसे हुए लेकिन एक हादसा ऐसा था जिससे ओनटेरियो शहर आज तक उबर नहीं पाया है. एक बार की बात है जब इस टनल में पानी का बहाव नहीं था, इस टनल के पास एक घर में बाप और बेटी रहा करते थे. हवा का रुख बहुत तेज था और चारों ओर सिर्फ और सिर्फ अंधेरा था.
लड़की घर में अकेली थी और पीछे वाले कमरे में सो रही थी कि अचानक उस घर में आग लग गई और देखते ही देखते आग ने पूरे घर को अपनी चपेट में ले लिया. लड़की ने घर से बाहर निकलने की कोशिश की लेकिन तब तक उसके कपड़ों को आग ने पकड़ लिया.
खुद को बचाने के लिए वह टनल की तरफ भागी लेकिन टनल में भी उस समय पानी नहीं था. आग की जलन की वजह से वह चीखती चिलाती रही, उसकी चीख बहुत भयानक और दर्दनाक थी जिसे सुनकर कई लोग वहां इकट्ठा हो गए लेकिन किसी ने उस लड़की को नहीं बचाया और आखिरकार उस लड़की ने यहां दम तोड़ दिया.
इसके अलावा यहां एक और लड़की की ऐसे ही जलने के कारण मौत हुई थी. लोगों का कहना है कि इस टनल में कुछ दरिंदों ने एक लड़की का सामूहिक बलात्कार किया और अपने जुर्म को छिपाने के लिए उस लड़की को जिन्दा जला दिया. उसकी चीखें आसपास के इलाकों तक सुनाई दीं.
सुबह जब लोग उस टनल में पहुंचे तो लड़की का अधजला हुआ शरीर वहां पड़ा था और तब से लेकर आज तक वहां शरीर के जलने की वैसी ही बदबू आती है जैसी पहले आती थी. रोशनी को देखकर परेशान करती हैं रूहें स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर कोई उस स्थान पर रोशनी करता है तो उन लड़कियों की रूहें उसे परेशान करती हैं.
कहते हैं एक सफाई कर्मचारी जब टनल की सफाई के लिए अंदर गया तो जैसे ही उसने माचिस जलाई तभी एक भयानक चीख उस टनल में गूंजने लगी और उस कर्मचारी ने अपने सिर के ठीक ऊपर दीवार पर एक छिपकली की तरह कुछ रेंगते देखा. उसका चेहरा जला हुआ था. इस घटना के बाद वह आदमी तो बच गया लेकिन उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया.
इंसानों का खून पीकर प्यास बुझाने वाली एक डायन की कहानी -
छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर ग्राम के निकट जांजगीर इलाके में आज भी खून की प्यासी डायनों का बसेरा है। स्थानीय लोगो का मानना है कि यहां रात में गुजरने वाले राहगीरों को डायन पहले तो अपने वश में करती है और बाद में उस इंसान का खून पीकर स्वय को अमर रखने का प्रयास करती हैं।
सावधानी
नदी, पूल या सड़क पार करते समय भगवान का स्मरण जरूर करें। एकांत में शयन या यात्रा करते समय पवित्रता का ध्यान रखें। पेशाब करने के बाद धेला अवश्य लें और जगह देखकर ही पेशाब करें। रात्रि में सोने से पूर्व भूत-प्रेत पर चर्चा न करें। किसी भी प्राकार के टोने-टोटकों से बच कर रहें।
शरीर की तलाश
हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां हर मोड़ पर इंसानों के भीतर डर और सिहरन पैदा करने के लिए आत्माएं और अन्य शैतानी ताकतें अपना रौब दिखाती रहती हैं. अब आप भले ही इस तथ्य पर यकीन ना करें लेकिन आपकी हर हरकत, हर कदम पर बुरी व अच्छी आत्माओं की नजर रहती है.
यह आत्माएं आपको एक पल के लिए भी तन्हा नहीं छोड़तीं, हां कई बार भीड़भाड़ से बचते हुए वह आपको अकेलेपन में ही अपने होने का एहसास करवाती हैं. ऐसी ही एक घटना से हम आज आपको रुबरू करवाने जा रहे हैं जो कोई कहानी नहीं बल्कि एक आम इंसान के साथ घटित एक खौफनाक घटना है. आज से कुछ 5-10 साल पुरानी है. अशोक नाम का एक व्यक्ति जिसका गांव पूर्वी उत्तर-प्रदेश के एक कस्बाई इलाके में था.
वैसे तो वो दिल्ली में नौकरी करता था लेकिन घर आए हुए काफी समय बीत चुका था इसीलिए छुट्टी लेकर वह घर आया हुआ था. यह इलाका बेहद सुनसान और घनी झाड़ियों के बीच बसा हुआ था और इन घनी झाड़ियों की बीच शाम के समय अकसर सन्नाटा ही पसरा रहता था. अशोक को बचपन से ही छत पर सोने की आदत थी और बड़े होने के बाद जब भी वह गांव जाता तो अपने घर की खुली छत पर ही सोता था.
लेकिन एक रात छत पर सोना ही उसके लिए महंगा साबित हुआ क्योंकि यह वो रात थी जब उसका सामना एक ऐसे साये से हुआ जो नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से उसके पास तो आया लेकिन अशोक की सूझबूझ की वजह से वह उसका बाल भी बांका नहीं कर सका. रात का करीब एक बजा था कि अचानक किसी आवाज ने अशोक की नींद खोल दी. वह अपनी चारपाई से उठ कर छत की रेलिंग के पास जाकर आसपास देखने लगा.
उसे अपने घर से थोड़ी ही दूर पर किसी साये को इधर-उधर घूमते हुए देखा, छोटा सा कस्बाई इलाका था उसे लगा शायद कोई अपने घर से बाहर आया होगा. वह वापिस जाकर चारपाई पर लेट गया. उसे फिर कुछ आवाज सुनाई दी लेकिन इस बार आवाज थोड़ी ज्यादा पास से आ रही थी. वह फिर उठा और छत से नीचे देखने लगा. उसे अपने घर के पास ही एक साया दिखाई दिया लेकिन खौफनाक बात यह थी कि वह सिर्फ साया था उसका शरीर नहीं था.
इतने में उसे सीढ़ियों पर किसी के बहुत ही तेजी के साथ चढ़ने की आवाज सुनाई दी. 1 मिनट से भी कम समय में वह साया उसकी नजरों के सामने खड़ा था. उसकी शक्ल, हाथ-पैर कुछ भी नहीं था, अगर कुछ था तो वह सिर्फ एक सफेद साया जो धीरे-धीरे अशोक की तरफ बढ़ता जा रहा था. कहते हैं बुराई को काटने के लिए अच्छाई का ही सहारा लिया जाता है इसीलिए उस साये से खुद को बचाने के लिए उस समय अशोक ने कवच कीलक अर्गला मंत्र का जाप करना शुरू कर दिया.
वह लगातार 5 मिनट तक यह जाप करता रहा और वह साया उनके पास आता रहा. अचानक ही वह साया अंतरध्यान हो गया. वह हवा था और एक दम से हवा में बहकर गायब हो गया. वह कहां गया, कहां से आया था कुछ पता नहीं चला लेकिन कुछ समय जब तक वह साया अशोक के सामने रहा उन चंद लम्हों ने अशोक के हाथ-पांव फुला दिए थे.
ऐसे स्थान जहां खतरनाक और दुष्ट आत्माएं केद हैं
भूत-प्रेत से जुड़ा कोई भी लेख, कहानी या फिर फिल्म इंसानी मस्तिष्क को सबसे पहले और सबसे ज्यादा आकर्षित करते हैं लेकिन सच यही है कि इस पर तब तक विश्वास नहीं किया जा सकता जब तक कि कोई इन्हें अपनी आंखों से ना देख ले या फिर कोई इन्हें महसूस ना कर ले. ऐसा ही कुछ तथ्य भूत बंगलों से जुड़ा हुआ है जिस पर वो व्यक्ति कभी विश्वास नहीं करता जिसने वहां मौजूद पारलौकिक शक्तियों का अनुभव ना किया हो. आज हम आपको ऐसे ही कुछ विश्व प्रसिद्ध हॉंटेड हाउस के बारे में बताएंगे जिनके भीतर बुरी आत्माओं का वास तो है लेकिन जहां कुछ लोग इसे सिर्फ मनगढ़ंत कहानी मानते हैं तो कुछ इन जगहों का नाम सुनकर भी कांप जाते हैं
बहामपीसाज व हिमालय संत
रमेसर बाबू अपने कार्यालय में अपनी सीट पर बैठकर फाइलों को उलट-पलट रहे थे। उनका कार्यालय ग्रामीण क्षेत्र में था जहाँ जाने के लिए कच्ची सड़कों से होकर जाना पड़ता था। अरे इतना ही नहीं, कार्यालय के आस-पास में जंगली पौधों की अधिकता थी, कहीं कहीं तो ये जंगली पौधे इतने सघन थे कि एक घने जंगल के रूप में दिखते थे। कार्यालय के मुख्य दरवाजे को छोड़ दें तो बाकी हिस्से पूरी तरह से घाँस-फूँस आदि से ढंके लगते थे। कार्यालय के कमरों की खिड़कियों आदि पर लंबे-लंबे घास-फूँसों का साम्राज्य था। दिन में भी कार्यालय में एक हल्का अंधकार पसरा रहता था, जिससे ऐसा लगता था कि यह कार्यालय हरी-भरी वादियों में शांत मन से बैठा हुआ किसी गहरे चिंतन में डूबा हुआ हो। क्योंकि इस कार्यालय में कुल कर्मचारियों की संख्या मात्र 5 ही थी जिसमें से एक रामखेलावन थे, जो चपरासी के रूप में यहाँ अपनी सेवा दे रहे थे। रामखेलावन ही वह व्यक्ति थे जिनके कार्य-व्यवहार से यह शांत कार्यालय कभी-कभी मुखर हो उठता था और कर्मचारियों की हँसी-ठिठोली से जाग उठता था।
रामखेलावन जी, पास के ही एक गाँव के रहने वाले थे और प्रतिदिन कोई न कोई असहज घटना कार्यालय के बाकी 4 कर्मचारियों को सुनाया करते थे। वे विशेषकर जब भी कार्यालय में प्रवेश करते तो सबसे पहले रमेसर बाबू के कमरे में जाते और राम-राम कहने के साथ ही शुरू हो जाते कि बाबू कल तो गाँव में गजब हो गया था। रमदेइया को जंगल में चुडैल ने पकड़ लिया था तो मनोहर का सामना एक भयानक भूत से हो गया था। जबतक रामखेलावन जी सभी कर्मचारियों से मिलकर कुछ भूत-प्रेत, गाँव-गड़ा की बातें नहीं बता लेते, उन्हें कल (चैन) नहीं पड़ता था। कोई कर्मचारी रामखेलावन की बातों को सहजता से सुनता तो कोई केवल हाँ-हूँ करके उस ओर कान नहीं देता और उन्हें स्टोप जला कर चाय बनाने के लिए कह देता या पानी की ही माँग करके उनसे बचने की कोशिश करता। पर रामखेलावन की बातों को रमेसर बाबू बहुत ही सजगता से सुनते और पूरा ध्यान देते हुए बीच-बीच में हाँ-हूँ करने के साथ कुछ सवाल भी पूछते। एक दिन की बात है, रामखेलावन जी कार्यालय थोड़ा जल्दी ही पहुँच गए और सीधे रमेसर बाबू के कमरे में घुस गए। पर उस समय रमेसर बाबू अपनी कुर्सी पर नहीं थे, शायद वे अभी कार्यालय पहुँचे ही नहीं थे।
रामखेलावन थोड़ा डरे-सहमे लग रहे थे और बार-बार अपने माथे पर आ रहे पसीने को गमछे से पोछ रहे थे। वे ज्यों ही कमरे से बाहर निकले त्यों ही कार्यालय के प्रांगण में उन्होंने रमेसर बाबू को अपनी साइकिल को खड़े करते हुए देखा। वे दौड़कर रमेसर बाबू के पास पहुँच गए और बिना जयरम्मी किए ही हकलाकर, घबराकर बोले, - बाबू, बाबू! कल रात को तो गजब हो गया। मेरा पूरा परिवार आफत में आ गया है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूँ? - रमेसर बाबू ने उन्हें अपने कमरे की ओर चलने का इशारा करते हुए आगे-आगे तेज कदमों से अपने कार्यालय-कक्ष में प्रवेश किए। फिर एक कुर्सी पर रामखेलावन जी को बैठने का इशारा करते हुए अपने झोले को वहीं मेज पर रखकर एक गिलास में पानी लेकर कक्ष के बाहर आकर हाथ-ओथ धोए। उसके बाद कमरे में लगे हनुमानजी की फोटो को अगरबत्ती दिखाने के बाद अपनी कुर्सी पर बैठते हुए रामखेलावनजी से बोले, - रामखेलावनजी, अब अपनी बात पूरी विस्तार से बताइए। - उनकी अनुमति मिलते ही रामखेलावनजी कहना शुरू किए, - बाबू, कल मैं जब शाम को घर पर पहुँचा तो पता चला की मेरी बहू कुछ लकड़ी आदि की व्यवस्था करने जंगल की ओर गई थी और वहीं उसे किसे चुड़ैल ने धर लिया था। वह इधर-उधर जंगल में भटक रही थी तभी कुछ गाँव के ही गाय-बकरी के चरवाहों की नजर उस पर पड़ी।
वे लोग स्थिति को भाँप गए और मेरी बहू को पकड़कर घर पर छोड़ गए। फिर गाँव के ही सोखा बाबा ने झाँड़-फूँक की उसके बाद उस चुड़ैंल से छुटकारा मिला। पर आज सुबह फिर से उस पर चुड़ैल हावी हो गई है, सुबह से ही सोखा बाबा उसे उतारने में लगे हैं, पर वह छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं? - रामखेलावन की बातों को सुनकर रमेसर बाबू थोड़े गंभीर हुए और अचानक पता नहीं क्या सूझा कि हँसने लगे। रमेसर बाबू की यह हालत देखकर रामखेलावनजी तो और भी हक्के-बक्के हो गए। उन्हें समझ में नहीं आया कि आखिर इनको क्या हो गया, कहीं इनपर भी तो किसी भूत-प्रेत का साया नहीं पड़ गया? अभी रामखेलावनजी यही सब सोच रहे थे तभी रमेसर बाबू अपनी कुर्सी पर से उठे और बिना कुछ बोले रामखेलावन को अपने पीछे आने का इशारा करते हुए कमरे से बाहर निकल गए। कमरे से बाहर निकल कर रमेसर बाबू पास की ही एक झाँड़ी से कुछ पत्तों को तोड़ा और मन ही मन कुछ मंत्र बुदबुदाए फिर रामखेलावन को उन पत्तों को देते हुए बोले कि आप इसे पीसकर अपनी बहू को पिला दें, और अपने घर पर ही रूकें। मैं कार्यालय में कुछ जरूरी काम-काज निपटाकर अभी 1-2 घंटे में आपके घर पर पहुँचता हूँ। रामखेलावनजी बिना कुछ बोले, केवल सिर हिलाए और उन पत्तों को लेकर घर की ओर बढ़ें। रास्ते में उन्हें केवल एक ही बात खाए जा रही थी कि रमेसर बाबू को यहाँ आए 3 साल हो गए पर कभी उन्होंने इस बात का जिक्र नहीं किया कि वे भूत-प्रेतों को उतारना भी जानते हैं। कहीं वे मजाक में तो इन पत्तों को तोड़कर, झूठ-मूठ में कुछ बुदबुदाकर मुझे नहीं दे दिए?
पर रमेसर बाबू ऐसा नहीं कर सकते, वे तो बहुत गंभीर आदमी हैं, और हमारी सारी बातों को भी तो बहुत गंभीरता से लेते हैं और समय-समय पर हर प्रकार से हमारी मदद भी तो करते रहते हैं। ना-ना, वे मेरे साथ मजाक नहीं कर सकते। यही सब सोचते-सोचते रामखेलावनजी घर पर पहुँच गए। घर के बाहर 10-15 गाँव-घर के ही लोग बैठे नजर आए। एक खटिया पर सोखा बाबा भी बैठकर लोगों से कुछ बात-चीत कर रहे थे। रामखेलावनजी को देखते ही सोखा बाबा बोल पड़े, - रामखेलावन, यह चुड़ैल तो बहुत ढीठ है, रात को छोड़ तो दी थी पर सुबह फिर से आ गई। 2-3 घंटे मैंने कोशिश किया पर छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है, अभी भी आंगन में नाच-कूद रही है। मेरे मंत्रों का अब तो उस पर कुछ असर भी नहीं हो रहा है, यहाँ तक कि मेरा भी मजाक उड़ा दी। इतना सब होने के बाद मैं उसे छोड़कर बाहर आकर बैठ गया हूँ। मैं अब कुछ नहीं कर सकता। मेरा जितना पावर था, वह सब अजमा लिया। - रामखेलावनजी सोखा बाबा के ही बगल में बैठते हुए अपनी लड़की को आवाज लगाए, उनकी लड़की घर में से दौड़ते हुए बाहर निकली। फिर रामखेलावनजी ने उन पत्तों को उसे देते हुए कहा कि अभी इसे पीसकर बहू को पिला दो। अगर ना-नूकर करती है तो जबरदस्ती पिलाओ। इसके बाद रामखेलावन की लड़की उन पत्तों को लेकर घर में गई तथा उन पत्तों को पीसकर अपनी भाभी को पिलाई।
अरे यह क्या, एक घूँट अंदर जाते ही रामखेलावन जी की बहू तो काफी शांत हो गई और वहीं आंगन में ही एक तरई पर बैठ गई। अब उसके व्यवहार में काफी अंतर आ गया था। उसका कूदना-नाचना बंद हो गया। रामखेलावनजी की लड़की दौड़ते हुए घर में बाहर निकली और रामखेलावनजी की ओर देखकर बोली, - बाबू, बाबू! भउजी को अब आराम हो गया है, वे आंगन में ही अब शांति से बैठ गई हैं। - बाहर जितने लोग बैठे थे, वे सब हतप्रभ हो गए। आखिर जो चुड़ैल इतने बड़े सोखा से बस में नहीं आई, वह दो-चार पत्तों को पिलाने से कैसे बस में आ सकती है? आखिर वे कैसे पत्ते थे? क्या किसी धर्म-स्थान से लाए गए थे या किसी बहुत बड़े पंडित, ओझा, सोखा आदि ने दिए थे? वहाँ बैठे लोगों में से एक ने रामखेलावनजी की ओर देखा पर कुछ बोले इससे पहले ही रामखेलावनजी ने उन पत्तों के बारे में बता दिया। सभी लोग बिन देखे उस रमेसर बाबू के प्रति नतमस्तक हो गए। सोखा बाबा ने कहा कि वास्तव में आपके रमेसर बाबू तो बहुत पहुँचे निकले। जिस चुड़ैल को बस में करने के लिए मैंने सारे के सारे हथकंडे अपना लिए, उसे उनके मंत्रित दो-चार पत्तों ने बस में कर लिया। फिर तो रामखेलावनजी थोड़ा तन कर बैठ गए और लगे रमेसर बाबू का गुणगान करने।
अभी वे लोग आपस में बात कर ही रहे थे तभी रमेसर बाबू की साइकिल वहाँ रूकी। रमेसर बाबू को देखते ही रामखेलावनजी दौड़कर रमेसर बाबू के हाथ से साइकिल लेकर खुद ही खड़ी करते हुए बोले, रमेसर बाबू, आपके पत्तों ने तो कमाल कर दिया। अब बहू काफी अच्छी है और शांति से आंगन में बैठी है। रमेसर बाबू के इतना कहते ही वहाँ बैठे सभी लोग खड़े हो गए और रमेसर बाबू की जयरम्मी करने लगे। रमेसर बाबू सबका अभिवादन स्वीकार करते हुए उन लोगों के बीच ही एक खाट पर बैठ गए। फिर रमेसर बाबू ने रामखेलावनजी की बहू को घर में बाहर बुलवाया। वह काफी शांत थी पर रमेसर बाबू को लगा कि अभी भी वह चुड़ैल यहीं है और पत्ते का असर खत्म होते ही फिर से इसे जकड़ लेगी। रमेसर बाबू ने रामखेलावनजी की बहू को अपने पास बैठने का इशारा करते हुए कुछ मंत्र बुदबुदाने लगे। अरे यह क्या, रामखेलावनजी की बहू घबराकर बोल उठी, मुझे छोड़ दीजिए, मैं जा रही हूँ, मैं अब कभी भी इसे नहीं पकड़ूँगी। मुझे जाने दीजिए, मुझे जाने दीजिए, मैं जल रही हूँ, मुझे छोड़ दीजिए। उस चुड़ैल को इस तरह गिड़गिड़ाते हुए देखकर रामखेलावनजी की काफी हिम्मत बढ़ गई। वे बोल पड़े, रमेसर बाबू, इसे छोड़िएगा मत। इसे जला कर भस्म कर दीजिए
पर वह चुड़ैल रामखेलावनजी की ओर ध्यान न देते हुए, रमेसर बाबू की ओर दयनीय स्थिति में देखते हुए अपने प्राणों की भीख माँगती रही। रमेसर बाबू काफी गंभीर लग रहे थे। वे रामखेलावनजी की बहू की ओर गुस्से से देखते हुए बोले कि तुम कौन हो और इसे क्यों पकड़ीं? इस पर वह चुड़ैल गिड़गिड़ाते हुए बोली की मैं पास के ही जंगल में रहती हूँ। मैं बंजारा परिवार से हूँ, एकबार हमारे परिवार ने इसी जंगल के बाहर अपना टेंट लगाया था। शाम के समय मैं लकड़ी लेने जंगल में प्रवेश की। मुझे पता नहीं चला कि कब मैं घने जंगल में पहुँच गई और रास्ता भी भटक गई। तब तक रात भी होने लगी थी। जंगल में पूरा अंधेरा पसरना शुरू हो गया था। मैं थोड़ी डर गई थी पर हिम्मत नहीं खोई थी। अचानक मेरे दिमाग में एक विचार आया। मैंने सोचा कि रात के इस अंधेरे में अब रास्ता खोजना ठीक नहीं। कहीं किसी जंगली जानवर की शिकार न हो जाऊँ। इसलिए मैंने हिम्मत करके वहीं एक मोटे जंगली पेड़ पर चढ़कर बैठ गई। मैंने सोचा कि सुबह होते ही मेरे परिवार के लोग जरूर मुझे खोजने आएंगे और अगर नहीं भी आए तो मैं दिन में अपना रास्ता खोज लूँगी। पर वह रात शायद मेरे जीवन की समाप्ति के लिए ही आई थी। मैं जिस पेड़ पर चढ़कर बैठी थी, उसी पर एक प्रेत का डेरा था।
आधी रात तक तो सब कुछ एकदम ठीक-ठाक था पर उसके बाद अचानक वह प्रेत कहीं से उस पेड़ पर आ बैठा। उसके आते ही जैसे पूरे जंगल में भयंकर तूफान आ गया हो। अनेकों पेड़ों की डालियाँ तेज हवा से डरावने रूप से हिलने लगी थीं। मुझे देखते ही वह जोरदार ढंग से अट्टहास किया और मुझे कोई प्रेतनी ही समझ कर बोला कि तुम्हें पता नहीं कि यह मेरा निवास है। मैं कुछ जरूरी काम से जंगल से बाहर क्या गया, तूने मेरे बसेरे पर कब्जा कर लिया।
मैं तूझे छोड़ूँगा नहीं, इतना कहकर वह मेरे तरफ झपटा, अत्यधिक डर से तो मेरी चींख निकल गई। मैं बहुत तेज चिल्लाई की मैं कोई प्रेतनी नहीं हूँ। मैं इंसान हूँ इंसान। मेरी बातों को सुनकर तो वह और जोर से अट्टहास करने लगा और बोला कि मुझे एक संगिनी चाहिए। तुझे अगर सही-सलामत रहना है तो मुझसे विवाह करना होगा। मरता क्या न करता। मैंने सोचा कि अब इस समय बस एक ही रास्ता है कि इसकी बातों को मान लिया जाए और दिन उगने के बाद यहाँ से खिसक लिया जाएगा। मैंने उसके हाँ में हाँ मिलाते हुए अपनी सहमति दे दी। मुझे क्या पता था कि यह सहमति मुझपर बहुत भारी पड़ेगी। इतना कहने के बाद रामखेलावन की बहू पर सवार वह चुड़ैल फूट-फूटकर रोने लगी। रमेसर बाबू थोड़े भावुक हो गए और उसके प्रति थोड़ी नरमी दिखाते हुए पानी भरा लोटा उसको पीने के लिए दे दिए। दो-चार घूँट पानी पीने के बाद उसने फिर से कहना शुरू किया। मेरी सहमति देने के बाद वह प्रेत पता नहीं कहाँ गायब हो गया, उसके गायब होते ही मैंने थोड़ीं चैन की साँस ली पर यह क्या अभी 10-15 मिनट भी नहीं बीते होंगे कि उस जंगल में जैसे भूचाल आ गया हो।
एक बहुत बड़ा तूफान आ गया हो। कितने पेड़ों की पता नहीं कितनी डालियाँ टूटकर धरती पर पड़ गईं। कम से कम सैकड़ों भूत-प्रेत वहाँ उपस्थिति हो गए थे। चारों तरफ चीख-पुकार मचा हुआ था। कुछ डरावनी अट्टहास कर रहे थे तो कुछ इस डाली से उस डाली पर कूद-फाँद रहे थे, तो कुछ ताली बजाकर नाच रहे थे। मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है। तब तक वही प्रेत फिर से मेरे पास प्रकट हुआ और बोला की विवाह की व्यवस्था करने चला गया था। अपने परिवार वालों को बुलाने चला गया था। शादी में इन सबको भी तो शरीक करना होगा। अरे यह क्या अब तो मेरी शामत आ गई। पूरा शरीर पीला पड़ गया। कुछ बोलने की हिम्मत नहीं रही, तभी अचानक एक प्रेतनी वहां प्रकट हुई और उस प्रेत से लड़ने लगी। वह प्रेतनी बोल रही थी कि मेरे रहते तूँ दूसरी शादी करेगा, कदापि नहीं, कदापि नहीं। मैं ऐसा नहीं होने दूँगी और इतना कहने के साथ ही उस प्रेतनी ने उस डाल से मुझे धक्का दे दिया और जमीन पर गिरने के कुछ ही समय बाद मेरी इहलीला समाप्त हो गई थी। इतने कहने के साथ ही वह चुड़ैल फिर से रोने लगी थी। इसके बाद रमेसर बाबू ने उस चुड़ैल को चुप रहने का इशारा करते हुए कहा कि आज के बाद तूँ इन गाँव वालों को कभी परेशान नहीं करोगी। चुड़ैल ने हामी भरते हुए कहा कि ठीक है। पर मैं तो एक बहुत ही छोटी आत्मा हूँ। इन पास के जंगलों में पता नहीं कितनी भयानक-भयानक आत्माएँ विचरण करती हैं। आप उन सबसे इस गाँव वालों को कैसे बचा पाएँगे। उस चुड़ैल की इस बात को सुनते हुए रमेसर बाबू हल्की मुस्कान में बोले। तूँ तो बकस इन लोगों को, बाकी भूत-प्रेतों से कैसे निपटना है, वह तूँ मुझपर छोड़। इसके बाद रमेसर बाबू ने लोगों को अब कभी न पकड़ने की बात उस चुड़ैल से तीन बार कबूल करवाई तथा साथ ही उसे थूककर चाटने के बाद ही जाने दिया। तो पाठकगण, रमेसर बाबू ने उस चुड़ैल से तो गाँव वालों को छुटकारा दिला दिया पर क्या वे दूसरे भूत-प्रेतों से उन गाँव वालों की रक्षा कर पाए?
अभी भी याद आ रहा है, जब मैं अपने गाँव के उस बुजुर्ग पंडीजी से यह कहानी सुन रहा था तो भूत-प्रेत के साथ ही उनकी यात्रा के दौरान विस्मय कर देने वाली बातें तो मुझे एक ऐसी दुनिया की सैर करा रही थीं, जहाँ से मैं बिलकुल हीअनजान था और तब यह सोच भी नहीं सकता था कि ऐसा भी है या ऐसा भी हो सकता है? जी हाँ, घटना घटने के समय हमारे गाँव के वो खमेसर पंडीजी बर्मा (अब म्यांमार) में चीनी मिल में नौकरी करते थे।
आज भी गाँवों आदि में अगर कोई व्यक्ति गाँव से दूर खेतों, बागों आदिमें हो या किसी सुनसान जगह पर हो तो कुछ भी खाने से पहले उस खानेवाले वस्तु का कुछभाग उस जगह पर गिरा (चढ़ा) देता है ताकि उसके सिवा अगर वहाँ कोई है, जैसे कि कोई न दिखने वाला प्राणी, प्रेत आदि तो वह उसे ग्रहण कर ले। गँवई लोग गाँव के बाहर अगर कहीं सूनसान क्षेत्र में होते हैं, या किसी ऐसे क्षेत्र में जहाँ उनको लगता है कि यहाँ आस-पास में कोई अदृश्य आत्मा हो सकती है तो वे लोग जब भी सूर्ती (तंबाकू) बनाते हैं तो खाने से पहले थोड़ा सा उस अदृश्य आत्मा के लिए गिरा (चढ़ा) देते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि अगर सूर्ती नहीं चढ़ाएंगे तो अदृश्य आत्मा नाराज होकर उनको परेशान कर सकती है। सुनी-सुनाई बात बता रहा हूँ, कई बार कितने ग्रामीणों को एकांतमें सूर्ती (तंबाकू) मसलकर बिना चढ़ाए खुद खाने की सजा मिल चुकी है। जी, हाँ आस-पास का प्रेत उन लोगों को कभी-कभी तो पटककर मारा है या बहुत परेशान किया है और कभी-कभी तो ऐसे लोगों को उस खिसियाए भूत से अपनी जान बचाने के लिए सूर्ती का पूरा पत्ता ही चढ़ाना पड़ा है और साथ में लंगोट आदि भी। सूर्ती (तंबाकू) का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ कि इस कहानी का सही सूत्रधार सूर्ती (तंबाकू) ही है, अगर उस समय इस सूर्ती (तंबाकू) ने अपना कमाल नहीं दिखाया होता तो शायद यह कहानी कभी जनम ही नहीं लेती।
चीनी मिल में हमारे गाँव के खमेसर पंडीजी के साथ ही अन्य कई भारतीय भी नौकरी करते थे। एक बार खमेसर पंडीजी ने उस चीनी मिल में काम करने वाले अपने कुछ भारतीय दोस्तों से कहा कि क्यों न हम लोग एक बार हिमालय की यात्रा पर, हिमालय के दर्शन करने के लिए चलें। मुझे बहुत ही इच्छा है कि हिमालय की सैर करूँ, 1-2 हफ्ते हिमालय में रहकर हिमालय वासियों से मिलूँ, उनके रहन-सहन देखूँ और साथ ही अपने दादाजी से बराबर सुनते आया हूँ कि हिमालय में यति (हिममानव) के साथ ही बहुत सारेविलक्षण जीव रहते हैं। उन्होंने आगे कहा कि मैं तो अपने दादाजी से सुन रखा हूँ किहिमालय की कंदराओं में आज भी बहुत सारे संत पूजा-पाठ करते, धूँई रमाए हुए और समाधि में लीन देखे जा सकते हैं। उन्होंने आगे यह भी बताया कि हिमालय में सिद्ध महात्मा लोग रहते हैं, जिनके दर्शनमात्र से सारे मनोरथ पूरे हो जाते हैं। इतना ही नहीं हिमालय में दिव्य औधषियाँ पाई जाती हैं, जिनके दर्शन या स्पर्श मात्र से बड़े-बड़े रोग अपने आप ठीक हो जाते हैं। उन्होंने अपने साथियों को बताया कि कैसे एक बार उनके दादाजी अपने कुछ साथियों के साथ हिमालय में गए हुए थे। उनके एक साथी को कोई असाध्य चर्मरोग था पर पता नहीं हिमालय में उसके पैरों आदि से ऐसी कौन-सी दिव्य औषधि टकरा गई की 2-3 दिन में ही उसका असाध्य चर्म रोग ठीक हो गया। खमेसर पंडीजी की यह अलौकिक बातें सुनकर उनके चार साथी हिमालय की यात्रा के लिए तैयार हो गए।
आज हिमालय भले अतिक्रमण का शिकार हो रहा है, लोग वहां भी गंदगी फैला रहे हैं, उस दिव्य क्षेत्र को प्रदूषित कर रहे हैं पर इस घटना (75-80 साल पहले) के समय हिमालय की दिव्यता, सौंदर्य, स्वच्छता स्वर्गिक आनंद का बोध कराती थी। हिमालय की आबोहवा में सांस लेना अपने आप में स्फूर्तभर देता था, मन में आनंद का संचार कर देता था। मानव कीक्रूरता, स्वार्थ की आलोचना करते समय अक्सर चिंतक, लेखक बहक जाता है, अच्छा हो कि हम लोग सीधे कहानी की ओर चलें नहीं तो कहनी कहानी है, बतानी कहानी है और हम मानव के अमानव रूप का वर्णन करने में लग जाएंगे।
खमेसर पंडीजी अपने चार अनुभवी, बहादुर साथियों के साथ हिमालय की यात्रा पर निकल गए। उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में कई हफ्ते बिताए और बहुत सारी अलौकिक, विस्मयभरी बातें, घटनाएँ देखीं। रोंगटे खड़ी कर देनी वाली यह घटना आज भी मेरे जेहन में वैसे ही मौजूद है जैसे मैंने उन पंडीजी से 20-25 वर्ष पहले सुन रखी है। पंडीजी ने बताया कि एक दिन वे बहुत ही सुबह अपने साथियों के साथ हिमालय के एक छोटे शिखर पर चढ़ रहे थे तो लगभग 300 मीटर की दूरी पर उन लोगों को एक बहुत ही विशाल मानव दिखाई दिया। उन्होंने जैसा कि अपने दादाजी से सुन रखा था कि हिमालय में विशाल मानव जिन्हें यति या हिममानव कहते हैं, घूमते रहते हैं। उन्हें उस विशाल मानव को देखकर बहुत ही कौतुहल हुआ और उन्होंने अपने साथियों से कहा कि हम लोग छिप-छिपकर इस महामानव का पीछा करते हैं और इसके बारे में कुछ बातें पता करते हैं। फिर क्या था उस विशाल मानव का पीछा करने के चक्कर में ये लोग हिमालय की उस पहाड़ी पर कब बहुत ही ऊपर चढ़ गए और लगभग दोपहर भी हो गई, इन लोगों को पता ही नहीं चला। वह विशाल मानव भी बहुत दूर होते-होते कहीं गायब हो गया था या किसी गुफा में प्रवेश कर गया था।
खमेसर पंडीजी के एक साथी ने कहा कि हम लोग काफी ऊपर चढ़ आए हैं औरकाफी समय भी हो गया है। भूख भी सताने लगी है और अत्यधिक प्यास भी, साथ ही हम लोगोंके पास न कुछ खाने को है और न ही पानी ही। फिर क्या था अब वे लोग उस पहाड़ी परपानी की तलाश में, कुछ खाद्य फलों की तलाश में आस-पास भटकने लगे। अचानक उन लोगोंको आभास हुआ कि वे लोग रास्ता भटक गए हैं, यह आभास होते ही सबकी साँस अटक गई। अबक्या किया जाए, किधर जाया जाए। एक पेड़ के नीचे वे लोग बैठकर भगवान से गुहार करनेलगे कि काश कोई आ जाए और उन्हें रास्ता दिखा दे। पर शायद वे लोग गलती से ऐसेक्षेत्र में प्रवेश कर गए थे जहाँ किसी अन्य मनुष्य का नामो-निशान नहीं लग रहा था।धीरे-धीरे शाम भी होने लगी थी और प्यास-भूख से इन लोगों का बहुत ही बुरा हाल होरहा था। दिमाग भी काम करना बंद कर दिया था। अब कोई चमत्कार ही इन्हें बचा सकता था।खैर इनके साथ ही इनके चारों साथी भी बहुत ही हिम्मती थे। उन लोगों ने आपस में एकदूसरे को हिम्मत और धैर्य बनाए रखने के लिए कहा। खमेसर पंडीजी ने कहा कि हमें ईश्वर पर पूरा विश्वास है और जरूर हम लोग इस परेशानी से बाहर निकलेंगे। अचानक इनके एक साथी ने अपनी सूर्ती वाली थैली टटोली और उसमें से सूर्ती निकाल कर उसमें चूना मिलाकर मसलते हुए कहा कि दिमाग काम नहीं कर रहा है तो क्यों न सूर्ती (तंबाकू) का आनंद लिया जाए। इतना कहकर वह सूर्ती को मसलने लगा। सूर्ती को मसलने और थोंकने के बाद परंपरानुसार, अपनी आदत अनुसार उसने अपने साथियों को सूर्ती देने से पहले थोड़ी सी सूर्ती वहां यह कहते हुए गिरा दिया कि जय हो यहाँ के भूत-प्रेत, बाबा आदि। कृपया ग्रहण करें और हम लोगों की भूल को क्षमा करते हुए हमें राह दिखाएँ, हमें घर पहुँचाएँ।
जी हाँ, उस चढ़ाई हुई सूर्ती ने अपना काम कर दिया। अचानक वहाँ बहुत ही भयानक और तीव्र हवा चली, आस-पास के छोटे-छोटे पेड़ अजीब तरह से एक दूसरे से टकराए और एक विशाल भूतकायाप्रकट हो गई। वह काया देखने में तो इंसान जैसी ही थी पर आकार-प्रकार में एकदम अलगजो उसके प्रेत होने की पुष्टि कर रही थी। खमेसरजी और उनके साथी डरे नहीं अपितु हाथजोड़कर अभिवादन की मुद्रा में उस विशाल काया की ओर देखने लगे। खमेसरजी और उनका कोई साथ कुछ बोले इससे पहले ही वह विशाल काया तड़प उठी। बहुत दिनों के बाद कुछ खाने को मिला है। तुम लोगों का मैं शुक्रगुजार हूँ। इसके बाद उस विशाल काया ने कहा कि मुझसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैं इस क्षेत्र में चाहकर भी किसी का नुकसान नहीं पहुँचा सकता।
इसके बाद वह प्रेत काया वहाँ से जाए इससे पहले ही खमेसर पंडीजी ने कहा कि हे भूतनाथ! हम लोग रास्ता भटक गए हैं, कृपया हमें नीचे तक बस्ती में जाने का मार्ग बताएँ। खमेसर पंडीजी की बात सुनकर वह प्रेत पहले तो हँसा पर फिर अचानक गंभीर हो गया। उसने कहा कि मैं तो खुद ही भटक गया हूँ। सालों हो गए, इस क्षेत्र से निकलने की कोशिश कर रहा हूँ पर खुद ही नहीं निकल पा रहा हूँ। उसने आगे कहा कि मैं ब्राह्मण हूँ। बहुत पहले इस क्षेत्र में आया था। एक गुफा में एक महात्मा की सेवा में लग गया था क्योंकि मुझे सिद्धियाँ प्राप्त करनी थीं। एक दिन मुझसे एक घिनौना अपराध हो गया। मैंने महात्माजी के समाधि में जाने के बाद धीरे से उठा और उस गुफे के बाहर आ गया। गुफे से बाहर आने के बाद अपनी थोड़ी सी शक्ति जो मुझे प्राप्त हुई थी उसके बल पर आस-पास अपने तपोबल से नजर दौड़ाई। मुझे पास में ही किसी भूतनी केहोने का आभास हुआ। मैंने अपनी शक्ति से उसे अपनी ओर खींच लिया और उसे एक सुंदरयुवती में परिवर्तित कर दिया। फिर मैं उसके साथ विहार करने लगा। मैं विहार मेंइतना लीन था कि मुझे पता ही नहीं चला कि मेरे महात्मा गुरुजी मेरे पास आ गए हैं।अचानक मुझे भान हुआ कि मेरे गुरुजी गुस्से में जल रहे हैं। मैं काँपने लगा और इशारे में उस भूतनी को भागने के लिए कहा। कुछ बोलूँ इससे पहले ही मेरे गुरुजी बोल होते, “नीच ब्राह्मण! तूने ब्राह्मण का, तपोशक्तियों का अनादर किया है। तूँ जीने का अधिकारी नहीं। मैं तूझे श्राप देता हूँ कि तूँ भी मनुष्य योनि त्यागकर प्रेत हो जा।” गुरुजी के इतना कहते ही मेरा शरीर जलने लगा और मैं कुछ कर पाता इससे पहले ही मनुष्य योनि त्यागकर प्रेत योनि में आ गया था। इसके बाद गुरुजी ने कहा कि तूँ आस-पास के क्षेत्र में ही भटकता रहेगा और अपने किए की सजा भुगतता रहेगा और इतना कहकर गुरुजी गुफा में प्रवेश कर गए। फिर मैंने कई बार सोचा कि गुफा में जाकर अपने गुरु से क्षमा माँगू पर जब भी उस गुफा की ओर बढ़ने की कोशिश करता हूँ, शरीर जलने लगती है और कोई बड़ी शक्ति मुझे गुफा में प्रवेश नहीं करने देती।
इसके बाद उस ब्रह्मपिशाच ने कहा कि शायद आप लोग गुफा में प्रवेश कर जाएँ। उसने कहा कि अगर आप लोग गुफा में प्रवेश कर जाएंगे तो आप लोगों की जान अवश्य बच जाएगी, क्योंकि गुफा में बहुत सारे सिद्ध, अतिसिद्ध महात्मा रहते हैं, वे लोग अपने तपोबल से आप सबको नीचे बस्ती में पहुँचा सकते हैं। इसके बाद उस ब्रह्मपिशाच ने कहा कि निडर होकर मेरे साथ आइए, मैं गुफा का द्वार दिखाता हूँ। फिर क्या था बिना कुछ बोले या दिमाग पर जोर डाले हम लोग उस प्रेत के पीछे हो लिए। कुछ दूर चलने के बाद हमें कुछ ऊँचाई पर एक गुफा की आकृति दिखी। उस प्रेत ने बताया कि थोड़ा ऊपर जो एक छेद दिख रहा है, आप लोग उससे गुफा में प्रवेश करने की कोशिश करें। हम सभी लोग उस प्रेत की बात सुनकर हतप्रभ हो गए। हम लोग कोई छोटे-मोटे जीव, साँप, बिल्ली आदि हैं क्या कि इस पतले छेद से अंदर जा पाएंगे? शायद वह ब्रह्मप्रेत हमारे मन की बात जान गया। उसने अट्टहास किया औरबोला, अरे डरिए मत। यह अलौलिक द्वार है। अगर आप लोगों ने थोड़ा भी पुन्य किया है, या अच्छे इंसान होंगे तो इस पतले छेद के पास पहुँचकर प्रार्थना करने पर, नमस्कार करने पर यह छेद अपने आप आप लोगों को मार्ग दे देदा यानी बड़ा-चौड़ा हो जाएगा। हम साथियों ने इशारे ही इशारे में एक दूसरे की सहमति लेकर उस पतले छेद के पास पहुँचे। फिर क्या था, हम लोग झुककर उस छेद को प्रणाम किए। अरे यह क्या चमत्कार हो गया और वह पतला छेद एक बड़े आकार में बदल गया। फिर हम लोगों ने उस प्रेत महानुभाव को नमस्कार व विदा करते हुए उस गुफा में प्रवेश कर गए।
अनोखी, अद्भुत, अलौकिक, स्वर्गिक गुफा। जिसका वर्णन हो ही नहीं सकता। गुफा में हम लोग ज्यों-ज्यों अंदर बढ़ते गए, हम लोगों की थकावत, डर छूमंतर होते गए। एक ऐसा आनंद जो शायद आनंद की पराकाष्ठा हो। अब भले हम लोगों के साथ जो भी पर हमारा मनुज जन्म सफल हो गया था। हम लोगों को इस बात का भी गर्व हो रहा था कि वास्तव में हम लोग अच्छे इंसान हैं, तभी तो इस गुफा ने हमें अंदर आने के लिए मार्ग दे दिया।
खैर मैं (प्रभाकर पांडेय) भी अब इस अनोखी, रहस्यमयी, सभी सुखों को देने वाली, दिव्य गुफा में रहना चाहता हूँ और परमानंद की प्राप्ति करना चाहता हूँ। मैं ऐसा करूँ इससे पहले मेरा फर्ज यह भी है कि मैं अपने पाठक महानुभावों के लिए इस कहानी को पूरा करूँ।
गुफा में और कुछ अंदर जाने पर अचानक इन लोगों को रुकना पड़ा। क्योंकि सामने से इन्हें जंगली हिंसक पशु आते हुए दिखाई दे रहे थे तो कभी उफनती नदी इन्हें बहा ले जाने का प्रयास कर रही थी तो कभी प्रज्ज्वलित आगे बढ़ती अग्नि इन्हें जलाने का पर यह सब माया जैसा ही लग रहा था क्योंकि न वे हिंसक पशु इन्हें नुकसान पहुँचा रहे थे और ना ही नदी इन्हें भिगो रही थी और ना ही अग्नि इन्हें जला रही थी। इस हिम्मती दल ने हिम्मत दिखाई और आगे बढ़ना जारी रखा। कुछ दूर और आगे जाने पर एक महात्मा दिखे। जिनका शरीर दिव्य था। पूरे शरीर से आभा निकल रही थी, मस्तक सूर्य जैसा चमक रहा था, चेहरे पर एक अतुल्य, रहस्यमय मुस्कान तैर रही थी और वे दिव्य महात्मा धीरे-धीरे चहलकदमी कर रहे थे। हम लोग सहम गए और हाथ जोड़कर जहाँ थे वहीं खड़े हो गए। फिर क्या हुआ कि उस दिव्य महात्मा ने हमें और अंदर आने के लिए कहा और बिना कुछ बोले गुफा में एक तरफ बैठ जाने का इशारा किया। उस गुफा की सबसे रहस्य, अलौकिक बात यह थी कि जिस किसी को जितनी जगह चाहिए थी, वह अपने आप मिल जाती, बन जाती थी। अरे यह क्या, ज्योंही हम लोग बैठने लगे, पता नहीं कहाँ से हमारे बैठने वाली जगह पर खूबसूरत व आरामदायक बिस्तर बिछ गए। फिर उस महात्मा की सौम्य आवाज सुनाई दी, “मनुज श्रेष्ठ! लगता है कि आप लोग रास्ता भटक गए हैं और काफी देर से परेशान हैं। आप लोगों को भूख और प्यास भी खूब लगी है। आप लोगों को रास्ता बताने से पहल हमारा यह भी कर्तव्य बनता है कि आप अतिथियों की सेवा करूँ।” इतना कहने के बाद उस महात्माजी ने वहीं पास में उगी तुलसी माता के कुछ पत्तों को तोड़ा और हम पाँचों के सामने एक-एक रख दिए। फिर क्या था, एक नया, रहस्यमयी चमत्कार। मिनटों नहीं लगे उस तुलसी पत्ते को थाली-गिलास-स्वादिष्ट व्यंजनों में तब्दील होने में। सब से अनोखी बात यह थी कि हम सबके थाली में अलग-अलग व्यंजन थे यानि हमारे मन में उस समय जो खाने की इच्छा हो रही थी, उन्हीं व्यंजनों से हम लोगों की थाली भरी पड़ी थी। फिर क्या था उस दिव्य महात्मा का आदेश मिलते ही हम लोगों ने छक-छककर उस दिव्य प्रसाद का आनंद उठाकर पूरी तरह से तृप्त हो गए।
कमरा 999
एक उजाड़ शहर के मध्य में एक लंबे समय से परित्यक्त होटल था जिसे केवल "द क्रिमसन मैनर" नाम से जाना जाता था। स्थानीय लोग दबे स्वर में उस बुराई के बारे में बात करते थे जो कभी वहां रहती थी, गायब हुए मेहमानों और रहस्यमय ढंग से गायब होने की कहानियां फुसफुसाते हुए। इस भयानक इमारत के भीतर कई प्रेतवाधित कमरों में से, कमरा 999 को उन सभी में सबसे अधिक शापित कहा जाता था।
अफवाहों के पीछे की सच्चाई को उजागर करने के लिए उत्सुक, बहादुर युवा रोमांच-चाहने वालों के एक समूह ने एक भयानक रात में प्रेतवाधित होटल में जाने का फैसला किया। उनके निडर नेता, एलेक्स, यह साबित करने के लिए दृढ़ थे कि कहानियाँ अंधविश्वास के अलावा और कुछ नहीं थीं।
जैसे ही समूह ने चरमराते दरवाज़ों के माध्यम से कदम रखा, हवा में एक दमनकारी माहौल भर गया। प्राचीन लकड़ी के फर्श हर कदम पर कराहने लगते थे, मानो उन्हें पीछे मुड़ने की चेतावनी दे रहे हों। अपनी बेचैनी को नजरअंदाज करते हुए, वे परित्यक्त गलियारों का पता लगाने के लिए आगे बढ़े, उनकी फ्लैशलाइटें खस्ताहाल दीवारों पर भयानक छाया डाल रही थीं।
वे कक्ष 999 में पहुँचे, एक दरवाज़ा अजीब प्रतीकों और सूखे खून के धब्बों से ढका हुआ था। ऐसा लग रहा था कि इसके चारों ओर की हवा ठंडी हो गई है, और समूह झिझक रहा था, यह महसूस करते हुए कि अंदर कुछ द्वेषपूर्ण छिपा है। लेकिन जिज्ञासा और साहस ने उन्हें आगे बढ़ाया, और एलेक्स ने प्रत्याशा की कंपकंपी के साथ घुंडी घुमा दी।
अंदर, कमरे में हल्की रोशनी थी, धूल भरी नाइटस्टैंड पर एक टिमटिमाती मोमबत्ती थी। हवा क्षय की गंध से भारी थी, और दीवारें भयानक चित्रों से सजी हुई थीं जो उन्हें हर कोण से देख रही थीं। दीवार पर लगे एक दर्पण में उनके डरावने भाव प्रतिबिंबित हो रहे थे, लेकिन कुछ गड़बड़ थी - उनके प्रतिबिंब मुड़े हुए और विकृत दिख रहे थे।
जैसे-जैसे समूह ने आगे खोजबीन की, अजीब घटनाएँ सामने आने लगीं। उन्होंने असंबद्ध फुसफुसाहट, ठंडी हँसी और पीड़ा भरी चीखों की धीमी गूँज सुनी। उनकी फ्लैशलाइटें टिमटिमाती रहीं, जिससे वे रुक-रुक कर अंधेरे में चले गए। उनके दिलों में दहशत घर करने लगी और उन्हें एहसास हुआ कि वे कमरा 999 में अकेले नहीं हैं।
घुसपैठियों पर प्रहार करते हुए एक द्वेषपूर्ण उपस्थिति ने स्वयं को प्रकट किया। वस्तुएँ बिना किसी स्पष्टीकरण के कमरे में उड़ गईं, और तापमान गिर गया, जिससे फर्श पर बर्फ जमा हो गई। एक-एक करके, समूह के सदस्य गायब होने लगे, उनकी भयभीत चीखें शून्य में लुप्त हो गईं।
समूह के अंतिम शेष सदस्य एलेक्स ने बाहर निकलने का रास्ता खोजने के लिए संघर्ष किया। लेकिन ऐसा लग रहा था कि कमरा 999 बदल गया है और उसका लेआउट बदल गया है, जिससे बचना असंभव हो गया है। जैसे ही उस पर निरंतर भय का साया मंडराने लगा, उसकी नजर फर्श के नीचे छिपी एक डायरी पर पड़ी। यह एक पूर्व अतिथि का था जो कई साल पहले कमरे में रुका था।
डायरी में एमिली नाम की एक महिला की दुखद कहानी सामने आई, जिसने होटल में शरण ली थी, लेकिन एक क्रूर और अंधेरे अनुष्ठान का शिकार हो गई। उसकी बेचैन आत्मा अब कमरा 999 में फंस गई थी, जो उसकी शांति को भंग करने का साहस करने वाले किसी भी व्यक्ति से बदला लेना चाहती थी। एलेक्स को एहसास हुआ कि एमिली की पीड़ित आत्मा को मुक्त करने का एकमात्र तरीका उसके दर्द का सामना करना और अतीत की गलतियों को सुधारना है।
कांपते हाथों से, उसने कमरे के चारों ओर मोमबत्तियाँ जलाईं, खुद को टिमटिमाती लपटों के घेरे में घेर लिया। तापमान बढ़ गया, और छाया से एक भूतिया आकृति उभरी - एमिली की आत्मा। जैसे ही वह एलेक्स पर अपना क्रोध प्रकट करने की तैयारी कर रही थी, उसकी आँखें क्रोध और दुःख से चमक उठीं।
लेकिन भागने के बजाय, एलेक्स ने सहानुभूति और दुःख के शब्द बोले, उसकी पीड़ा को स्वीकार किया और उसे शांति पाने में मदद करने का वादा किया। धीरे-धीरे, एमिली का गुस्सा कम हो गया और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने अपनी पीड़ा के पीछे की सच्ची कहानी और जीवन में अपने द्वारा सहे गए अन्याय का खुलासा किया।
नई समझ के साथ, एलेक्स ने एमिली की कहानी को दुनिया के सामने प्रकट करने की कसम खाई, यह सुनिश्चित करते हुए कि उसकी स्मृति का सम्मान किया जाएगा और उसके उत्पीड़कों को उजागर किया जाएगा। जैसे ही भोर की पहली किरणें जीर्ण-शीर्ण खिड़कियों से बाहर निकलीं, एमिली की आत्मा को अंततः सांत्वना मिली और वह ऊपर चली गई, और अपने पीछे एक ऐसा कमरा छोड़ गई जो अब शापित नहीं होगा।
कमरा 999 खाली रहा, जो अतीत की एक गंभीर याद है। लेकिन शहर की किंवदंतियाँ धीरे-धीरे ख़त्म हो गईं, उनकी जगह करुणा और मुक्ति की कहानी ने ले ली। और आज तक, क्रिमसन मनोर खड़ा है, इसके रहस्य ढहती दीवारों के पीछे छिपे हुए हैं, और एक और जिज्ञासु आत्मा का इंतजार कर रहे हैं जो इसके भूतिया अतीत को उजागर करे।
भूतिया मंदिर का रहस्य
पूर्वी भारत के एक प्राचीन गांव में, एक पुराने और भूतिया मंदिर का रहस्यमयी इतिहास है। यह कहानी उसी मंदिर के आसपास घूमती है जो दिखने में भला ही सामान्य था, लेकिन भीतर से उसमें कुछ अलग ही चीज़ें घट रही थीं।
इस कहानी के मुख्य किरदार हैं रजनी, वीर, और सिया। रजनी एक बुद्धिमान और बेवजह डरपोक लड़की है, जिसकी एक विशेष खोज की प्रेरणा उसे भूत प्रेतों से जुड़ी एक पुरानी किताब से मिलती है। वह अपने दोस्त वीर और सिया के साथ भूतिया मंदिर के पीछे के रहस्य को सुलझाने का साहस करती है।
मंदिर में घुसते ही तीखी ठंड, भयानक आवाज़ें और अजीब सी घटनाएं उन तीनों को डराती हैं, लेकिन रजनी के दृढ निश्चय और वीर के साहस के साथ वे आगे बढ़ते हैं। मंदिर के अंदर एक छिपी हुई भूतिया ताकत का सामना करते हुए उन्हें अनदेखे खजाने, अतीत के रहस्य, और प्रेतों की दुनिया का सामना करना पड़ता है।
कहानी में सफलता प्राप्त करने के लिए, उन्हें अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक दूसरे की मदद करने की ज़रूरत होती है। वे धीरे-धीरे भूतिया ताकत के रहस्य का पता लगाते हैं और उसे नियंत्रित करने के लिए एक संयुक्त योजना बनाते हैं।
जबकि रजनी, वीर और सिया अपने रहस्यमय और रोमांचक परीक्षणों से गुजरते हैं, उन्हें स्वयं में भरोसा करना सीखना पड़ता है और यह भी पता चलता है कि कभी-कभी भूत प्रेतों के पीछे के रहस्यमय रूप से हमारे अपने अंदर के भय और डर को जीतना ज़रूरी होता है।
भूतिया मंदिर का रहस्य एक अत्यंत रोमांचक और सफलता की कहानी है, जो दर्शकों को भूत प्रेतों और उनके रहस्यमय दुनिया की रोमांचक दुनिया में खींचती है। कहानी उच्च स्तर के साहित्यिक मूल्य और रहस्यपूर्ण प्रसंगों के साथ, पाठकों का मन मोह लेती है और उन्हें अपने अंदर के साहस को खोजने के लिए प्रेरित करती है।
भूतिया आवास
पूर्वी राजस्थान के एक छोटे से गांव में एक भूतिया आवास था। यह किले के रूप में बना था और इसकी वजह से उस इलाके में लोग नहीं रहना चाहते थे। इसके चारों ओर बनाए गए कई किस्से होते थे जो कहते थे कि वहां भूत प्रेत रहते हैं। लोग इसे एक खौफनाक जगह मानते थे।
इस कहानी के मुख्य किरदार हैं रोहित और आकांक्षा। ये दोनों ही जवान थे और उनके उत्साही भविष्य की परवाह नहीं थी। रोहित एक संवेदनशील और खुले दिल वाले लड़के थे, जबकि आकांक्षा अपने सपनों को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास करने वाली एक दृढ़-निश्चयी लड़की थी।
एक दिन, उन्होंने सुना कि उनके गांव में एक नए भूतिया आवास का खुलने वाला है। लोग कह रहे थे कि उस आवास में भूत-प्रेत रहते हैं और वहां कुछ अनोखी घटनाएं घट रही हैं। इस खबर ने रोहित और आकांक्षा की रूह को छू लिया और उन्हें उस आवास का पता लगाने में दिन रात लग गए।
अंततः, रोहित और आकांक्षा ने एक पुराने पुस्तकालय में एक पुरानी किताब मिली, जिसमें उस भूतिया आवास के बारे में कई किस्से लिखे थे। उन्होंने खुद को उसी पुस्तक में डूबा दिया और उसके विचारों में खो गए।
किस्से कहते थे कि लंबे समय पहले, उस आवास में एक राजा और रानी रहते थे। राजा बड़ा अधुरा महसूस कर रहा था और उसे लगता था कि उसके राज्य को कोई शैतानी शक्ति घेर रही है। एक दिन, एक विद्वान महर्षि आकार्षण के लिए उसके दरबार में आए। महर्षि ने कहा कि उसके राज्य में शैतानी शक्तियों का वास है और उन्हें दूर करने के लिए वह उस भूतिया आवास बनवाए।
राजा ने महर्षि की सलाह मानी और वह आवास बनवा दिया। फिर से उसे आवास में रहने का आनंद मिला और उसके राज्य में खुशियां फिर से विचरण करने लगी।
रोहित और आकांक्षा ने किस्से पढ़ कर आवास की सच्चाई समझी और यह तय किया कि वे भी उस आवास को खोजेंगे और उसके रहस्य को सुलझाएंगे।
दोनों ने मिलकर कई रोचक चीजें पता कीं, भूत प्रेतों से जुड़े कई रहस्य खुले और कुछ अनोखे अनुभव हुए। कहानी में भूतिया आवास के रहस्य के पीछे का सच समझ में आया और रोहित-आकांक्षा ने उसे खत्म कर दिया।
इस कहानी के अंत में, रोहित और आकांक्षा ने दिखाया कि वे भय को मात कर सकते हैं, और अगर उनके दिल में सही इरादे हों तो किसी भी भय का सामना करना संभव है। इस कहानी से सिख मिलती है कि भूत-प्रेतों का असली स्वरूप हमारे अंदर के भय से जुड़ा होता है, जिसे हम सामर्थ्यशाली बनकर पार कर सकते हैं।
ताजमहल का भूतिया राजकुमारी
एक बार की बात है, एक छोटे से गाँव में रहने वाले एक लड़के का नाम राहुल था। राहुल बचपन से ही अजीब और अनोखे चीजों का दीवाना था। वह रोजाना अपने दोस्तों को भूतिया कहानियों से डराने में लगा रहता था। लेकिन खुद भी डरना पसंद करता था। रात के समय जब उसके घर में अंधेरा छा जाता था, तो उसकी रूह कंप जाती थी।
एक दिन, राहुल और उसके दोस्त गोलू और मोलू ने एक वन्डरिंग वुड्स में जाने का प्लान बनाया। वो वन्डरिंग वुड्स कहते थे क्योंकि ये जगह अपने रहस्यमयी और भयानक घटनाओं के लिए प्रसिद्ध थी। जब वे जंगल में पहुंचे, तो वहां की गहरी शोक से राहुल का भय और भी बढ़ गया।
जंगल के भीतर राहुल, गोलू और मोलू ने एक पुरानी खाली हुई हवेली देखी। वे खुद बचपन से भूतिया हवेलियों की कहानियों सुनते आए थे, इसलिए उन्हें वहां जाने में कोई दिक्कत नहीं हुई। धीरे-धीरे, उन्होंने हवेली के अंदर घुसा लिया।
हवेली के अंदर घूमते हुए, वे अपनी जाँच करने लगे। वहां बरसात की आवाज़ थी, और सीने की ठंडक के बावजूद उन्हें एक अजीब सी गर्माहट महसूस हो रही थी। धीरे-धीरे, वे भयभीत होने लगे और वन्डरिंग वुड्स में वापस जाने की सोचने लगे। तभी एक छिपी हुई कमरे से एक भूत निकला और उन्हें देखकर रोने लगा।
राहुल, गोलू और मोलू की आंखें फटी रह गई। वे डर के मारे भागने लगे और हवेली से बाहर निकल आए। जब वे वन्डरिंग वुड्स से बाहर निकले, तो राहुल ने एक नोटिस बोर्ड पर एक सुस्पष्टिकरण पाया।
नोटिस बोर्ड पर लिखा था, "हवेली के अंदर न जाएं, यहां रहने वाले किसी को ख़तरा होता है। यहां कुछ अजीब और रहस्यमयी बातें होती हैं, जिन्हें समझना आपके बस की बात नहीं।"
राहुल, गोलू और मोलू ने वहां से फिर वन्डरिंग वुड्स के बाहर वापसी की और उन्होंने खुद को वहीं अपने गाँव के रसोईघर में पहुँचते देखा, जहां उनके माता-पिता रात का खाना बना रहे थे।
यह रही एक डरावनी और भयानक हॉरर कहानी। जीवन में हमें विचारशील रहना चाहिए क्योंकि अक्सर अनजाने में हमारे सामने कुछ ऐसा आ सकता है जिससे हमें डर लग सकता है। लेकिन हर डरावनी कहानी के बारे में एक बात याद रखना जरूरी है - यह सिर्फ कहानी होती है और हकीकत में ऐसी चीजें नहीं होतीं।
दिल्ली के नजदीक आगरा शहर में विश्वप्रसिद्ध ताजमहल है, जिसे भारत की मुग़ल शासक शाहजहाँ ने अपनी पत्नी मुमताज़ महल की याद में बनवाया था। ताजमहल के सुंदरता को देखकर हर किसी को मोह लेने वाली एक कहानी गूंजती रहती है, लेकिन इस खूबसूरत इमारत के पीछे छिपी एक भयानक रहस्यमयी कहानी भी है।
कई लोगों के अनुसार, रात को जब ताजमहल बिलकुल अंधेरे में ढल जाता है, तो वहां एक प्रेतात्मा घूमती है - राजकुमारी मुमताज़, जिसकी मौत हो गई थी जब वह सिर्फ १९ वर्ष की थी। इसे देखने की बात ज्यादातर लोगों ने रिपोर्ट किया है, जिन्होंने रात को ताजमहल में रहने का अनुभव किया है।
एक बार, एक जुनूनी पत्रकार, विक्रम नाम का, ताजमहल में एक रिसर्च करने का निर्णय लिया। वह रात भर वहां रहने को तैयार था और उसने अपने आस-पास के सभी उपकरणों को साथ लिया था - वीडियो कैमरा, फ़ोटो कैमरा, वॉयस रिकॉर्डर, इलेक्ट्रॉनिक थर्मामीटर आदि।
जब रात को ताजमहल खुला था, विक्रम अकेले ही इसे खोजने के लिए अंदर घुस गया। उसके आगमन के बाद, वह अपने कैमरे से ताजमहल की खूबसूरत चित्रें क्लिक करने लगा। रात के ढलते समय, उसने वॉयस रिकॉर्डर से सिर्फ शांति की आवाज़ रिकॉर्ड की और वीडियो कैमरे के लिए भी कुछ वीडियो शॉट लिए।
धीरे-धीरे विक्रम को नींद आने लगी और वह अपना सूटकेस पकड़कर एक पलंग पर लेट गया। रात बिताने के लिए, वह ताजमहल के बगीचे में एक सुरंग में चला गया था और शांति के साथ खोया हुआ था।
कुछ समय बाद जब वह वापस ताजमहल लौटा, तो वह अपने सूटकेस से उतरकर देखा कि वहां एक हार्ड ड्राइव पड़ा हुआ था। विक्रम हार्ड ड्राइव को चेक करने के लिए उसे अपने कंप्यूटर से जोड़ा और उसमें एक वीडियो फ़ाइल मिली।
जब विक्रम वीडियो देखने लगा, तो उसे बड़ी ही चौंक पड़ी। वीडियो में उसके बिस्तर पर उसकी खुद की तस्वीर दिख रही थी, जिसमें वह सो रहा था, लेकिन वीडियो का तारीक दिन उसी रात का था। वह हिला नहीं पा रहा था और अचानक उसने समझ लिया कि ताजमहल में वह राजकुमारी मुमताज़ के साथ नहीं अकेले था, बल्कि कोई और भी उसके साथ था।
वीडियो के आखिरी पलों में, उसने देखा कि एक अंधेरे सी आँख उसे देख रही थी, जिसके बाद उसकी तस्वीर बिलकुल ही फ़ेड हो गई।
विक्रम को बहुत डर लगा, और वह फ़ोन पर एक राजकुमारी को बताने के लिए तैयार हो गया। राजकुमारी ने उससे कहा कि ताजमहल में कुछ अत्याचार किया गया था और उसे अंधेरे से बचने की कोशिश कर रही थी। राजकुमारी के मारने के बाद, उसकी आत्मा ताजमहल में आँखें खोल रही हैं और उसे इस संसार से आज़ादी पाने की इच्छा है। वह बताने के लिए आई है कि उसके मौत की ज़िम्मेदार उसका एक प्रेमी है, जिसका वह साथ छोड़ने को तैयार नहीं था, और उसी ने उसकी हत्या की थी।
विक्रम को राजकुमारी के विचारों का सामना करना पड़ा, और उसने उसे शांति प्रदान की और उसे यह आश्वासन दिया कि वह राजकुमारी की मौत का रहस्य खुलने में मदद करेगा।
इस घटना के बाद से, विक्रम ने ताजमहल के भूतिया राजकुमारी के रहस्यमयी विचारों को दुनिया के सामने लाने से इनकार कर दिया। लेकिन उसकी रात की वह अनोखी अनुभूति आज भी लोगों को दिलचस्पी और आकर्षित करती है।
चुड़ैल डाकिन की कहानी
शीर्षक: हॉथोर्न हाउस में भूतिया
एक बार एक छोटे, भूले हुए शहर के बाहरी इलाके में स्थित, हॉथोर्न हाउस अतीत के लिए एक वसीयतनामा के रूप में खड़ा था। एक उभरती हुई विक्टोरियन हवेली, इसके हॉल रहस्य और अंधेरे में डूबे इतिहास की फुसफुसाहट को दर्शाते हैं। इन वर्षों में, इसके सताए जाने की अनगिनत कहानियाँ शहरवासियों के बीच फैल गईं, जिससे एक भयावह डर पैदा हो गया जिसने उन्हें इसकी खस्ताहाल दीवारों से दूर रखा।
एक दुर्भाग्यपूर्ण शरद ऋतु में, एमिली नाम की एक जिज्ञासु युवती शहर में आई। हॉथोर्न हाउस से जुड़ी कहानियों से आकर्षित होकर, वह इसके रहस्यों की खोज के आकर्षण का विरोध नहीं कर सकी। एक टॉर्च और अपनी साहसिक भावना से लैस, वह चांदनी रात में परित्यक्त हवेली की ओर बढ़ी।
जैसे ही एमिली हवेली के पास पहुंची, हवा बर्फीली हो गई और एक भयानक हवा के झोंके से पेड़ों में सरसराहट होने लगी। जैसे ही उसने चरमराते दरवाज़ों को धक्का देकर खोला और ऊंचे बगीचे में कदम रखा, उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। घर उसके सामने एक भूत की तरह मंडरा रहा था, इसकी खिड़कियाँ अँधेरी और पूर्वसूचक थीं।
प्रत्येक सतर्क कदम के साथ, एमिली के दिमाग में भूतिया आभास और गूँजती चीखों की छवियाँ उभरने लगीं। उसके डर के बावजूद, एक अज्ञात शक्ति ने उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। वह टूटी हुई पत्थर की सीढ़ियों पर चढ़ गई, और भव्य प्रवेश द्वार जोर से खुला, उसे अंदर आने का इशारा किया।
हवेली का आंतरिक भाग धूल भरे गलियारों और भूले हुए कमरों की भूलभुलैया था। एमिली की टॉर्च ने फीके वॉलपेपर पर भयानक छाया डाली, जिससे विचित्र आकृतियों में जान आ गई जो मंद रोशनी में नाचती हुई प्रतीत हो रही थीं। उसके वजन के कारण फर्श की तख्तियां चरमराने लगीं, जिससे माहौल और तनावपूर्ण हो गया।
जैसे ही उसने आगे खोजबीन की, उसकी नज़र एक पुरानी डायरी पर पड़ी, जिसके पन्ने उम्र के साथ पीले हो गए थे। डायरी हवेली की आखिरी निवासी अमेलिया हॉथोर्न की थी। उनके लेखन में एक पीड़ादायक जीवन और एक दुखद प्रेम संबंध के बारे में बताया गया जिसका अंत विश्वासघात में हुआ। ऐसा लग रहा था कि अमेलिया की पीड़ा दीवारों के भीतर बनी हुई है, और एमिली उसकी उपस्थिति को लगभग महसूस कर सकती थी।
जैसे-जैसे एमिली हवेली के रहस्यों में गहराई से उतरती गई, समय ने अपना अर्थ खो दिया। अनदेखे हाथ उसकी त्वचा से टकराए, और हॉल में हल्की-हल्की फुसफुसाहटें गूँज उठीं। फिर भी, वह निश्चिन्त थी, सत्य को उजागर करने की अतृप्त जिज्ञासा से प्रेरित थी।
घर के सबसे अंधेरे कोने में, एमिली को दशकों से दुनिया से बंद एक छिपा हुआ कक्ष मिला। अंदर, उसे बेहद जीवंत चित्रों का एक संग्रह मिला। प्रजा की निगाहें उसका पीछा कर रही थीं, उनकी निगाहें पीड़ा और निराशा से भरी थीं। कमरे के केंद्र में एक आदमी का आदमकद चित्र था - अमेलिया का खोया हुआ प्यार।
अचानक, पेंटिंग्स जीवंत हो उठीं, उनके वर्णक्रमीय रूप उनके फ्रेम से बाहर निकल रहे थे। एमिली हांफने लगी जब उसने खुद को भूतिया दर्शकों से घिरा हुआ पाया। वे अतीत की पीड़ित आत्माएं थीं, जो अपने साथ हुए अन्याय का प्रतिशोध चाह रही थीं।
घूमते भूतों के बीच अमेलिया की आकृति उभरी। उसने एमिली को खोखली आँखों से देखा और अपनी शाश्वत पीड़ा से मुक्ति की गुहार लगाई। एमिली का दिल हवेली की प्रेतवाधित दीवारों के भीतर फंसी आत्माओं के लिए टूट गया, जो एक दुखद भाग्य का शिकार थीं जिसने उन्हें जीवित रहने के दायरे में कैद कर रखा था।
प्रताड़ित आत्माओं को शांति दिलाने के लिए दृढ़ संकल्पित एमिली ने हॉथोर्न हाउस के काले इतिहास की पहेली को जोड़ना शुरू किया। उसने पीढ़ियों तक फैले धोखे, विश्वासघात और प्रतिशोध के जाल का पर्दाफाश किया। हवेली खोए हुए और प्रतिशोधी लोगों के लिए एक प्रकाशस्तंभ बन गई थी, जो उन्हें अपने द्वेषपूर्ण आलिंगन में खींच रही थी।
साहस और दृढ़ विश्वास के साथ, एमिली ने पीड़ा के चक्र को तोड़ने की कसम खाई। उसने चीजों को सही करने की उम्मीद में, हवेली की दुखद कहानी में शामिल लोगों के वंशजों की तलाश की। जैसे-जैसे उसने सच्चाई को उजागर किया, भयावह अभिव्यक्तियाँ तेज हो गईं, जो उसके संकल्प की परीक्षा ले रही थीं।
जैसे-जैसे दिन रात में बदलते गए, एमिली का विवेक खतरे में पड़ गया। आत्माओं ने उसे ताना मारा, अपनी कड़वाहट और क्रोध से उसे भस्म करने की कोशिश की। लेकिन वह आगे बढ़ती रही, यह जानते हुए कि उसका मिशन मुक्ति और मोक्ष में से एक था।
ऑल हैलोज़ ईव पर आधी रात के समय, एमिली ने अंततः उस दुष्ट शक्ति का सामना किया जिसने आत्माओं को हवेली से बांध दिया था। एक भयानक संघर्ष में, उसे अंधेरे के अवतार का सामना करना पड़ा - उस आदमी की आत्मा जिसने इतने साल पहले अमेलिया को धोखा दिया था।
इच्छाओं की लड़ाई में, एमिली ने प्रेम और क्षमा के साथ द्वेषपूर्ण आत्मा का सामना किया, और उस अभिशाप को तोड़ दिया जिसने उसे और दूसरों को हवेली से बांध दिया था। जैसे ही भोर की रोशनी टूटी खिड़कियों से छनकर आई, आत्माओं को शांति मिली और वे दूर चली गईं, और हॉथोर्न हाउस में एक बार फिर सन्नाटा छा गया।
एमिली प्रेतवाधित हवेली से निकली, अपने अनुभव से हमेशा के लिए बदल गयी। हॉथोर्न हाउस के प्रति शहर का डर धीरे-धीरे कम हो गया क्योंकि कहानियाँ आतंक की कहानियों से मुक्ति और आशा की कहानियों में बदल गईं। और यद्यपि हवेली अतीत का अवशेष बनी रही, इसके भयावह दिन खत्म हो गए थे।
लेकिन कहीं न कहीं, उन भयानक रातों से गुजरे लोगों की दूर की यादों में, अंधेरे का सामना करने की हिम्मत करने वाली बहादुर आत्मा एमिली की कहानी जीवित रहेगी - एक अनुस्मारक कि सबसे भयावह स्थानों में भी, प्रकाश और करुणा हो सकती है अतीत की छाया पर विजय.
क्या सरीर कि तलाश में वो साया भटक रहा है
हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां हर मोड़ पर इंसानों के भीतर डर और सिहरन पैदा करने के लिए आत्माएं और अन्य शैतानी ताकतें अपना रौब दिखाती रहती हैं. अब आप भले ही इस तथ्य पर यकीन ना करें लेकिन आपकी हर हरकत, हर कदम पर बुरी व अच्छी आत्माओं की नजर रहती है. यह आत्माएं आपको एक पल के लिए भी तन्हा नहीं छोड़तीं, हां कई बार भीड़भाड़ से बचते हुए वह आपको अकेलेपन में ही अपने होने का एहसास करवाती हैं. ऐसी ही एक घटना से हम आज आपको रुबरू करवाने जा रहे हैं जो कोई कहानी नहीं बल्कि एक आम इंसान के साथ घटित एक खौफनाक घटना है.
पाकिस्तान के कुछ प्रेतबाधित संस्थान
पाकिस्तान में इस्लामाबाद से 296 किमी और मिंवाली से 50 किमी की दूरी पर स्थित कलाबाघ बाँध और नमक की मिल को पाकिस्तान के सर्वाधिक प्रेतबाधित स्थानों में माना जाता है | यहा के लोगो का मानना है
कि यहाँ मोटे शरीर वाली, नाटी और लम्बे बालो वाली एक महिला वहा से गुजरने वाले लोगो पर हमला कर देती है
मिलिए कावेरी भुत ओर उसके परिवार से
1930 की बात है। एक शाम तीन बजे हम मानकुलम विश्राम घर पहुंचे। मेरे साथ जाफना केन्द्रीय कालेज के मेरे अध्यापक साथी एस0 जी0 मान और सैमुअल जैकब थे। हमारी योजना जंगल में शिकार करने की थी। हमारे गाइड चिनइया हमें जंगल के बारे में ता रहा था। चिनइया के अनुसार जंगल का ऐसा सबसे अच्छा स्थान जंगल के बीच पानी का एक छोटा तालाब था, जोकि नानकुलम से तीन मील दूर स्थित उलूमादू नाम की 'जंगली बस्ती' से लगभग एक मील की दूरी पर था।
लेकिन जब वहां जाने की बात आई, तो चिनइया बोला, ''हम वहां नहीं जा सके। चाहे यह सच है कि वहां बहुत से जानवर हैं, लेकिन हम उनमें से एक को भी नहीं मार सकते क्योंकि उस स्थान की रक्षा 'कादेरी' नाम का भूत कर रहा है। जो भी व्यक्ति उस स्थान का उल्लंघन करता है, उसकी मृत्यु हो जाती है।'' चिनईया उस वक्त अपनी रौ में था। वह बोलता जा रहा था, ''पीपल के दो वृक्ष कादरी और उसकी पत्नी का निवास स्थान हैं। उनके बच्चे भी पास के वृक्षों पर रहते हैं।''
काफी मनाने के बाद चिनइया हमें वह जगह दूर से दिखाने के लिए राजी हो गया। लेकिन इसके लिए उसने दो शर्ते रखीं। पहली यह कि हम बंदूकें लेकर वहां नहीं जाएंगे, दूसरी यह कि वहां जाने से पहले हम लोगों को एक टोटका करना होगा। हमारे पास भूतों के परिवार को देखने के लिए और उसका कहना मानना ही पड़ा।
हम लोख खाने खाने के पश्चात रात्रि में 9 बजे चल पड़े। चिनइया ने अपने हाथों से हमारी कलाइयों पर हल्दी के पत्ते बांधे। जंगल में दाखिल होने से पहले उसने एक बार फिर देखा कि हल्दी के पत्ते कलाईयों पर मौजूद हैं या नहीं।
अंधेरे सुनसान और जोकों से भरे हुए जंगल में से एक मील पैदल चलने के बाद हम खुले स्थान पर पहुंचे। हमें वहां ठहरने के लिए और लपटें छोड़ रहे उन वृक्षों की ओर देखने के लिए कहा गया, जोकि सौ गज की दूरी पर चमक रहे थे।
चिनईया ने जो कुछ कहा था, वह बिलकुल ठीक था। वहां लगभग तीस वृक्ष थे, जिनके तने चिंगारियों की तरह चमक रहे थे। मैंने दुरबीन से देखा और जो कुछ मैंने देखा वह इतना सुंदर नजारा था, जिसको मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकता। सभी वृक्षों में से दो वृक्ष इतने चमकदार थे कि उनकी बिना पत्तों वाली टहनियां भी साफ देखी जा सकती थीं। चिनइया ने बताया कि वे ही दो वृक्ष हैं जिनके ऊपर कादेरी भूत का डेरा है। जैसे-जैसे वर्ष बीत रहे हैं, उनके बच्चे और बढ़ रहे हैं। वह दिन के समय भी किसी को उन वृक्षों को पास नहीं जाने देते।
मैं पास जाकर साफ और असली नजारा देखना चाहता था परंतु चिनइया और मेरे साथियों ने एक कदम भी आगे नहीं जाने दिया। हम वापिस चल पड़े। लेकिन मन ही मन मैंने निश्चय कर लिया था कि मैं दिन में आकर भूतों के इन परिवारों से भेंट अवश्य करूंगा।
सुबह मैं अपने साथियों के विरोध के बावजूद उस जगह पर जा पहुंचा। वहां दो पुराने वृक्ष थे, जिनमें से एक पूरी तरह और दूसरे का कुछ भाग सूखा हुआ था। दक्षिण की ओर बहुत से वृक्ष सूखे हुए थे। परंतु दोनों सूखे वृक्षों में पीला रंग इनसे भी ज्यादा था। मैंने चाकू की सहायता से वृक्ष का कुछ छिलका और लकड़ी काट ली और रेस्ट हाउस वापस आ गया।
अगले दिन उस लकड़ी और छिलके को मैं जाफना कालेज की वनस्पति विज्ञान की प्रयोगशाला में ले गया। सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखने से मैंने पता लगाया कि पीपल के छिलके पर पीला रंग एक विशेष प्रकार की फंगस के कारण पैदा होने लगा था। यह किसी भी प्रकार से कोई अजीब बात नहीं थी, क्योंकि संसार में बहुत से ऐसे वृक्ष हैं, जिनके ऊपर फंगस पैदा होने के कारण प्रकाश पैदा होता है। छिलके की बाहरी सतह फंगस के पैदा होने के लिए बहुत ही उपयुक्त स्थान होता है।
प्रत्येक किस्म की फंगस में से रोशनी उत्पन्न नहीं होती। रोशनी पैदा करने वाली विशेष किस्में चाहे प्रयोगशाला में हो, चाहे किसी वृक्ष पर, वे रात को रोशनी पैदा करती हैं इसका कादेरी या किसी और भूत-प्रेत के साथ कोई सम्बंध नहीं होता।
इस फंगस की तरह ऐसे बहुत से वृक्ष और जानवर हैं जो रात के समय रोशनी देते हैं। इनको प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव और वृक्ष अधिकतर समुद्र में ही रहते हैं, इसलिए अधिकतर लोग इनसे अनभिज्ञ हैं। पृथ्वी पर रोशनी पैदा करने वाले जीवों में से सबसे आम मिलने वाला जीव जुगनू हैं। कुछ और जीव भी घने जंगलों और अंधेरी गुफाओं में देखे जा सकते हैं। जुगनू एक भंवरा है, कीट नहीं। सिर्फ नर जुगनू ही उड़ सकता है। मादा जुगनू पृथ्वी से और वृक्षों से चिपकी रहती है। नर और मादा प्रकाश द्वारा एक दूसरे को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
बहुत से बैक्टीरिया भी रोशनी देते हैं। गल रहे प्रोटीन जैसे मछली और मांस इत्यादि में ऐसे बैक्टीरिया उत्पन्न हो जाते हैं, जो रात के समय प्रकाश पैदा करते हैं।
न्यूजीलैण्ड में कुछ गुफाओं के भीतरी भागों में दीवारों के ऊपर इस प्रकार के बैक्टीरिया बड़ी मात्रा में पैदा होने के कारण रोशनी उत्पन्न् हो जाती है, जिसे हम देख सकते हैं। कुछ कीटों के सिरों के ऊपर रोशनी के स्थान होते हैं। वे रात के समय जब चलते हैं तो इस तरह दिखाई पड़ते हैं जैसे कारें अपनी लाईटें जला कर धीरे धीरे चल रही हों।
भू-मध्य सागर में एक ऐसा जीव होता है, जिसके रहते हुए हिल रहा पानी ऐसे प्रतीत होता है जैसे चमक रहा हो। इस जीव को नौकटीलिऊका कहते हैं। समुद्रों के तटों पर यह जीव अधिक मात्रा में एकत्र होने के कारण ऐसे दिखाई देता है, जैसे आग लगी हो। जिस प्रकार जंगली लोगों को प्रकाश पैदा करने वाले वृक्षों पर भूत प्रेतों का डेरा दिखाई देता है, ठीक उसी प्रकार ही समुद्री मल्लाह और मछुआरे भी पानी में से उत्पन्न हो रहे प्रकाश का कारण भूत-प्रेतों को ही समझते हैं।
प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीवों की तरह ही कुछ शंख, घोंघे, सीपी और कौडि़यां इत्यादि भी ऐसे होते हैं कि अगर उनको हिलाया जाए तो वे अंधेरे में चमकने लगते हैं। रैफईल डैबोई ने इस रोशनी पैदा करने वाले विषय पर अनुसंधान किया है। उसने प्रमाणित किया है कि यह चमक और रोशनी लुसीफैरीन नाम के पदार्थ के कारण होती है।
कुछ फंगस और बैक्टीरिया तो निरंतर रोशनी पैदा करते रहते हैं। परंतु कुछ जीवों में इसका सम्बंध दिमाग से होता है और यह निरंतर रोशनी पैदा नहीं करते। प्रकाश और चमक, ताप की उपज के बगैर ही पैदा होते हैं। चमक के रंग तरह-तरह के और घटने बढने वाले होते हैं। ऐसे प्रकाश का रंग आमतौर पर हरा, नीला, पीला और लाल होता है। गहरे समुद्रों की कुछ मछलियों में चमक को बढ़ाने और कम करने की शक्ति होती है।
उलूमादू जंगल के पालू वृक्ष जल नहीं रहे थे, ये चमक फंगस के कारण उन वृक्षों से पैदा हो रही थी। शायद, यह चमक पहले सूखे वृक्षों से पैदा हुई होगी और बाद में इन वृक्षों से ये पास वाले वृक्षों पर फैलती चली गयीं। इसी कारण्ा गावं वालों ने सोचा कि कादेरी प्रेत के परिवार के सदस्यों की गिनती हर वर्ष बढ रही है।
मनुष्य जाति की यह एक मानसिक कमजोरी है कि जिस घटना का कारण नहीं जान सकते, उसे भूत-प्रेतों या किसी और चमत्कार से जोड़ देते हैं। इस अंधविश्वास के फलस्वरूप कई अजीब घटनाओं की मनगढ़ंत कहानियां दूर-दूर तक फैल जाती हैं।
900 साल पुराना एक मन्दिर जहां रात ढलते हर इंसान बन जाता है पत्थर
मित्रो आज हम फिर से राजस्थान की एक ओर रहस्यमय जगह में बारे में बताने जा रहे है जिससे लोग आज भी अन्जान है | Roadies XI के एक एपिसोड में हमने इस मंदिर के बारे में सुना तो हमने इस मंदिर के बारे में अलग अलग माध्यमो से गहन अध्यन किया | इस मंदिर के बारे में ऐसा माना जाता है कि शाम ढलते ही इस मंदिर के लोग आस पास भी नहीं भटकते है क्यूंकि स्थानीय लोगो का ऐसा मानना है कि रात ढलते ही जो भी इंसान यहा रुक जाता है वो पत्थर की मूर्त में तब्दील हो जाता है | इस बात में कितनी सच्चाई इसके बारे में स्थानीय लोग या आप खुद जाकर पता लगा सकते है | इस मंदिर के इस रहस्य के बारे में जानने से पहले हम आपको इसका थोडा इसका इतिहास बताते है | किराड़ू मंदिर राजस्थान के बाड़मेर जिले के हाथमा गाँव स्थित है जिसे 11वी शताब्दी में बनाया गया था | यह मंदिर इतना सुंदर बना है कि इतिहासकार इस मंदिर को राजस्थान का खजुराहो कहते है लेकिन 900 वर्ष से वीरान इस मंदिर की तरफ अभी तक इतने लोगो का ध्यान नहीं गया जिसके कारण ये मंदिर गुमनामियो के अंधकार में छिपा हुआ है | इस मंदिर में रही पाच बड़े मंदिरों की श्रुंखला भूकम्प से द्वस्त हो गयी थी | यहा पर दो मंदिर है जिसमे से एक शिव जी और दूसरा विष्णु जी का है | इस मंदिर पर बनी पत्थर की कलाकृतिया आपको प्राचीन समय की याद दिला देती है | तो मित्रो इस मंदिर के इतिहास के बाद इस मंदिर से जुड़े रहस्य से आपको रूबरू करवाते है स्थानीय लोगो के अनुसार आज से 900 साल पहले किराडू में परमार वंश का राज था | उस समय एक दिन एक साधू अपने कुछ शिष्यों के साथ यहा पर रहने को आये | यहा पर कुछ दिन रहने के बाद उन्होंने आगे ओर घुमने का निश्चय किया | एक दिन वो बिना शिष्यों को बताये एक रात यहा से निकल पड़े | उनके जाने के कुछ दिनों बाद वो सारे शिष्य बीमारी से ग्रसित हो गए | गाँव के किसी भी इंसान ने उनकी मदद नहीं की | केवल एक कुम्हारिन ने निस्वार्थ भाव से उनकी सेवा की जिससे उनका स्वास्थ्य ठीक हुआ | साधू घूमते घामते फिर से उसी जगह पहुचे तो उन्होंने अपने शिष्यों की कमजोर हालत को देखकर बहुत गुस्सा आया | उन्होंने गांववालों से कहा कि जिस जगह पर इन्सान के लिए दया नहीं वहा मानवजाति का विनाश है और ये कहकर उन्होंने पुरे गांववालों को पत्थर बनने का श्राप दे दिया | शिष्यों की सेवा करने वाली कुम्हारिन को इससे अछुता रखा और शाम ढलने से पहले बिना पीछे मुड़े गाँव से चले जाने को कहा | लेकिन उस महिला ने गलती से पीछे देख लिया और वो भी पत्थर की मूर्त बन गयी | नजदीक के गाँव में आज भी उस कुम्हारिन की मूर्त आज भी है |इस श्राप के बाद सूर्यास्त के बाद यहा कोई नहीं रुकता और जो रहता है वो पत्थर बन जाता है | हालंकि ASI ने इस जगह को अभी तक कोई प्रमाण देकर सरक्षित नहीं किया हो | इस विज्ञान के युग में आप इन बातो पर कितने प्रतिशत विश्वास करते है हमें ये तो पता नहीं है लेकिन प्राचीन समय में रहस्यमयी साधुओ द्वारा दिए श्रापो से भगवान भी अछूते नहीं रहे तो इन्सान की क्या मजाल है | इसलिए प्राचीन समय में लोग हमेशा साधू महात्माओ को खुश रखने की कोशिश करते थे | लेकिन वर्तमान में ना साधुओ का अस्तित्व है और ना ही इतनी आस्था शेष रही | बच गए बस ये खंडहर जो उनकी कहानी बयाँ करते है |
आत्मा का मार्ग
आत्मा की यात्रा का मार्ग पुराणों में आत्मा की यात्रा के तीन मार्ग माने गए हैं। जब भी कोई मनुष्य मरता है और आत्मा शरीर को त्याग कर उत्तर कार्यों के बाद यात्रा प्रारंभ करती है तो उसे तीन मार्ग मिलते हैं।
उसके कर्मों के अनुसार उसे कोई एक मार्ग यात्रा के लिए दिया जाता है।
घुटन
ये बात काफी पुरानी है शायद १९९१ से १९९२ के लगभग की घटना है, हमारे पड़ोस में एक किरायेदार रहा करते थे, उनकी सर्विस टू व्हीलर कंपनी में एक मैकेनिक की थी उनकी प्रवृति नास्तिक थी, और उनकी पत्नी और बच्चे काफी धार्मिक थे उनके बीच में हमेशा इसी बात को लेकर झगड़ा होता था कि जब भी कोंई धार्मिक समारोह होता जैसे कोंई साधू संत का प्रवचन होना हो या कोंई झांकी को, या फिर पड़ोस में किसी के भी यहाँ भजन मंडली का कार्यक्रम हो तो उनकी पत्नी किसी भी समारोह में पुण्य कमाने का अवसर नहीं खोना चाहती थी इसीलिए वो जब भी किसी का बुलावा आता या कोंई ऊँचे साधु -संतो का प्रवचन होता वो तुरंत वहाँ जाने के लिए तैयार हो जाती थी यही बात उनके पति को अच्छी नहीं लगती थी, क्योंकि उनके इस तरह के बुलावो में जाने से उनके दैनिक कार्यो में व्यवधान पड़ता था |
मित्रो बात भी सही थी क्योंकि पहली जिम्मेदारी हमारे घर की होती है बाद में अन्य कार्यों कि ,लेकिन दोस्तों उनके पति हमेशा से नास्तिक नहीं थे, क्योंकि जब भी वो किसी देव स्थान से गुजरते अपना सिर जरूर झुकाते थे इसी से हमने ये बात नोटिस कर ली ये अन्दर से धार्मिक तो जरुर है ,लेकिन इनके नास्तिक होने का काफी श्रेय इनकी पत्नी को जाता है , क्योंकि इंसान के कर्म और भाग्य दोनों एक साथ चलते है,आप चाहे कितनी भी अच्छी क़िस्मत लिखा के क्यों न लाये हो फल तो कर्म के अनुसार ही मिलेगा…
इनकी पत्नी को घर के मकान की बहुत लालसा रहती थी,और भाग्य ने साथ दिया तो उनके ,होम लोन की दिक्कते दूर हो गई, और उन्होंने अच्छा सा मकान खरीद लिया| दोस्तों , अब यहाँ से बात शुरू होती है ,उनकी पत्नी के कारण उन अंकल को पूजा,पाठ, और हवन शांति, गृह प्रवेश को बिलकुल सिरे से नकार दिया और घर मे शिफ्ट हो गए, उस घर में जाते ही सबसे पहले तो उन अंकल को भगवान की तस्वीरे लगाते ही ,किल से गहरा जख्म हो गया और खून की धार जमीन पर गिर गई , उनको सात टाँके आये , घर में शिफ्ट होने के बाद वो कुछ समय के लिए कही बाहर चले गए , वापस आये तो उनके साथ अजीब -२ बाते होने लगी , उनको रात में कभी-२ ऐसा महसूस होता की कोंई उनके पास से होकर सिडियो की तरफ जा रहा है , तो कभी-२ उनकों नींद में ऐसा लगता की किसी की आने की झपकी पड़ी हो|
अब इस तरह उनको २-३ महीने हो गए , फिर एक दिन और एक बात हुई उन अंकल की तबीयत खराब हो गयी सब जांचेहो गई लेकिन कोंई समस्या नहीं आई , लेकिन वो अंकल अपनी पत्नी से कहते की मुझे बहुत घुटन महसूस हो रही है, और मन भी खराब हो रहा है , वो अपनी पत्नी से बोलते पता नहीं मुझे बार -२ ऐसा लग रहा है की बहुत जी भरकर ,रोऊ……….. दोस्तों यहाँ आपको ऐसा लग रहा होगा ये क्या बात हुई कोंई अपने आप क्यों रोयेगा,, लेकिन दोस्तों जो मैंने सुना वही बता रहा हूँ ,, आगे चलते है दोस्तों… उसके बाद वो अपनी पत्नी से बोले की पता नहीं पर मुझे लग रहा है की मैं अनाथ हो गया हूँ और सब मुझे छोड़कर चले गए… इसलिए मुझे रोने की इच्छा हो रही है उनकी पत्नी बोली ये क्या बोल रहे हो कहाँ सब चले गए ऐसी बाते क्यों कर रहे हो ,
दोस्तों , समय निकलता रहा , धीरे-धीरे परिवार में सभी सदस्य उदास-२ से और चुप रहने लगे कोंई किसी से ज्यादा बात नहीं करता था , उनके घर पर कोंई भी उनसे मिलने के लिए जाता तो यही कहता उनके यहाँ तो जाते ही ऐसा महसूस होता है जैसे कोंई मर गया हो और उसको जलाने कि तैयारी में गए हो,
और घुटन सी भी और रोने जैसी हालत हो जाती है , इसलिए हम तो वहाँ ज्यादा नहीं जाते है आजकल….. दोस्तों हम, कहते हैं न की अच्छे कर्मो का फल हमेशा मिलता है हम तो शायद ये उनकी पत्नी के अच्छे कर्मो का ही फल मानते है की एक दिन एक सारंगी बजाने वाला जिसको हम लोग (कमली) भी कहते है उधर से गुजर रहा था, तो उनके बच्चे बाहर ही बैठे थे , अचानक वो दरवाजे के पास आकर रुका और बच्चे को थोड़ी देर देखने के बाद कहा बेटा तुम्हारी मम्मी को बुलाओ , बच्चा अन्दर जाकर बोला मम्मी कोंई मांगने वाला आया है आपको बुलाने के लिए कह रहा है….
उस बच्चे की मम्मी को देखकर सारंगी वाला बोला , बेटा तुम्हारे बच्चे का ध्यान रखना ,इसके साथ कोंई दुर्घटना होने वाली है, वो बोली क्या दुर्घटना वाली है,,वो बोला तुम उसे रोक नहीं सकते जो होना वो तो होकर रहेगा हम उसे नहीं रोक सकते है , पर जितना जल्दी हो सके इस मकान को छोड़ दो…. या फिर इस घर में गायत्री पाठ और दुर्गा सप्तशती का ९ दिन तक अखंड पाठ करा लेना नहीं तो तुम यहाँ चैन से नहीं रह पाओगे और कुछ भी हो सकता है , वो सारंगी वाला चला गया,, उसके थोड़ी देर बाद बच्चे की माँ ने उसे किराने की दुकान से कुछ लाने के लिए भेजा, जो रोड के उस पार थी तो वो बच्चा जब सामान लेकर आ रहा था तो उसको किसी स्कूटर वाले ने टक्कर लगा दी ,
इतिफाक से बच्चे को भी सात टाँके आये| अब जब से वो सारंगी वाला बोल कर गया तब से वो घर में दहशत सी फ़ैल गई, फिर उन आंटी ने वहाँ गायत्री पाठ और सप्तशती चंडी का पाठ कराने की सोच ली लेकिन जब भी इसका नाम लेते तो उनके पति फिर से इन सभी चीजों को नकारते रहते , उनकी पत्नी की स्तिथि ऐसी हो गई जैसे एक तरफ कुंवा एक तरफ खाई और बीच में शेर……. एक तरह से देखा जाए तो जब भी इस घर के शुद्धिकरण की बात आती तो हमेशा नकारात्मक सोच ही उभर के आती थी,
एक दिन उन अंकल के कोंई रिश्तेदार वह मिलने आये जो भजन किर्तन में व्यस्त रहते थे, उन्होंने भी जब वो जाने लगे तो वो बोले तुम ये मकान जल्दी से छोड़ दो नहीं तो कुछ भी हो सकता है मुझे यहाँ कुछ अच्छा नहीं लग रहा है…. फिर काफी जनों की राय लेने के बाद उनको वो घर छोड़ना ही पड़ा ,, फिर कुछ महीनों बाद वो आंटी एक बुजूर्ग महिला से बाते कर रही थी तो बातों-बातों में उस मकान की जिक्र चला तो उन बुजूर्ग महिला ने बताया की यहाँ पर एक लड़की छत से गिर गई थी,, और जब दूसरा परिवार जब रहने आया तो एक दिन घर में करंट फैलने से साथ ,सात लोग एक साथ मर गए थे…
ये घटना उन बुजुर्ग महिला के शादी के समय के आस-पास की घटना थी…….. तो दोस्तों इस पूरे घटनाक्रम में सात के आंकड़े का माजरा समझ के भी नहीं समझ नही आया ,, लेकिन इस किस्से में एक बात तो सही है की बिना मुहूर्त और पूजा-पाठ के कोंई महत्वपूर्ण काम करने से क्या-२ अनहोनी हो सकती है………
आख़िर कौन था वह??
आधुनिक समय में भूत-प्रेत अंधविश्वास के प्रतीक के रूप में देखे जाते हैं पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो भूत-प्रेतों के अस्तित्व को नकार नहीं सकते। कुछ लोग (पढ़े-लिखे) जिन्हें भूत-प्रेत पर पूरा विश्वास होता है वे भी इन आत्माओं के अस्तित्व को नकार जाते हैं क्योंकि उनको पता है कि अगर वे किसी से इन बातों का जिक्र किए तो सामने वाला भी (चाहें भले इन बातों को मानता हो पर वह) यही बोलेगा, "पढ़े-लिखे होने के बाद भी, आप ये कैसी बातें कर रहे हैं?" और इस प्रश्न का उत्तर देने और लोगों के सामने अपने को गँवारू समझे जाने से बचने के लिए लोग इन बातों का जिक्र करने से बचते हैं।
बुरी आत्मा का सामना किससे होता है
जो लोग पापी और अधर्मी हैं जिन्होंने जीवनभर शराब, मांस और स्त्रीगमन के अलावा कुछ नहीं किया, जिन्होंने धर्म का अपमान किया और जिन्होंने कभी भी धर्म के लिए पुण्य का कोई कार्य नहीं किया वे मरने के बाद स्वत: ही दक्षिण दिशा की ओर खींच लिए जाते हैं। ऐसे पापियों को सबसे पहले तप्त लौहद्वार तथा पूय, शोणित एवं क्रूर पशुओं से पूर्ण वैतरणी नदी पार करना होती है।
यह प्रेत जिसने कई सोखाआओ को पीटा
भूत-प्रेतों की लीला भी अपरम्पार होती है। कभी-कभी ये बहुत ही सज्जनता से पेश आते हैं तो कभी-कभी इनका उग्र रूप अच्छे-अच्छों की धोती गीली कर देता है। भूत-प्रेतों में बहुत कम ऐसे होते हैं जो आसानी से काबू में आ जाएँ नहीं तो अधिकतर सोखाओं-पंडितों को पानी पिलाकर रख देते हैं, उनकी नानी की याद दिला देते हैं।
धूनधर का जंगल कि पुरी कहानी
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